मंगलसूत्र तो चर्चा में, लेकिन महिलाएं चुनावी मैदान में क्यों नहीं
Women Candidates: महिलाएं तो चुनावी मैदान में उस अनुपात में नहीं आयीं जितनी उनकी जनसंख्या में हिस्सेदारी है, या जितना आरक्षण देने का बिल भी पास हो चुका है, लेकिन उनका मंगलसूत्र जरूर राजनीतिक चर्चा में आ गया है। चुनावी आरोप प्रत्यारोप में मंगलसूत्र पर सबका ध्यान है, लेकिन मैदान में इस बार भी महिलाओं को उस संख्या में क्यों नहीं उतारा गया जितनी उम्मीद की जा रही थी?
लोकतंत्र की मूल भावना यही है कि उसमें समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी हो, विधायी सदनों में समुचित प्रतिनिधित्व हो। इसे सुनिश्चित करने के लिए बहुत सारी रियायतें दी गई हैं, सुविधाएं दी गई हैं। लेकिन, अफसोस की बात है कि गणतंत्र के 75वें वर्ष में प्रवेश करने के बावजूद हम महिलाओं को उचित प्रतिनिधित्व देने में नाकाम रहे हैं।

इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि पिछले आम चुनावों में वोट डालने वाले मतदाताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी 48.2 प्रतिशत थी, और लोकसभा सांसदों में महिलाओं की संख्या मात्र 14.4 प्रतिशत। यही नहीं, कुल उम्मीदवारों में उनकी संख्या मात्र नौ फीसदी ही थी। इसका मतलब है कि हमारे राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने में इच्छुक नहीं रहते। उनकी इस अनिच्छा को हम महिला आरक्षण बिल को लेकर उनके रवैये में भी देख सकते हैं, जिसे उसकी मंजिल तक पहुँचने में ढाई दशक से भी ज्यादा समय लग गया।
दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश और सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए यह बेहद शोचनीय है कि यहॉं की करीब पचास फीसदी वयस्क आबादी को संसद और राज्य विधानसभाओं में पंद्रह फीसदी प्रतिनिधित्व भी हासिल नहीं है। प्रतिनिधित्व मिले भी तो कैसे, जब देश की सभी बड़ी पार्टियॉं उन पर भरोसा ही नहीं करतीं कि वे नेतृत्व कर सकती हैं। बेशक, सिद्धांतत: वे कितनी ही बड़ी बातें क्यों न करें, लेकिन व्यवहार के समय उनके आदर्शों पर राजनीति के तकाजे हावी हो जाते हैं।
सितंबर, 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एच डी देवेगौड़ा के नेतृत्व वाली संयुक्त मोर्चा सरकार ने संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के आरक्षण के लिए संसोधन बिल पेश किया था। सभी दलों ने इस विचार की सराहना भी की। लेकिन, इसके बाद हुए आम चुनावों में जब टिकट देने की बारी आई तो इनमें कोई दल ऐसा नहीं था, जिसने दस फीसदी महिला उम्मीदवारों को भी चुनाव मैदान में उतारा हो।
1996 से 2019 तक इस दौरान सात आम चुनाव हुए, कम से कम चार बार यह बिल सदन में पेश हुआ। लेकिन, राजनीतिक दलों ने अपनी सोच और तौर-तरीके बदलने में बहुत उत्साह नहीं दिखाया। पिछले लोकसभा चुनावों को देखें तो हालात में मामूली सा ही सुधार देखने में आया, जब सीपीएम, कॉन्ग्रेस, भाजपा, सीपीआई और बसपा जैसे दलों ने क्रमश: 14.8%, 12.8%, 12.6%, 8.2%, और 6.3% महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया था। जबकि इनमें कांग्रेस और बसपा तो ऐसी पार्टियॉं हैं, जिनका शीर्ष नेतृत्व महिला हाथों में रहा है।
चुनावों में महिला उम्मीदवारों को खड़ा करने में संकोच के पीछे उनकी जो भी मजबूरी रहती हो, लेकिन यह मानने वालों की कमी नहीं है कि पुरुषों के सामने महिला उम्मीदवार खड़ा करने से पार्टी की जीत की संभावनाएं कम हो जाती हैं। दुर्भाग्य से आम मतदाता की भी सोच यही है कि महिलाएं उनका प्रतिनिधित्व इतने अच्छे से नहीं कर सकतीं, जितना कि एक पुरुष सांसद या विधायक कर सकता है।
जिस देश में लोग महिलाओं की वाहन चलाने तक की क्षमता को लेकर संदेह व्यक्त करते हैं, सरकार चलाने को लेकर उन पर भरोसा करने के लिए कैसे आसानी से मान सकते हैं। बावजूद इस सच्चाई के देश के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक महिला प्रधानमंत्री थी और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, प.बंगाल, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों की कमान महिला मुख्यमंत्रियों ने कई वर्षों तक सफलतापूर्वक संभाली है, देश की एक पूर्व और वर्तमान राष्ट्रपति महिला हैं।
फिर भी लोगों को अपनी तंगनजरी पर इतना नाज है कि वे हवाई जहाज और अंतरिक्षयान उड़ाने वाली महिलाओं को नहीं देख पाते। हो सकता है कि राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को तरजीह न दिए जाने के पीछे मतदाताओं का यह पूर्वाग्रह भी एक बड़ा कारण हो। इसीलिए महिलाओं के लिए चुनावों में आरक्षण बहुत जरूरी है ताकि पार्टियॉं उन्हें खड़ा करने के लिए बाध्य हों और मतदाता उन्हें उनका नेतृत्व कौशल दिखाने का अवसर देने के लिए।
केंद्र और राज्यों के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण अनिवार्य करने के लिए संशोधन विधयेक 1996, 1998, 1999 और 2008 में भी पेश किए जा चुके हैं। पहले तीन संबधित लोकसभा भंग होने के साथ निरस्त हो गए थे। 2008 में तो यह राज्यसभा में पेश हुआ और पारित भी, लेकिन लोकसभा भंग हो गई और यह भी इसी के साथ समाप्त हो गया। पिछले साल 19 सितंबर को इसी लक्ष्य को लेकर, 128वां संशोधन विधेयक लोकसभा में पेश किया गया और 20 सितंबर को लोकसभा और 21 सितंबर को राज्यसभा में पास भी हो गया।
लेकिन, वर्तमान चुनावों में इस पर अमल नहीं किया जा सका। दरअसल इसकी एक तकनीकी वजह है, वह यह कि इस विधेयक के लागू होने के बाद अब जो जनगणना होगी, उसके प्रकाशन के बाद ही यह व्यवस्था प्रभावी होगी क्योंकि महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित करने के लिए परिसीमन जनगणना के बाद किया जाएगा।
राजनीति दलों और आम जन में इसे लेकर बहुत ज्यादा ऊहापोह भले ही रही हो, लेकिन स्थानीय निकायों में हम बीते तीन दशकों में इसके काफी सकारात्मक प्रभाव देख चुके हैं। 1993 में 73वां और 74वां संशोधन, जो पंचायतों और नगर पालिकाओं की सदस्यता में महिलाओं की 33% हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है, पारित होने के बाद से अब तक, करीब तेरह लाख महिला उम्मीदवार इन निकायों में पहुँच चुकी हैं।
महिलाओं के सशक्तीकरण के लिहाज से ही नहीं, बल्कि एक परिपक्व और विशाल लोकतंत्र की दृष्टि से भी यह हमारे लिए बहुत आवश्यक है। इसे संतोषजनक ही कहा जाएगा कि आजादी के बाद से अब तक संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ा है। पहली लोकसभा में जहां महिलाओं की हिस्सेदारी 4.4 प्रतिशत थी वहीं 2019 की सत्रहवीं लोकसभा में महिला सांसदों की संख्या बढकर कुल सांसदों का 14 प्रतिशत हो गया है। 2019 की सत्रहवीं लोकसभा में कुल 78 महिला सांसद निर्वाचित हुई थीं। इस बार उनकी जनसंख्या के अनुपात में भले ही पार्टियों ने उन्हें टिकट न दिया हो लेकिन उम्मीद करनी चाहिए कि महिलाओं की राजनीतिक चेतना और उनकी संसद में भागीदारी निरंतर बढती रहेगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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