Delhi Floods: 'बाढ़' में क्यों डूब गयी दिल्ली?

Delhi Floods: दिल्ली एक ऐसा राज्य है जिसकी जीडीपी बहुत उच्च स्तर पर होने के बावजूद वह अपने उपभोग के लिए कुछ भी पैदा नहीं करता। न दाना और न पानी। दिल्ली के पास जो है वह है लगभग दो करोड़ लोगों की एक विशाल जनसंख्या जो लगभग 1500 वर्ग किलोमीटर के दायरे में बेलगाम तरीके से बसे हुए हैं। इतने कम दायरे में इतने अधिक लोगों का होना ही किसी राज्य को प्राकृतिक आपदा के समय असफल करने के लिए पर्याप्त है। जैसे इस समय यमुना के जलस्तर में वृद्धि हुई तो पूरी दिल्ली अस्त व्यस्त हो गयी। लेकिन सवाल यह है कि दिल्ली में यह अतिरिक्त जल आया कहां से? और जो आया क्या वह अतिरिक्त जल कहा जाएगा?

इसे जानने के लिए दिल्ली से 180 किलोमीटर दूर उत्तराखंड, यूपी और हरियाणा के बॉर्डर तक जाना होगा जहां हथिनि कुंड नामक बैराज बना है। तकनीकी रूप से ये बैराज हरियाणा में पड़ता है लेकिन बाकी जलभराव का इलाका यूपी में आता है। यानी बैराज को खोलने बंद करने का अधिकार हरियाणा के पास है लेकिन उसके बंद करने से यमुना नदी में जहां जलभराव होता है वह हिस्सा यूपी में पड़ता है। यहीं से हरियाणा के लिए सिंचाई की एक नहर निकलती है इसलिए बैराज कब खोलना है या बंद करना है इसे हरियाणा सरकार अपनी जरूरत के हिसाब से तय करती है।

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इस हथिनिकुंड बैराज से ऊपर की ओर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बॉर्डर पर यमुना नदी के ऊपर एक अन्य बैराज बना है जिसे डॉकपत्थर बैराज कहते हैं। उस डॉकपत्थर बैराज से पहले टोंस नदी आकर यमुना में मिलती है। यह नदी हिमाचल की ओर बहकर आती है। स्वाभाविक है कि इस बार जब हिमाचल प्रदेश में रिकार्डतोड़ बारिश हुई तो उस पानी एक बड़ा हिस्सा टोंस नदी के माध्यम से बहकर यमुना तक पहुंच गया। इस पानी को संभाल पाने की क्षमता डॉकपत्थर बैराज के पास नहीं थी इसलिए उसके सारे गेट खोल दिये गए और दस से बारह लाख क्यूसेक पानी छोड़ दिया गया।

इतना पानी संभाल पाने की क्षमता हथिनिकुंड बैराज के पास भी नहीं है। लेकिन डॉकपत्थर से हथिनिकुंड के बीच हिमाचल की कुछ और छोटी बड़ी बरसाती नदियां आकर यमुना में मिलती हैं। हिमाचल प्रदेश में हुई भारी बारिश ने सारा पानी लाकर यमुना में उड़ेल दिया जिसे संभाल पाना हथिनिकुंड बैराज के लिए संभव नहीं था। उसकी कुल क्षमता 10 लाख क्यूसेक है। यहां से अतिरिक्त पानी आगे की ओर छोड़ दिया गया जो सीधे दिल्ली होेते हुए मथुरा आगरा की ओर निकल जाना था। दिल्ली के वजीराबाद और ओखला बैराज के गेट भी खोले गये लेकिन पानी उसकी क्षमता से अधिक आ गया था। अब क्योंकि दिल्ली में वजीराबाद बैराज से ओखला बैराज के बीच फ्लड प्लेन पर तमाम तरह के वैध अवैध अतिक्रमण हो चुके हैं इसलिए दिल्ली के वो इलाके पानी में डूब गये जहां अतिक्रमण किया गया है।

लेकिन दिल्ली में बाढ़ की कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि हिमाचल, पंजाब, हरियाणा में हुई भारी बारिश का पानी अचानक से यमुना में आ गया। नदियों को बाढ़ का पानी सहेजना आता है। बाढ़ के दिनों में उनके पाटों का विस्तार हो जाता है और वह पानी चारों और फैल जाता है। इससे जहां एक ओर ग्राउण्ड वाटर रिचार्ज होता है वहीं दूसरी ओर बाढ़ का पानी उतरने के बाद वहां अच्छी खेती हो जाती है। बाढ़ क्षेत्र में रहने वाले लोगों का अनुभव ऐसा है कि खेती के लिए बाढ़ का यह पानी किसी वरदान से कम नहीं होता। जहां जहां यह पहुंचता है वहां बिना खाद की खेती है और पैदावार भी बाकी जगहों से काफी अच्छी हो जाती है।

दिल्ली में यमुना कुल 22 किलोमीटर बहती हैं जिसके किनारे आसपास फ्लड प्लेन में जहां वैध या अवैध तरीके से कंक्रीट का निर्माण नहीं हुआ है, वहां खेती ही होती है। लेकिन जनसंख्या के दबाव से इस 22 किलोमीटर के इलाके में न केवल अवैध बल्कि सरकारी कब्जा भी दिखाई देता है। इस अतिक्रमण ने दिल्ली में बाढ लाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई है।

दिल्ली की बाढ़ में एक और भूमिका आवागमन के लिए किये गये विकास की है। वजीराबाद बैराज से लेकर दिल्ली के आखिरी छोर तक 22 किलोमीटर में कुल 25 पुल बनाये गये हैं। इसमें सड़क, रेल और मेट्रो के लिए बनाये गये पुल शामिल हैं। 22 किलोमीटर में 25 पायेदार पुल का मतलब होता है कि इस समय दिल्ली में हर 800 मीटर पर एक पुल बना हुआ है। इससे यमुना के बहाव में रुकावट पैदा हुई है और पानी उतनी तेजी से आगे नहीं निकल पाता जितना तेजी से निकल जाना चाहिए। जैसे लोहेवाले पुल के पास रेलवे का जो निर्माणाधीन पुल है उसके दो पाये ठीक यमुना की मुख्यधारा में धंस गये। उसके बगल में नये पाये बनाकर यमुना नदी की धारा को अवरुद्ध करने की रही सही कसर पूरी कर ली गयी। उसके ठीक बगल में बने लोहे वाले पुल के मजबूत पाये तो पहले से ही मौजूद हैं।

सिग्नेचर ब्रिज का निर्माण जरूर एक नयी तकनीकी से किया गया है जिसमें यमुना नदी के भीतर कम पिलर लगाये गये हैं। लेकिन बाकी पुलों की जिन्दगी तो कंक्रीट के मजबूत पायों पर ही टिकी है जो नदी के बहाव में बड़ा अवरोध पैदा करते हैं।

दिल्ली में बाढ़ का एक कारण नदी में भरी गाद भी है। दिल्ली में अकेला नजफगढ़ नाला इतनी सिल्ट या गाद यमुना में भर देता है कि वजीराबाद के बाद नदी का बहाव थम जाता है। लेकिन वजीराबाद से पहले भी रेत और मिट्टी का भराव है जिसे आज तक साफ करवाने की कोशिश नहीं की गयी। उल्टे दिल्ली में कई नये मजबूत तटबंध बनाकर नदी को सीमित करने का ही प्रयास किया गया है। इसमें वजीराबाद से पहले और उसके बाद नये नये तटबंधों के निर्माण ने पानी को आसपास फैलने से रोक दिया। यह इसलिए किया गया ताकि यमुना फ्लड प्लेन की अधिक से अधिक जमीन का उपयोग किया जा सके, अब वही मानसिकता दिल्ली को भारी पड़ रही है।

लालकिले से सलेमगढ़ फोर्ट के बीच में एक बुर्ज के नीचे रिंग रोड पर जहां सबसे अधिक जलजमाव दिख रहा है वह कुछ सौ साल पहले एक वाटर चैनल हुआ करता था जो लालिकले से यमुना नदी के बीच था। यमुना नदी से इसी चैनल के जरिए पानी लालकिले के चारों ओर बनी खाईं तक पहुंचाया जाता था। लेकिन बदलते समय के साथ इस वाटर चैनल को पाटकर यहां सड़क और फ्लाईओवर बना दिया गया। लेकिन जैसा कि प्रख्यात पर्यावरणविद अनुपम मिश्र कहा करते थे कि पानी अपना रास्ता नहीं भूलता, आज वह दिल्ली में सच होता दिखाई दे रहा है। नदी का पानी अपने पुराने रास्ते पर लौटा तो दिल्ली के डूब जाने का शोर मच गया।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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