Rahul Gandhi Case: राहुल गांधी की सदस्यता बहाल होने का रास्ता खुला

जैसे ही कनविक्शन पर स्टे मिलेगा,लोकसभा सचिवालय को राहुल गांधी की सदस्यता भी उसी तरह बहाल करनी पड़ेगी, जैसे मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल की है। राहुल को घर खाली करने का नोटिस भी लोकसभा की हाउस कमेटी को वापस लेना पड़ेगा।

Way open for reinstatement of Rahul Gandhis membership

लोकसभा स्पीकर ने राहुल गांधी की सदस्यता रद्द करके सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले का अनुपालन किया। सूरत की जिला अदालत ने राहुल गांधी को मानहानि के केस में दो साल कैद और 15 हजार रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। जनप्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के मुताबिक़ उन जन प्रतिनिधियों की सदस्यता खत्म हो जाती है, जिन्हें दो साल या उससे ज्यादा सजा होती है। पहले इसी क़ानून में धारा 8 (4) हुआ करती थी, जिसमें कहा गया था कि अगर तीन महीने के भीतर अदालत के फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दी जाती है और मुकद्दमा ऊपरी अदालत में लंबित हो जाता है, तो सदस्यता रद्द नहीं होगी।

होता यह था कि सालों साल सुप्रीमकोर्ट तक मुकद्दमा चलता रहता था और फैसले से पहले ही सदन का कार्यकाल खत्म हो जाता था। सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में अपने फैसले में धारा 8 (4) खत्म कर दी थी और कहा कि निचली अदालत से फैसला होते ही सदस्यता खत्म हो जाएगी। लेकिन क़ानून में यह स्पष्ट नहीं है कि सदस्यता खत्म करने की प्रणाली क्या होगी। इसलिए जब लोकसभा सचिवालय ने राहुल गांधी की सदस्यता खत्म करने का नोटिफिकेशन जारी किया, तो सवाल उठा कि उन्होंने क़ानून का पालन किया या नहीं। कुछ संविधान विशेषज्ञों ने कहा कि लोकसभा सचिवालय राष्ट्रपति की इजाजत के बाद ही नोटिफिकेशन जारी कर सकता है।

Way open for reinstatement of Rahul Gandhis membership

असल में उन का तर्क संविधान के अनुच्छेद 102 से प्रभावित था। संविधान के अनुच्छेद 102(1) और 191(1) के अनुसार अगर संसद या विधानसभा का कोई सदस्य, लाभ के किसी पद को लेता है, दिमाग़ी रूप से अस्वस्थ है, दिवालिया है या फिर वैध भारतीय नागरिक नहीं है तो उसकी सदस्यता रद्द हो जाएगी। अयोग्यता का दूसरा नियम संविधान की दसवीं अनुसूची में है। इसमें दल-बदल के आधार पर सदस्यों को अयोग्य ठहराए जाने के प्रावधान हैं|

इन दोनों ही कारणों से सदस्यता रद्द का नियम संविधान के अनुच्छेद 103 में दिया गया है, जिसके मुताबिक़ इन दोनों ही कारणों से अगर किसी की सदस्यता खत्म होती है तो उसे राष्ट्रपति को भेजा जाएगा, राष्ट्रपति चुनाव आयोग से सलाह लेकर आगे की कार्यवाही करेंगे। इसलिए जब राहुल गांधी की सदस्यता जन प्रतिनिधित्व क़ानून के तहत रद्द की गई, तो कुछ संविधान विशेषज्ञों ने राष्ट्रपति से अनुमति के बिना नोटिफिकेशन पर सवाल उठाया। हालांकि राष्ट्रपति से अनुमति का नियम अनुच्छेद 102 के तहत सदस्यता खत्म होने के सन्दर्भ में है।

अनुच्छेद 102 के अलावा जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत किसी सांसद या विधायक की सदस्यता रद्द होती है, लेकिन उसकी प्रणाली तय नहीं है। अब तक यही होता आया है कि सदन का स्पीकर अदालत के फैसले के आधार पर नोटिफिकेशन जारी करता है। आने वाले समय में अदालत इस पर कोई प्रणाली तय करती है, तो वह अलग बात होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (4) को समाप्त करके राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया था। उस समय लालू प्रसाद यादव की सदस्यता खत्म हो रही थी, लेकिन वह मनमोहन सरकार को समर्थन दे रहे थे, इसलिए मनमोहन सरकार सुप्रीमकोर्ट के फैसले को बदलना चाहती थी। सुप्रीमकोर्ट का फैसला पलटने के लिए मनमोहन मंत्रीमंडल ने एक अध्यादेश पारित किया, जिसे राष्ट्रपति से मंजूरी भी मिल गई थी।

कांग्रेस के प्रवक्ता अजय माकन प्रेस क्लब में इस अध्यादेश पर सफाई दे रहे थे, तभी वहां कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी पहुंचे और उन्होंने कहा- "इस अध्यादेश के बारे में मेरी राय है कि ये पूरी तरह बेतुका है। इसे फाड़कर फेंक देना चाहिए। ये मेरी निजी राय है। मैं दोहराता हूं, इसे (अध्यादेश को) फाड़कर फेंक देना चाहिए|" उस समय राहुल गांधी की बहुत वाहवाही हुई थी कि उन्होंने राजनीति के शुद्धिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अपनी ही सरकार को सही रास्ता दिखाया है।

इससे मनमोहन सरकार की बहुत किरकिरी हुई थी, खबर तो यहाँ तक आई थी कि अपनी किरकिरी के बाद मनमोहन सिंह ने इस्तीफा देने का मन बना लिया था। लेकिन सोनिया गांधी ने उन्हें ऐसा नहीं करने के लिए राजी किया। हालांकि बाद में मनमोहन सरकार ने छह महीने की अवधि में न तो क़ानून बनाया, न अध्यादेश को दुबारा जारी किया। तब से जिस किसी को भी दो साल की सजा हुई, उसकी सदस्यता चली गई, लेकिन 2018 में सुप्रीमकोर्ट ने खुद अपने फैसले में संशोधन कर लिया।

संशोधन यह किया कि ऊपरी अदालत अगर कनविक्शन ( दोषी ठहराए जाने पर) पर ही रोक लगा देती है, तो सदस्यता रद्द नहीं होगी। इस तरह 2013 के फैसले में राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए उठाए गए कदम से सुप्रीमकोर्ट खुद ही पीछे हट गई। लेकिन इस फैसले में यह साफ़ नहीं किया गया कि ऊपरी अदालत से कनविक्शन पर स्टे लेने की अधिकतम अवधि क्या होगी, और तब तक उसकी सदस्यता खत्म नहीं होगी।

अगर ऐसा प्रावधान भी कर दिया गया होता, तो यह स्थिति पैदा ही न होती, जैसे लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल के मामले में हुई। हत्या के प्रयास के आरोप में सैशन कोर्ट ने उन्हें दस साल की सजा सुनाई थी, लोकसभा स्पीकर ने 48 घंटे में उनकी सदस्यता खत्म कर दी, लेकिन वह सुप्रीमकोर्ट चले गये, सुप्रीमकोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट का रास्ता दिखाया, लेकिन तब तक चुनाव आयोग को चुनाव नहीं करवाने का आदेश दे दिया।

केरल हाईकोर्ट ने इस आधार पर मोहम्मद फैजल के कनविक्शन पर रोक लगा दी कि लोकसभा की शेष सिर्फ 15 महीने की अवधि के लिए चुनाव करवाना पड़ेगा। हालांकि राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए यह कोई बहुत बड़ी कीमत नहीं है, और इस आधार पर किसी के कनविक्शन पर स्टे लगाना न्याय के सिद्धांत के भी खिलाफ है। लेकिन केरल हाईकोर्ट ने यह फैसला किया, जिस पर सुप्रीमकोर्ट ने भी स्टे देने से इनकार कर दिया। आखिर 29 मार्च को लोकसभा सचिवालय को उनकी सदस्यता रद्द करने का नोटिफिकेशन वापस लेना पड़ा।
राहुल गांधी के मामले में सूरत की कोर्ट ने एक महीने के लिए उनकी सजा पर तो स्टे लगा दिया था, लेकिन कनविक्शन पर स्टे नहीं लगाया था। कनविक्शन पर स्टे ऊपरी अदालत ही लगा सकती है, क्योंकि सजा देने वाली अदालत ही तो दोषी ठहराए जाने वाले अपने फैसले पर स्टे नहीं दे सकती। सूरत की अदालत ने सजा पर स्टे देते हुए राहुल गांधी को एक महीने का मौक़ा दिया था कि वह ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाएं।

सजा पर स्टे के चलते लोकसभा सचिवालय एक महीने तक नोटिफिकेशन रोक सकता था, अगर इस अवधि में ऊपरी अदालत राहुल गांधी के कनविक्शन पर स्टे नहीं लगाती, तो लोकसभा सचिवालय को उनकी सदस्यता रद्द करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए था। वैसे जब सुप्रीमकोर्ट ने अपने ही फैसले को पलट दिया था, तो उसे ही यह स्पष्ट प्रावाधान 2018 के अपने फैसले में करना चाहिए था।

राहुल गांधी ने लोकसभा सचिवालय के फैसले को राजनीतिक तौर पर भुनाने के लिए जानबूझकर ऊपरी अदालत का दरवाजा नहीं खटखटाया। लेकिन लक्षद्वीप के सांसद का मामला कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ही लेकर गए, क्योंकि केरल हाईकोर्ट के फैसले के बावजूद लोकसभा सचिवालय ने उनकी सदस्यता बहाल नहीं की थी। कांग्रेस ने मोहम्मद फैजल के मामले को प्रयोग के तौर पर इस्तेमाल किया और सुप्रीमकोर्ट में याचिका डाली।

पहले तो सुप्रीमकोर्ट ने उन्हें हाईकोर्ट जाने को कहा, लेकिन बाद में चीफ जस्टिस सुनवाई करने को मान गए। यह साफ़ केस था कि अगर केरल हाईकोर्ट ने कनविक्शन पर स्टे लगा दिया था तो 2018 के सुप्रीमकोर्ट के फैसले के मुताबिक़ उसकी सदस्यता बहाल होनी थी। सुप्रीमकोर्ट ने 29 मार्च को सुनवाई करना तय किया था, और सुनवाई से पहले ही लोकसभा सचिवालय ने मोहम्मद फैजल की सदस्यता रद्द करने वाला नोटिफिकेशन वापस ले लिया।

अब राहुल गांधी सूरत जिला कोर्ट के फैसले को एक-आध दिन में सैशन कोर्ट में चुनौती देकर कनविक्शन पर स्टे करवाने की कोशिश करेंगे। अगर सैशन कोर्ट ने स्टे नहीं लगाया तो वह हाईकोर्ट जाएंगे। इसकी काफी संभावना बनती है। जैसे ही कनविक्शन पर स्टे मिलेगा, लोकसभा सचिवालय को राहुल गांधी की सदस्यता भी उसी तरह बहाल करनी पड़ेगी, जैसे मोहम्मद फैजल की सदस्यता बहाल की है। राहुल गांधी को घर खाली करने का नोटिस भी लोकसभा की हाउस कमेटी को वापस लेना पड़ेगा।

इसे विपक्ष की बड़ी जीत के तौर पर देखा जाएगा, क्योंकि कांग्रेस ने खेल को बना ही इस तरह दिया कि इस मुद्दे पर विपक्षी एकता हो गई। राहुल को मानहानि के केस में सजा होने से एक सवाल यह भी खड़ा हो गया है कि भाषण के किसी शब्द पर मानहानि के केस में सजा होने को क्या ऐसा आपराधिक मामला मानना चाहिए, जिसमें सांसद या विधायक की सदस्यता चली जाए। आने वाले समय में कोर्ट को यह भी तय करना पड़ेगा कि मानहानि के केस में सजा जन प्रतिनिधित्व क़ानून 1951 की धारा 8 (3) के दायरे में आनी चाहिए या नहीं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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