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Venezuela Crisis: संप्रभुता का अपहरण और अमेरिकी साम्राज्यवाद का नंगा नाच, दंतहीन यूएन की समीक्षा का समय

वेनेजुएला में हालिया घटनाक्रम विश्व व्यवस्था के लिए एक खतरनाक मिसाल पेश करते हैं। 3 जनवरी 2026 को अमेरिकी डेल्टा फोर्स ने काराकास में हवाई हमले किए और राष्ट्रपति निकोलास मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को गिरफ्तार कर अमेरिका ले गई। यह कार्रवाई न केवल एक संप्रभु राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन है, बल्कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मूल सिद्धांतों का भी खुला अपमान है। यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में 'माइट इज राइट' के उस सिद्धांत की भौंडी पुनर्स्थापना है, जिसे शीतयुद्ध के बाद इतिहास के कबाड़खाने में डाल दिया गया था।

यह कार्रवाई संप्रभुता के उस बुनियादी विचार को रौंदती है, जिस पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी। यदि कोई महाशक्ति किसी देश की सीमा में घुसकर उसके निर्वाचित राष्ट्रपति को उठा सकती है, तो फिर छोटे और मध्यम देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का क्या अर्थ बचता है?

venezuela crisis - trump-maduro in a frame

वेनेजुएला की घटना से पहले अमेरिका ने 1989 में पनामा से मैनुएल नोरिएगा को उठा लिया था, 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन को फांसी दे दिया था और 2011 में पाकिस्तान में घुसकर आतंकी ओसामा बिन लादेन को गोली मारकर उसके शव को उठा ले गया था। इसके अतिरिक्त, हैती के जीन-बर्ट्रांड एरिस्टाइड, लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी, चिली के साल्वाडोर अयेंदे, ईरान के मोहम्मद मोसद्देक और ग्रेनेडा के मॉरिस बिशप - इन नामों के साथ जुड़ा इतिहास यही बताता है कि अमेरिका के खिलाफ खड़े नेता या तो सत्ता से हटाए गए या इतिहास से मिटा दिए गए। ये उदाहरण बताते हैं कि जब अमेरिका अपने हित तय कर लेता है, तो कानून, सहमति और संस्थाएँ गौण हो जाती हैं।

पिछले कुछ वर्षों में कुटनीतिक दवाब, शह और मात, व्यापारिक जीत और आर्थिक कब्जे की अप्रत्यक्ष लड़ाई जैसी भी रही हो,सीमा-विवाद से इतर कोई महाशक्ति किसी संप्रभु राष्ट्र पर यूं ही हमला नहीं कर रहा था। ऐसा लगने लगा था कि वैश्विक शक्तियों में परिपक्वता आ रही है। बतौर यूएस प्रेसिडेंट ट्रंप का पहला कार्यकाल इस बात की आश्वस्ति दे रहा था कि विश्व शांति युग में पहुंच रही है। तब ट्रंप अमेरिका में ऐसे अभूतपूर्व राष्ट्रपति थे जिसने किसी देश पर कोई युद्ध नहीं थोपा, किसी पर कोई हमला नहीं किया, तुर्रा अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना वापस बुला लिया था।

वेनेजुएला पर अमेरिकी आरोप: सफेद झूठ नहीं, न्याय का ढोंग

लेकिन दूसरा कार्यकाल उस भ्रम का अंत है। अब आक्रामकता खुलकर सामने है। केवल चीन और रूस जैसे प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ नहीं, बल्कि मित्र देशों पर भी दबाव की नीति। वेनेजुएला इस बदली हुई अमेरिकी मानसिकता का सबसे ताज़ा और खतरनाक उदाहरण है। मदुरो पर नार्को-टेररिज़्म, कोकीन तस्करी और हथियारों की साज़िश जैसे गंभीर आरोप हैं। यह भी सच है कि वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था ध्वस्त है, भ्रष्टाचार और मानवाधिकार उल्लंघनों के प्रमाण मौजूद हैं। लेकिन सवाल यह नहीं है कि आरोप सही हैं या गलत। सवाल यह है कि क्या किसी देश को यह अधिकार है कि वह दूसरे संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति को सैन्य बल से गिरफ्तार कर अपनी अदालत में पेश करे? यह न्याय नहीं, यह जबरन वसूली की राजनीति है। गिरफ्तारी के तुरंत बाद 30 मिलियन बैरल तेल आपूर्ति का समझौता थोपना इस सच्चाई को और स्पष्ट करता है कि असली मुद्दा कानून नहीं, संसाधन हैं। यल लड़ाई ड्रग्स की नहीं तेल के वेनेजुएला के अकूत तेल भंडार पर कब्ज़े की लड़ाई है।

संयुक्त राष्ट्र चार्टर की अवहेलना

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 2(4) में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी देश दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल प्रयोग नहीं करेगा। अमेरिका की यह कार्रवाई अनुच्छेद 51 के आत्मरक्षा खंड में भी फिट नहीं बैठती, न ही इसके लिए सुरक्षा परिषद की मंजूरी ली गई। वैश्विक जिम्मेदारी संरक्षण केंद्र ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों का 'स्पष्ट उल्लंघन' करार दिया है। मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच ने चेतावनी दी कि यह वेनेजुएलाई लोगों के लिए नया मानवाधिकार आपदा पैदा कर सकता है। इतिहास गवाह है कि इराक, लीबिया और क्यूबा जैसे मामलों में अमेरिका ने इसी तरह 'न्याय' के नाम पर हस्तक्षेप किया, जिसके परिणामस्वरूप अराजकता ही फैली।

अमेरिकी विदेश नीति: हाइपोक्रिसी का आईना

ट्रंप का दूसरा कार्यकाल अमेरिकी विदेश नीति को 'अमेरिका फर्स्ट' के नाम पर साम्राज्यवादी रूप दे रहा है। मदुरो पर 2020 से ही आरोप थे, लेकिन अब सैन्य हस्तक्षेप से साबित हो गया कि वाशिंगटन कानून से ऊपर है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इसे 'कानून प्रवर्तन' बताया, जबकि यह सीधा सैन्य आक्रमण था। वेनेजुएला के तेल भंडारों पर कब्जा अमेरिका की रणनीति का केंद्र है। प्रतिबंधों के बाद अब प्रत्यक्ष नियंत्रण। यह नीति लैटिन अमेरिका में 'मुनरो सिद्धांत' की वापसी है, जहां अमेरिका पश्चिमी गोलार्द्ध में किसी चुनौती को बर्दाश्त नहीं करेगा। इसी का परिणाम है कि अमेरिका अपने निकट ब्राजील के लुला से लेकर ग्लोबल साउथ तक के देशों के नेताओं पर हमलावर है।

बदलती भू-राजनीति और भारत

भारत ने अमेरिकी कार्रवाई पर 'गहरी चिंता' जताई है। विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर वेनेजुएलाई लोगों की सुरक्षा और संवाद की अपील की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत वेनेजुएला के साथ अच्छे संबंध रखता है और शांतिपूर्ण समाधान चाहता है। वेनेजुएला भारत का प्रमुख तेल आपूर्तिकर्ता रहा है। रिलायंस जैसे कंपनियों ने वहां भारी निवेश किया। यह संकट भारत के लिए खतरा है, क्योंकि इससे तेल की कीमतें अस्थिर हो सकती हैं और अमेरिकी दबाव बढ़ सकता है। लेकिन इस आपदा में अवसर भी हो सकता है। BRICS जैसी इकाई के माध्यम से ग्लोबल साउथ में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत हो सकती है।

भारत की विदेश नीति अब 'मल्टी-अलाइनमेंट' की ओर है, जो गुट-निर्पेक्ष सिद्धांत(NAM) का विकसित रूप है। हम अमेरिका, रूस, चीन सबके साथ संतुलन बनाते हैं, बिना किसी के पाले में गए। वेनेजुएला संकट में भारत का रुख sovereignty और non-intervention पर आधारित है, जो अफ्रीकी संघ और लैटिन देशों से मेल खाता है। यदि अमेरिका इसी तरह पाकिस्तान या चीन में दखल दे, तो भारत के लिए खतरा बढ़ेगा। इसलिए, भारत को QUAD और I2U2 जैसे मंचों पर अमेरिका से सख्ती से कहना होगा कि संप्रभुता अछूत है। गुट-निर्पेक्ष नीति की भावना आज भी प्रासंगिक है, जो बहुपक्षीयता को मजबूत करती है।

​वेनेजुएला संकट एक चेतावनी है कि महाशक्तियां कानून को बंधक बना सकती हैं। भारत जैसे उभरते राष्ट्रों को G20 और UN में सुधार की मांग तेज करनी होगी। अमेरिका को आरोपों की अंतरराष्ट्रीय अदालत में जवाबदेही दिखानी चाहिए, न कि अपहरण। वेनेजुएलाई लोगों का भविष्य संवाद में है, न कि बमों में। भारत की नीति हमें इस तूफान से सुरक्षित रखेगी, बशर्ते हम अपनी स्वतंत्रता पर अडिग रहें।

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