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Undefined terms in Constitution: संविधान के अपरिभाषित शब्दों की आड़ में जनता से अन्याय

क्या भारतीय संविधान के अपरिभाषित शब्द, जैसे, अल्पसंख्यक, छुआछूत, मार्शल लॉ, संविधान का उल्लंघन इत्यादि ऐसे शब्द नहीं हैं जिनकी आड़ में सत्ता को जनता पर निरंकुश फैसले थोपने की छूट मिल जाती है?

Undefined terms in Constitution over unfair to the public

Undefined terms in Constitution: भारत को अपने संविधान में मौजूद शब्दों की परिभाषा खोजना शुरू करना चाहिए। इस कड़ी में शब्दों के आधार पर भारतीय संविधान की बात की जाये तो जो बहस हमें दिखती है, उसके पीछे तीन कारण हैं- पहले, वो शब्द हैं जो संविधान में हैं ही नहीं। दूसरे, वो शब्द हैं जो संविधान में हैं, किन्तु परिभाषित नहीं हैं। तीसरे, वो शब्द हैं जो संविधान में हैं भी और परिभाषित भी हैं।

इन्हें समझने के लिए देखना हो तो सबसे पहले तीसरी श्रेणी के शब्दों से बात शुरू की जा सकती है। ये ऐसे शब्द हैं जो संविधान में हैं, परिभाषित भी हैं, लेकिन यदा-कदा उन पर बहस होती है। उदाहरण के तौर पर "राज्य" (स्टेट) शब्द संविधान में आता है। परिभाषा भी उपलब्ध है, लेकिन इस पर बहस होती है। बहस इसलिए होती है क्योंकि आम आदमी इस शब्द का जो अर्थ समझता है, वो कानूनी प्रक्रिया में प्रयुक्त अर्थ से अलग होती है।

जब भी किसी पर "राजद्रोह" के मुक़दमे की बात होती है, तो ये "राज्य" शब्द अपने आप ही चर्चा में आ जाता है। भारत के संविधान की धारा 79 के अनुसार, केन्‍द्रीय संसद की परिषद में राष्‍ट्रपति तथा दो सदन राज्‍यसभा तथा लोकसभा के नाम से जाना जाता है। थोड़ा सोचते ही दिखता है कि यहाँ जो राज्य का अर्थ है, वो सामान्य तौर पर "राज्य" से जिस भौगोलिक क्षेत्र का, नक्शे पर बने किसी इलाके का बोध होता है, उस "राज्य" से अलग है।

जब हम उस श्रेणी पर आते हैं, जो संविधान में हैं ही नहीं, तब हमारा ध्यान फिर से इस बात पर जाता है कि आम सोशल मीडिया बहसों में, या आपसी बातचीत में जिन बातों पर चर्चा होती है, वो सही भी हैं क्या? उदाहरण के तौर पर भारतीय संविधान से जुड़ी चर्चाओं में शायद आपने "फेडरल स्ट्रक्चर" यानि संघीय ढांचे की बात सुनी होगी। संघवाद की सबसे पहली और आवश्यक मांग होती है कि संसद के ऊपरी सदन में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्राप्त हो। अमेरिका की सीनेट (उपरी सदन) में प्रत्येक राज्य से दो प्रतिनिधियों के लिए सीटें अरक्षित होती हैं। हमारे संविधान में इस प्रकार की बराबरी का कोई प्रावधान नहीं है और न ही राज्य सभा में इस प्रकार के प्रतिनिधित्व के लिए सीटों का आरक्षण है।

अलग-अलग राज्यों के लिए अलग अलग संविधान का कोई प्रावधान नहीं है। संविधान में किसी भी प्रकार के संशोधन की पहल केंद्र सरकार ही कर सकती है। राज्य सरकार संविधान में किसी संशोधन का प्रस्ताव नहीं ला सकती है। ये "संघीय" वो तत्व है जो संविधान में नहीं है। भारत के संविधान में संघीय संविधान के लक्षण तो हैं किन्तु यह एक संघीय शासन स्थापित करने का दावा नहीं करता है।

जो सबसे अधिक बहसों को जन्म देते हैं, वो कुछ ऐसे शब्द हैं जो संविधान में हैं तो, लेकिन परिभाषित नहीं है। ऐसे शब्दों की बात की जाए तो सबसे पहले "अल्पसंख्यक" (माइनॉरिटी) शब्द को याद कीजिये। इसके अलावा "छुआछूत" (अनटचेब्लिटी) भी परिभाषित नहीं है। ऐसे ही "संविधान का उल्लंघन" (वायलेशन ऑफ कोंस्टीट्युशन) भी परिभाषित नहीं है।

भाषा और धर्म-रिलिजन-मजहब के आधार पर कोई समुदाय "अल्पसंख्यक" (माइनॉरिटी) समुदाय हो सकता है। इसमें हम पाते हैं कि जब अल्पसंख्यक की बात होती है, तो केवल एक ही समुदाय विशेष का जिक्र भर होकर रह जाता है। भारत के स्वतंत्र होने के कई वर्ष बाद ये तय हो पाया कि सिक्खों को हिन्दुओं से अलग एक अल्पसंख्यक समुदाय माना जाये।

आज की स्थितियां भी देखें तो हम पाते हैं कि अल्पसंख्यक अगर राज्य के हिसाब से परिभाषित न हों, तो कश्मीर सहित कम से कम नौ राज्य ऐसे हैं जहाँ हिन्दू अल्पसंख्यक हैं। मिजोरम (2.75%), लक्षद्वीप (2.77%), नागालैंड (8.74%), मेघालय (11.52%), लद्दाख (12.11%), जम्मू-कश्मीर (28.04%) और पंजाब (38.49%) में हिन्दुओं की आबादी कम है। इन राज्यों में अल्पसंख्यक आयोगों के माध्यम से हिन्दुओं को कोई लाभ दिए जाए, ऐसा होता नहीं दिखता।

शब्दों के उचित तरीके से परिभाषित न होने के और भी नुकसान देखे जा सकते हैं। उदाहरण के रूप में अदालत और कोर्ट जैसे शब्दों के लिए हिंदी में न्यायालय शब्द के प्रयोग की परिपाटी बनी हुई है। अदालत शब्द का इंसाफ से कोई लेना देना नहीं। अदालत में फैसला होता है, ये कहा जा सकता है। अदालत में इंसाफ होगा, ये केवल मान्यता है। कोर्ट को भी "हाउस ऑफ जस्टिस" नहीं कहते। कोर्ट मामलों पर अपना "वर्डिक्ट" देता है। "जस्टिस" नहीं देता, केवल फैसला सुनाने का काम करता है।

उचित तो ये होता कि हिंदी में बात करते या लिखते समय हम लोग भी ये ध्यान रखते कि जो "फैसला", "वर्डिक्ट" या "निर्णय" दे रहा है, उसे केवल "निर्णयालय" कहा जाये। जबरन "न्याय" की अवधारणा निर्णय सुनाने वालों पर क्यों थोपना?

मौजूदा सरकार के काम-काज को देखा जाये तो जिन क्षेत्रों में धीमा काम हुआ है, उनमें शब्दों की उचित परिभाषा तय करना भी एक है। हाल ही में कक्षा 1 से 8 तक के लिए "अल्पसंख्यकों" को दी जाने वाली मौलाना आजाद स्कॉलरशिप को बंद करने का फैसला आया है। इसके विरुद्ध आवाज उठाने की बात भी हो रही है। ऐसे में ये सवाल उठता है कि क्या "अल्पसंख्यकों" के लिए दी जाने वाली इस छात्रवृत्ति में जैन, पारसी, सिक्ख, बौद्ध इत्यादि धार्मिक-रिलीजियस समुदायों की कोई हिस्सेदारी थी भी?

ये सवाल भी बाद में उठाया जा सकता है कि जिन राज्यों में हिन्दू अल्पसंख्यक नजर आते हैं, क्या उन राज्यों में अल्पसंख्यक आयोग हिन्दू छात्र-छात्राओं को ऐसी छात्रवृत्ति का लाभ देगा? ये तब तक स्पष्ट नहीं हो सकता जब तक हम लोग शब्दों को उचित तरीके से परिभाषित करने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर दबाव न बनाएं। उम्मीद है आने वाले समय में शब्दों और उनकी परिभाषा पर भी बातें शुरू होंगी।

यह भी पढ़ें: क्या महाजन आयोग की शर्तें मान लेते तो सुलझ जाता कर्नाटक-महाराष्ट्र का सीमा विवाद? जानिए क्या है इतिहास

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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