“पीलीभीत में टाइगर लिंचिंग” और ग्रामीण की मौत का जिम्मेदार कौन?

पीलीभीत। बाघ तो मर गया अब लाठी पीटने से क्या होगा। जब जिन्दा था बाघ ने जिसे घायल किया था वह ग्रामीण भी मर गया। इस टाइगर लिंचिंग में दोष किसका था? इसके लिए अब प्रशासन लाठी पीट रहा। मजिस्ट्रेटी जांच हो रही है। 31 लोगों के खिलाफ नामजद रिपोर्ट लिखी गई है और 7 को गिरफ्तार कर पूछताछ हो रही। इसमें कुछ महिलाएं और बच्चे भी हैं। जहां जांच होनी चाहिए वहां नहीं हो रही। पीलीभीत जिले की पूरनपुर तहसील के मटेहना घुंगचिहई गाँव में हुई घटना में न बाघ का कोई दोष न ग्रामीणों का,असली दोषी है उत्तर प्रदेश का वन विभाग। बाघ को जब इंसानों से खतरा महसूस होगा तो इंसान पर हमला करेगा ही और जब लोग बाघ के हमले में घायल होंगे तो वो भी बचाव और गुस्से में बाघ पर हमला करेंगे।

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बाघिन नरभक्षी नहीं थी

जांच में पता चला कि भीड़ हिंसा का शिकार बाघ वास्तव में बाघिन थी और गर्भवती थी। उसके हमले में एक इन्सान की मौत हो गई। बाघिन के हमले में 9 घायल हुए लेकिन बाघिन नरभक्षी नहीं थी। आखिर ऐसे कौन से हालात थे कि घने जंगल में रहने वाली बाघिन जंगल से लगे खेतों में ग्रामीणों पर टूट पड़ी? इन परिस्थितियों को समझने के लिये हमें पीलीभीत टाइगर रिजर्व और गाँव इतिहास भूगोल को समझना होगा। पीलीभीत टाइगर रिजर्व की स्थापना 2008 में हुई। दुधवा नेशनल पार्क से लगा हुआ यह टाइगर रिजर्व करीब 730 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। वर्तमान में यहाँ करीब 40 से 45 बाघ होने का अनुमान है। घटते जंगल और बढ़ती आबादी के कारण वन्य जीवों और इंसानों में संघर्ष की घटना बढ़ रही हैं। इस क्षेत्र में आबादी या खेतों में बाघ के घुस आने, मवेशी या इंसानों पर हमले की घटना पहली बार नहीं हुई है। इस वजह से यहाँ इंसानों और जगली जानवरों में हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा है। जिस दिन बाघ ने ग्रामीण पर हमला किया उस दिन पड़ोस के अलग अलग स्थानों गाँव नौजल्हा और बराही रेंज में तेंदुए ने मवेशी को निवाल बनाया था। टाइगर रिजर्व के बगल से खारजा नहर निकलती है। बरसात के समय नदियाँ उफनाई हैं। ऐसे में वन्य जीव अकसर खेतों की ओर चले आते हैं। इसके पहले 12 और 13 जुलाई को भी बगल के गाँव में गन्ने के खेत में बाघ को देखा था और दहाड़ सुनी थी। वनकर्मियों को सूचित भी किया गया था। लेकिन वनकर्मियों ने कुछ नहीं किया।

ग्रामीण और बाघिन की मौत से लें सबक, करें उपाय

तीन दिन पहले अचानक झड़ी में छिपी बाघिन ने ग्रामीणों पर हमला कर 9 को बुरी तरह घायल कर दिया और झाडी में भाग कर छिप गई। शोर सुन ग्रामीण जुट गए और बाघिन को घेर कर पीटना शुरू किया। प्रत्यक्षदर्शी का कहना है कि किसी ने जोरदार डंडा उसके मुंह पर मारा जिससे वो गिर गई। फिर ताबडतोड हमले उससके पेट पर किये गए इसके बावजूद वह किसी तरह उठ कर झड़ी में चली गई। रातभर गर्भवती बाघिन दर्द से कराहती रही और 7-8 घंटों के बाद उसकी मौत हो गई। बताया जा रहा कि जब बाघिन ने हमला किया उस समय पास ही नहर की पुलिया पर वनकर्मी मौजूद था लेकिन उसने तुरंत न तो अधिकारियों को सूचित किया न ही वहां पहुंचा। बाघिन के हमले में घायल राधेश्याम (50) की लखनऊ ले जाते समय मौत बेहद दुखद है। लेकिन एक गर्भवती बाघिन की मोब लिंचिंग भी कम दुखद नहीं। इन परिस्थितियों के लिए असली जिम्मेदार तो वन विभाग है। पहली कार्रवाई तो उस क्षेत्र के वनकर्मी पर होनी चाहिए।

नहीं मिलेगा मुआवजा

जांच में यह तथ्य सामने आया है कि जहां बाघिन को मारा गया वह जमीन जंगल में आती है इस लिए मृतक के परिवार वालों या घायलों को कोई मुआवजा नहीं मिलेगा। एफ़आइआर में नामजद लोगों पर कानून का डंडा चलेगा सो अलग। लोग ग्राम मटेहना में नौ ग्रामीणों पर हुए हमले की घटना को घायल भले ही खेत पर होने की बता रहे हों, लेकिन बाघिन की मौत विभागीय जांच में घटना जंगल के अंदर की निकली। विभाग की ओर से दर्ज मुकदमे में भी जंगल क्षेत्र का हवाला दिया गया है। जिसके चलते घायलों को मुआवजा का कोई प्रावधान नहीं है। ग्रामीणों पर हमला जंगल क्षेत्र के अंदर हुआ है इसलिए मुआवजे का कोई प्रावधान नहीं है। बाघ लिंचिंग का वीडिओ वायरल हो जाने से ग्रामीणों में मीडिया के प्रति बेहद गुस्सा है। पहले बाघिन का खौफ था लेकिन बाघिन की मौत होने के बाद ग्रामीण कानूनी कार्रवाई को लेकर खौफजदा हैं। डीएम वैभव श्रीवास्तव ने जांच के आदेश दिए हैं लेकिन प्रशासन से ज्यादा असली जांच वन विभाग को करनी चाहिए। सूचना मिलने पर आगरा वनकर्मी तुरन हरकत में आते तो एक निर्दोष ग्रामीण और एक असहाय बाघिन की जान न जाती।

ऐसे नहीं बचेंगे बाघ

बाघ संरक्षण के नाम पर जंगल को टाइगर रिजर्व का दर्जा तो दे दिया गया, लेकिन संरक्षण के नाम पर कुछ खास न हुआ। चंद वॉच टॉवर और कुछ जलाशयों बनाकर बाघों के संरक्षण की बात की जाती है। इससे न तो बाघों का भला हो रहा है और जंगल से पास आबादी का। साल भर के भीतर बाघों के हमलें में एक व्यक्ति की जान जा चुकी है तो दो साल में चार बाघों और पांच तेंदुए की हुई मौत हो चुकी है।

कहा जा रहा कि टाइगर रिजर्व की स्थापना के बाद से वहां बाघों की संख्या बढी है लेकिन इस लिंचिंग ने वन्य जीवों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

दो साल में चार बाघों और पांच तेंदुए की मौत


- फरवरी माह 2018 में बराही रेंज के अंतर्गत डगा बाइफरकेशन मार्ग पर मिला तेंदुए का शव

- 28 मार्च 2018 को शारदा सागर डैम में मिला बाघ का सड़ा गला शव

- 10 अप्रैल 2018 को बराही रेंज के अंतर्गत खारजा नहर की पटरी पर मिला बाघ का शव

- 20 अप्रैल 2018 को महोफ रेंज के कंर्पामेंट 112 में मिला बाघ का शव

- मई में मिला बराही रेंज के अंतर्गत खारजा नहर की पटरी पर मिला तेंदुए का क्षतविक्षत शव

- 08 नवंबर को बराही रेंज के जंगल में मिला तेंदुए का शव

- 19 अक्तूबर 2018 को असम हाईवे पर अज्ञात वाहन की टक्कर में हुई तेेंदुए की मौत

- 20 मार्च 2019 को माधोटांडा के डगा गांव के निकट हरदोई ब्रांच नहर में मिला मादा तेंदुए का शव

- 24 जुलाई 2019 को दियोरियां रेंज से सटे मटहेना कॉलोनी में ग्रामीणों की पिटाई से हुई बाघिन की मौत

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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