Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

Telangana Elections: क्या तेलंगाना 30 नवंबर को ‘सोनियाम्मा’ को रिटर्न गिफ्ट देगा?

कई चुनावी सर्वेक्षणों में तेलंगाना में कांग्रेस को या तो जीतते हुए दिखाया गया है या फिर उसे भारत राष्ट्र समिति को कांटे की टक्कर देते हुए पाया गया है। यानी कि कांग्रेस तेलंगाना में फिर से उठ खड़ी हुई है और भाजपा राज्य में बीआरएस का विकल्प बनने से दूर हो चुकी है।

2014 में कांग्रेस ने राज्य की 119 में 21 सीटें जीती थी। 2018 में उसकी सीटें बढ़ने के बजाय दो सीटें कम हो गई थीं। जाहिर है, राज्य स्थापना से लेकर अब तक वह मुख्य विपक्षी दल बनी रही। फिर भी कुछ समय पहले तक यह सोचना कठिन लग रहा था कि वह निकट भविष्य में सरकार बनाने की दावेदारी करती नजर आ जायेगी। राजनीतिक हलकों में इसे कांग्रेस की आश्चर्यजनक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

Telangana Elections

चुनाव परिणाम क्या होंगे, यह तो 3 दिसम्बर को ही पता चलेगा लेकिन आज की स्थिति में इतना तय है कि कांग्रेस तेलंगाना में सत्ता की प्रबल दावेदार बन चुकी है। उसकी सरकार बन जाए तो भी कोई आश्चर्य नहीं होगा। ऐसे में यह सहज जिज्ञासा है कि तेलंगाना में आखिर ऐसा कैसे हुआ? किन परिस्थितियों ने कांग्रेस के उभार का मार्ग प्रशस्त किया?

कांग्रेस के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित करके अपने संगठन और प्रचार शक्ति के बदौलत चुनाव जीतने की क्षमता से वंचित हो चुकी है। ऐसे में वह एक खास तरह की राजनीतिक लोकतांत्रिकता के तहत चुनावों को हाथ से निकलने देती है, अपनी राजनैतिक साख को बचा लेती है और अनुकूल अवसर का धैर्यपूर्वक इंतज़ार करती है। 2014 में जब उसके खिलाफ भ्रष्टाचार का अभियान चला तो राजसत्ता का प्रयोग करके वह उस आंदोलन को कुचलकर अपने को कमजोर होने से बचा सकती थी। लेकिन उसने अपनी राजनीतिक पूँजी बचाये रखी और चुनावी हार स्वीकार कर ली और अनुकूल परिस्थितियों के इंतज़ार में है। परिस्थितियां बनीं तो वह फिर उठ खड़ी होगी। तब उसे न बहुत बड़े समर्पित प्रचार तंत्र की आवश्यकता पड़ेगी और न ही किसी आंदोलन की। उसे विश्वास रहता है कि उसकी ओर से जनता आवाज़ लगाएगी।

2014 में लोकसभा चुनावों के साथ साथ उसने आंध्र प्रदेश का चुनाव भी हारा था। 2 जून को आंध्र प्रदेश से अलग करके तेलंगाना की स्थापना हुई तो तत्कालीन तेलंगाना राष्ट्र समिति बहुमत में आई और के. चंद्रशेखर राव राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने। सत्ता राज्य बनाने वाली कांग्रेस को नहीं बल्कि राज्य सृजन के आंदोलनकारियों को मिली। फिर भी तेलंगाना की जनता में कांग्रेस के लिए कृतज्ञता का भाव बना रहा। कांग्रेस राज्य निर्माण के लिए सोनिया गांधी को श्रेय देती रही। स्वयं केसीआर ने बार बार सोनिया गांधी के सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया। इसी मूल पूँजी की वजह से ही कांग्रेस की वह दुर्गति तेलंगाना में कभी नहीं हुई जो आंध्र प्रदेश में हुई। कांग्रेस इसी पूँजी के साथ अपनी पारी का 10 साल से इंतज़ार कर रही है। अब इस बार कांग्रेसियों में प्रबल उत्कंठा है कि क्या तेलंगाना की जनता सोनियाम्मा को रिटर्न गिफ्ट देने जा रही है?

लेकिन राजनीति में किसी दल की विचारधारा और उसकी किसी उपलब्धि से जनता में उपजी सहानुभूति या शुभेच्छा चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं होती है। कांग्रेस के लिए तेलंगाना की जनता में यदि समर्थन का भाव उमड़ पड़ता दिख रहा है तो यह केवल उस पूँजी की वजह से नहीं बल्कि उस पूंजी के आधार पर खड़ी सक्रिय पार्टी के नाते है। पिछले एक दशक से कांग्रेस ने उस पूँजी को राजनैतिक शक्ति में बदलने की अपनी क्षमतानुसार लगातार कोशिश की है। एक विपक्षी दल के रूप में उसने सदन से लेकर सड़क तक यह दिखाने की पूरी कोशिश की है कि वह तेलंगाना के विकास और कल्याण के प्रति केसीआर के दल से अधिक प्रतिबद्ध है। कांग्रेस ने तेलंगाना की स्थापना की है, और वही उसे विकास की रफ्तार दे सकती है।

तेलंगाना में उसने लगातार अपने संगठन में फेरबदल किये और नए-नए प्रयोग किये। अंत में उसे रेवंत रेड्डी जैसे एक नेता का चेहरा मिला जो न केवल सांसद व प्रदेश अध्यक्ष हैं बल्कि युवा और लोकप्रिय भी हैं। कांग्रेस की ओर लोगों में जो आकर्षण का भाव पैदा हुआ है उसकी एक वजह रेवंत रेड्डी भी बताए जा रहे हैं।

कांग्रेस की विरासत और विचारधारा आजकल की चुनावी राजनीति में वोटों के ध्रुवीकरण के लिए कारगर जातिवाद, धार्मिक उन्माद और क्षेत्रवाद जैसे किसी भी तत्व के खुले प्रयोग की इजाजत नहीं देती है। ऐसे में कांग्रेस केवल और केवल लोकप्रिय कल्याणकारी राजनीति, जिन्हें अंग्रेजी में पॉपुलिस्ट पॉलिटिक्स कहा जाता है, के सहारे चलती है। तेलंगाना में कांग्रेस को लेकर इसी बात की चर्चा अधिक हो रही है।

हालांकि मुख्यधारा का मीडिया यह स्वीकार नहीं करता लेकिन यह सच है कि पिछले करीब पाँच वर्षों में राहुल गांधी ने अपनी एक फैन फॉलोइंग बनाई है। जनता में उन्हें लेकर एक आकर्षण पैदा हुआ है। प्रचार, दिखावे और पाखंड की छिछली राजनीति के दौर में काफी लोग उन्हें एक नेकदिल, ईमानदार और गरीबों के प्रति हमदर्द नेता के रूप में देखने लगे हैं। तेलंगाना चुनावों में कांग्रेस में दम तभी आना शुरू हुआ जब राहुल गांधी ताबड़तोड़ यात्राएं और जनसभाएं करके केसीआर को मोदी से सांठगांठ करने वाला नेता बताने लगे। सार्वजनिक रूप से धारा 370 में संशोधन के समय केंद्र सरकार का समर्थन करने को अपनी भूल बताकर भारत राष्ट्र समिति ने प्रकारांतर से राहुल गांधी के आरोपों में सच्चाई का स्वयं भान करा दिया था।

इसके करीब साल भर पहले ही राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से कांग्रेस के पक्ष में वह माहौल और सहानुभूति पैदा कर ली थी जिस पर उसकी चुनावी राजनीति निर्भर कर सकती थी। इस पदयात्रा ने दक्षिण से लेकर उत्तर तक कांग्रेस में जान डालने का काम किया है। स्वयं तेलंगाना में पदयात्रा कई दिन चलती रही और भारी भीड़ आकर उसमें शामिल होती रही। सबको गले लगाते, पैदल चलते राहुल की छवियाँ राजनैतिक रूप से अप्रतिबद्ध लोगों के दिलों में घर करती रहीं। इनका असर चुनावों में न हो, ऐसा कैसे हो सकता है?

2014 से लेकर 2023 तक यानी करीब एक दशक तक चंद्रशेखर राव और उनकी पार्टी को तेलंगाना की जनता का भरपूर प्यार और समर्थन मिला। लेकिन लोकतंत्र में एक समय ऐसा भी आता है जब कोई दल मात्र सत्ता में रहने की वजह से जनता की नजरों से गिर जाता है, तब जनता दूसरे विकल्प की तरफ देखने लगती है। यदि कांग्रेस तेलंगाना में उभार पर है तो जनता की यह भावना सबसे बड़े कारक के रूप में सक्रिय है। कांग्रेस कह ही रही है कि केसीआर की एक्सपायरी डेट आ चुकी है। यदि जनता ने भी यह मान लिया कि बहुत हुआ केसीआर, तो इसी बार नहीं तो अगली बार पक्का कोई कांग्रेसी नेता मुख्यमंत्री आवास में 'गृह प्रवेश' करेगा।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+