Platform Frauds: डिजिटल प्‍लेटफॉर्म के जेबकतरों से रहें सावधान

डिजिटल टेक्‍नोलॉजी ने बहुत सारे क्षेत्रों को फायदा पहुंचाया है लेकिन यह आर्थिक अपराधियों के लिए भी काफी मददगार साबित हो रही है। इनमें प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड की हिस्‍सेदारी सबसे ज्‍यादा है।

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Platform Frauds: रेलवे प्‍लेटफॉर्म पर आपने अक्‍सर 'जेबकतरों से सावधान', 'अपने सामान की रखवाली स्‍वयं करें', 'अनजान लोगों पर भरोसा न करें' जैसी चेतावनियां पढ़ीं और सुनी होंगी। सजगता दिखाकर आप नुकसान से बचे भी होंगे। लेकिन, अब प्‍लेटफॉर्म बदल चुके हैं और अपराधि‍यों के तौर-तरीके भी। डिजिटल प्‍लेटफॉर्मों पर आपकी लापरवाही अक्‍सर आपके लिए बड़े नुकसान का कारण बन जाती है। कई बार तो अपराधी इतने शातिर होते हैं कि आपकी सारी सावधानी धरी की धरी रह जाती है।

पिछले हफ्ते, एक प्रोफेशनल कंसल्‍टेंसी फर्म पीडब्‍ल्‍यूसी इंडिया ने प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड को लेकर एक सर्वे रिपोर्ट जारी की है। करीब एक साल तक चले इस सर्वे में 111 कंपनियों ने हिस्‍सा लिया। इनमें 17% ने स्‍वीकार किया कि ऐसी धोखाधड़ि‍यों की वजह से उन्‍हें बीते दो सालों में 8 से 400 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। पांच प्रतिशत कंपनियों को तो 400 करोड़ से भी ज्‍यादा का नुकसान उठाना पड़ा। जबकि 40% कं‍पनियां ऐसी थीं, जिन्‍हें 40 से 80 लाख तक की चपत लगी। पीडब्‍ल्‍यूसी के सर्वे में 51% कंपनियों ने बताया कि उन्‍हें प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड का सामना करना पड़ा। यह संख्‍या 2020 के 47% से चार प्रतिशत ज्‍यादा और पिछले दो दशकों में सर्वोच्‍च थी।

बढ़ रहे हैं प्लेटफार्म फ्रॉड

प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड, आर्थि‍क अपराध का एक नया और तेजी से बढ़ता हुआ प्रकार है। इसका आशय उन फ्रॉड गतिविधियों से है, जिन्‍हें अपराधी ई-कॉमर्स वेबसाइट, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन मार्केटप्लेस, या ऐसे किसी भी दूसरे प्लेटफॉर्म पर अंजाम देते हैं। इनके निशाने पर वे सभी प्‍लेटफॉर्म होते हैं, जहॉं यूजर आपस में बातचीत या आर्थिक लेन-देन करते हैं।

प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड के कई स्‍वरूप हैं। इनमें फर्जी अकाउंट बनाना, फेक प्रॉडक्‍ट रिव्‍यू , आइडेंटिटी थेफ्ट, ट्रांजेक्‍शन फ्रॉड, फ़िशिंग स्‍कैम और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी गतिविधियॉं शामिल हैं। इनके शिकार प्लेटफॉर्म ऑपरेटर भी हो सकते हैं और यूजर भी। व्‍यक्तिगत शिकार को तो ज्‍यादातर मामलों में आर्थिक हानि या मानसिक कष्‍ट झेलना पड़ता है, लेकिन शिकार संस्‍थानों या डिजीटल प्‍लेटफार्मों को आर्थिक के साथ-साथ और भी कई तरह के नुकसान उठाने पड़ सकते हैं। जैसे उनकी विश्‍वसनीयता घटती है, ग्राहकों में उनके प्रति ब्रान्‍ड लॉयल्‍टी में कमी आती है, कानूनी रूप से भी उन्‍हें तरह-तरह की कार्रवाईयों का सामना करना पड़ सकता है।

प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड का अब दायरा काफी विस्‍तृत हो चुका है। इतना ज्‍यादा कि देश में आर्थि‍क धोखाधड़ी में मामलों में 57% हिस्‍सेदारी, प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड की है। जबकि वैश्विक स्‍तर पर यह 39% ही है। जाहिर है कि हम डिजीटल प्‍लेटफॉर्मों के इस्‍तेमाल में तो काफी आगे बढ़ चुके हैं, लेकिन सुरक्षा और सावधानी को लेकर बहुत ज्‍यादा गंभीर नहीं हैं। 69.2 करोड़ इंटरनेट उपभोक्‍ताओं और 46.7 करोड़ सोशल मीडिया यूजर्स वाले भारत देश में इस लापरवाही की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। इसीलिए डिजीटल फ्रॉड के मामले में हमारा स्‍कोर ग्‍लोबल एवरेज का करीब डेढ़ गुना है।

तरह-तरह के फ्रॉड

प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड को अंजाम देने वालों में व्यक्तिगत, संगठित आपराधिक समूह, यहां तक कि कुछ मामलों में सरकारें भी, शामिल पाए जा सकते हैं। इनके मकसद भी अलग-अलग हो सकते हैं। जैसे व्यक्तिगत अपराधियों का मकसद फ्रॉड ट्रांजेक्‍शन कर पैसा कमाना या नकली उत्‍पाद बेचना हो सकता है। वहीं, ऑर्गेनाइज्‍ड क्राइम में नकली खाते बनाने के लिए बॉट्स का उपयोग करना या यूजर की पर्सनल डिटेल्‍स चुराने के लिए फ़िशिंग स्‍कैम जैसी गतिविधियां शामिल होती हैं।

इसी प्रकार विभिन्‍न देशों की सरकारें एक-दूसरे की राजनीति में हस्तक्षेप करने या संवेदनशील जानकारी तक पहुंच हासिल करने के लिए रची साजिश के एक हिस्‍से के रूप में प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड का इस्‍तेमाल कर सकती हैं। ये इतने चालाक होते हैं कि शिकार को आहट तक नहीं लग पाती कि उसके साथ धोखाधड़ी की जा रही है। वह अनजाने में नकली सामान खरीद लेते हैं, विभिन्‍न तरह के प्रलोभनों में आकर या किसी संभावित खतरे से डरकर स्‍कैमरों को पैसे का भुगतान कर देते हैं, फिशिंग स्‍कैम में फंसकर अपनी निजी जानकारियां अनजान लोगों के साथ साझा कर सकते हैं।

पेमेंट धोखाधड़ी, नकली सामान की बिक्री, फेक रिव्‍यूज, और रेटिंग जैसे प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड की तुलना में फिशिंग और पहचान की चोरी वाले फ्रॉड ज्‍यादा गंभीर हैं और इनकी वजह से होने वाले नुकसान भी। अपराधी फिशिंग कर उपयोगकर्ताओं को उनकी व्यक्तिगत जानकारी, जैसे लॉगिन क्रेडेंशियल या क्रेडिट कार्ड नंबर प्रदान करने के लिए फुसला सकते हैं। फिशिंग अक्सर वास्‍तविक प्रतीत होने वाले नकली ईमेल आईडी, वेबसाइट या सोशल मीडिया मैसेज की सहायता से की जाती है।

साइबर क्रिमिनल इसी तरह यूजर की पहचान की चोरी कर, इसका इस्‍तेमाल नकली खाते बनाने, फ्रॉड ट्रांजेक्‍शन में करते हैं और चुराई गई क्रेडिट कार्ड डिटेल्‍स का उपयोग करके अनाप-शनाप खरीदारी करते हैं। प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड के ये कुछ प्रचलित प्रकार हैं। जैसे-जैसे प्रौद्योगिकी विकसित हो रही है, फ्रॉडस्‍टर भी प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड के नए-नए तरीके इजाद कर रहे हैं।

कैसे काम करते हैं डिजिटल प्लेटफॉर्म के ठग

अपनी योजना को पूरा करने के लिए प्लेटफॉर्म ठग कुछ खास शैलियॉं अपनाते हैं और अपनी गतिविधि को चरणबद्ध तरीके से अंजाम देते हैं। सबसे पहले वे अपने टार्गेट प्‍लेटफॉर्म पर रिसर्च करते हैं, ताकि उसकी कमजोरियों को पहचानकर उनका फायदा उठा सकें। साथ ही साथ अपनी रिसर्च में वे ऐसे लोगों की पहचान करते हैं, जिन्‍हें आसानी से शिकार बनाया जा सकता है। अगला कदम होता है, सेटअप। इसमें अपराधी अपनी एक फेक आइडेंटिटी क्रिएट करता है या फेक अकाउंट बनाता है या फिर किसी मौजूदा अकाउंट में सेंध लगाकर उसे अपने अधिकार में ले लेता है।

सेटअप के बाद तीसरा चरण होता है, एक्‍जीक्‍यूशन। इसमें अपराधी नकली लिस्टिंग, फेक रिव्‍यू पोस्‍ट, फिशिंग स्‍कैम जैसी जालसाजियॉं करता है और यूजर्स को बरगलाकर उनकी पर्सनल डिटेल्‍स या लॉगिन क्रेडेंशियल्‍स हासिल कर लेता है। चौथे चरण में वह फ्रॉड करने से पहले वीपीएन या प्रॉक्‍सी सर्वर का इस्‍तेमाल कर खुद को सुरक्षित कर लेता है, ताकि उसे ट्रैक न किया जा सके। इसके लिए वह फेक आइडेंटिटी या मल्‍टीपल आईपी एड्रेस इस्‍तेमाल करता है, फ्रॉड डिटेक्‍शन सिस्‍टम की जानकारी में आने से बचने के लिए छोटे-छोटे ट्रांजेक्‍शन करता है। योजना के अंतिम चरण में अपराधी धोखाधड़ी से खरीदारी कर या संवेदनशील जानकारी हासिल कर, प्‍लेटफॉर्म से पैसा या दूसरी कीमती चीजें, जैसे क्रिप्‍टो करेंसी या एनएफटी आदि चुरा लेता है।

मुकाबला है मुमकिन

अगर आप यह सब जानकारियॉं पाकर खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं तो घबराने की जरूरत नहीं है। जिस टेक्‍नोलॉजी की मदद से ऐसे डिजीटल क्रिमिनल आपके लिए चुनौती बने हैं, उसी टेक्‍नोलॉजी की मदद से आप भी उन्‍हें शिकस्‍त दे सकते हैं।

जैसे कि, अब लगभग सभी प्‍लेटफॉर्म टू फैक्‍टर ऑथेंटिकेशन या टू स्‍टेप वैरिफिकेशन का विकल्‍प देते हैं, जिसे चुनने में हम अक्‍सर आलस दिखाते हैं। जबकि सत्‍यापन के लिए आपके फोन पर आए कोड का इस्‍तेमाल आपको काफी हद तक सुरक्षित कर देता है। इसी तरह कुछ कुछ प्लेटफॉर्म अब बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण जैसे फ़िंगरप्रिंट या चेहरे की पहचान की सुविधा प्रदान करने लगे हैं। यूजर इसे चुनकर अपने अकाउंट को सिक्‍योर कर सकते हैं।

तीसरा तरीका नियमित रूप से पासवर्ड बदलते रहना है। इसके अलावा एंटी फिशिंग टूल जैसे उपायों को अपनाकर भी आप खुद को प्‍लेटफॉर्म फ्रॉडस्‍टरों के चंगुल में फँसने से बचा सकते हैं। आजकल इंटरनेट पर इन सब उपायों के बारे में पर्याप्‍त जानकारियॉं और ट्यूटोरियल्‍स मौजूद हैं। आप इन्‍हें समझने में थोड़ा सा समय दें तो भविष्‍य में बहुत ज्‍यादा सुरक्षा हासिल कर सकते हैं।

इसी प्रकार कंपनियॉं भी फ्रॉड डिटेक्शन सिस्टम, यूजर आईडेंटिटी वेरिफिकेशन, ट्रांजेक्‍शन मॉनीटरिंग, कन्‍ज्‍यूमर एजुकेशन प्रोग्राम, एंटी फ्रॉड सर्विस देने वाली कंपनियों से पार्ट‍नरशिप कर स्‍वयं के लिए और अपने ग्राहकों के लिए प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड के जोखिम को कम कर सकती हैं।

कहने का तात्‍पर्य यह है कि अगर कंपनियॉं सुरक्षा को अपनी कॉस्‍ट कटिंग पॉलिसी के दायरे से बाहर रखें और आप खुद को अपनी बेफिक्री और लापरवाही के दायरे से, तो प्‍लेटफॉर्म फ्रॉड से काफी हद तक बचा जा सकता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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