Caste Census: कांग्रेस के स्थापित चरित्र के विपरीत है जातीय जनगणना का समर्थन
Caste Census: जाति छोड़ो, बंधन तोड़ो के जरिए सामाजिक समरसता बहाल रखने की राह पर चलती हुई कांग्रेस पार्टी ने आजादी के बाद प्रखर समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया का तल्ख विरोध झेला था। कर्पूरी ठाकुर और वीपी सिंह से बैर मोल लेकर सत्ता का परित्याग करना उचित समझा था। इमरजेंसी विरोधियों के हाथों सत्ता गंवाई। मोरारजी देसाई की सरकार में बनी बीपी मंडल रिपोर्ट को दस वर्षों तक लागू करने से मुंह मोड़े रखा। अब अपने पुरखों के उस फैसले को पलटकर कांग्रेस पार्टी ने सत्ता के लिए जातीय जनगणना की मांग में शामिल होने का फैसला कर लिया है।
कांग्रेस पार्टी की कार्यसमिति ने स्थापित चरित्र के उलट वाला यह फैसला सोमवार नौ अक्टूबर को चार घंटों की गहन मंथन और बिहार में जातीय सर्वे के प्रकाशन से माइलेज ले गए नीतीश कुमार की काट के लिए लिया है। नीतीश कुमार इंडिया गठबंधन की ओर से संयोजक होना चाहते हैं। उनकी पार्टी जेडीयू की मांग है कि नीतीश कुमार को इंडिया गठबंधन से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया जाए। 2024 लोकसभा चुनाव की तैयारी के मद्देनजर कांग्रेस पार्टी में भाजपा से मुक़ाबिल रहने के साथ नीतीश कुमार और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की एकला चलो की राह की काट पर गंभीरता से पहल कर रही है। इस लिहाज से जाति जनगणना का समर्थन कांग्रेस पार्टी का चाल और चरित्र बदलने के निर्णय को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक उस समय हो रही थी जब भारतीय चुनाव आयोग पांच राज्यों राजस्थान, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव की उद्घोषणा कर रहा था। लिहाजा लोग उम्मीद कर रहे थे कि कार्यसमिति की बैठक में विधानसभा चुनावों के मजबूत उम्मीदवारों के नाम पर माथापच्ची हो रही होगी। चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ चुनाव लड़ने वाले दिग्गजों के नाम की घोषणा होगी। लेकिन मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ चुनाव में लंबित उम्मीदवारों की सूची पर फैसले की घोषणा की उम्मीद को टालते हुए पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कांग्रेस को नए रंग में रंग देने वाले कार्यसमिति के ऐतिहासिक फैसले की जानकारी दी। उन्होंने साफ किया कि बदलती कांग्रेस पार्टी को सत्ता में आने के लिए जातिवादी तत्वों से समझौता करने में कोई गुरेज नहीं बरतेगी।
विधानसभा चुनाव वाले तीन बड़े राज्य राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी का व्यापक असर है। 2018 के विधानसभा चुनावों में इन तीनों राज्यों की जनता ने कांग्रेस के हक में मतदान किया था। उससे राष्ट्रवाद के नाम पर भारतीय जनता पार्टी की जीत का आंकलन करने वाले चुनावी विश्लेषकों की बड़ी किरकिरी हुई थी। चुनाव वाले तेलंगाना और मिजोरम में कांग्रेस पार्टी प्रमुख विपक्षी दल और मजबूत फोर्स है।
इसलिए कार्यसमिति के फैसले के बाद कांग्रेस पार्टी नए चारित्रिक चेहरे के साथ वजूद की लड़ाई के लिए चुनाव में उतर रही है। अपने स्थापित स्टैंड में अभूतपूर्व बदलाव के साथ कांग्रेस पार्टी ने तत्काल प्रभाव से हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक में जातीय सर्वे कराने का फैसला लिया है। इन दोनों राज्यों में कांग्रेस पार्टी की सरकार है। चुनावी राज्य राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों ने सत्ता में वापसी पर जातीय सर्वे कराने और आबादी के आधार पर लोगों को भागीदारी देने की बात कही है।
जनगणना का संवैधानिक अधिकार केंद्र सरकार के पास है। लिहाजा बिहार में जनगणना नहीं बल्कि जातियों का सर्वेक्षण हुआ है। इसकी रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी का ताजा आरोप है कि बिहार के जातीय सर्वे में चालाकी से लालू प्रसाद और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जाति में कई उपजातियों को शामिल रखकर बड़ा खेल किया गया है। लिहाजा यादव जाति को बिहार में सबसे बड़ी आबादी वाला बता दिया गया है। जबकि ओबीसी व महादलित की श्रेणी में आने वाली कई जातियों को उपजातियों में बांटकर कम आबादी वाला दर्शाया गया है।
बिहार को देखकर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की ओर से जातीय सर्वे करवाने का दवाब का बढ़ना लाजिमी है। कांग्रेस को सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में फिर से पांव जमाने की टेंशन है। लोकसभा चुनाव की तैयारी मद्देनजर उसे सपा से मिलने वाली चुनौती का अंदाजा है इसलिए भी जातीय आरक्षण की मांग का चैंपियन बनने की यह नई कोशिश की गई है।
जनगणना को जातिवार रखा जाए या नहीं संवैधानिक तौर पर यह निर्णय केंद्र सरकार को लेना है। इसलिए कांग्रेस कार्यसमिति ने अभी सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी पर जनगणना में जातियों का उल्लेख करने की मांग के साथ घेरने का फैसला किया है। आगे यह फैसला 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को पुनः स्थापित करने में मदद कर सकता है।
कांग्रेस के इस फैसले पर पार्टी के दिग्गज नेता मानते हैं कि यह फैसला आजादी के आंदोलन की अगुआ और सबसे अधिक समय तक सत्ता में रही कांग्रेस पार्टी के मूलभूत स्वभाव और चरित्र में आमूलचूल परिवर्तन वाला है। भारतीयों में जातीय विभाजन एक बड़ा मुद्दा रहा है। इसे गंभीरता से उकेरकर भारत में धर्मांतरण के धंधे को खूब जमाया गया। इसकी समझ की वजह से ही डॉ भीमराव अंबेडकर ने मुस्लिम और ईसाई बनने वालों को आरक्षण से वंचित रखने का सुझाव दिया था। क्योंकि बाहरी देशों से आए पंथ और धर्मों में लोगों को इस आश्वासन के साथ परिवर्तित किया गया कि उनका धर्म समतामूलक है और उनके यहां जाति और वर्ण के नाम पर कोई विभेद वाली नहीं है। विभेदकारी व्यवस्था के नहीं होने से धर्मांतरित लोगों को समान अवसर मिलता है। इसलिए गैर भारतीय धर्मावालियों को किसी समाजिक आरक्षण की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। मगर वोट की राजनीति ने सब घालमेल कर रखा है।
भारतीयों में समय के साथ जाति और वर्ण विभेद की खाई को भरने की कोशिश को सतत जारी रखने की बात करने वाली कांग्रेस पार्टी आरंभ से शालीनता के साथ समाजिक समरसता और अंतरजातीय एकता की पैरोकार रही है। इसके लिए कांग्रेस के धुरंधर नेताओं ने समाज को क्षेत्रवाद और जाति तोड़ो आंदोलन के लिए प्रेरित करने का काम किया है। इसके लिए आज़ादी के आंदोलन के बाद से ही प्रतीक पेश किए जा रहे हैं। ऐसे में आज के इस मिश्रित आबादी वाले कॉस्मोपॉलिटन कल्चर के दौर में कांग्रेस जैसी पुरानी पार्टी जातीय संकीर्णता को बढ़ावा देने पर उतर आती है, तो समझना चाहिए कि वह किस तरह के राजनीतिक मुसीबत में फंसी है, और मुसीबत से उबरने के लिए कोई भी राह चलने को तैयार है। कांग्रेस के इस नए कैरेक्टर को लोग कैसे लेते हैं, यह देखने वाली बात होगी।
सवाल यह भी है कि क्या इस फैसले से हाशिए पर फंसी कांग्रेस पार्टी की डूबती नैया उबर पाएगी या भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रवाद के आवेग में फंसी कांग्रेस पार्टी के हिस्से एक बार फिर माया मिली न राम वाली नौबत हो जायेगी?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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