Subrata Roy: सफलता, समृद्धि और प्रसिद्धि के उतार चढ़ाव में जीते रहे सहाराश्री
Subrata Roy: सुब्रत रॉय सहारा को लोग जानते भी हैं और नहीं भी जानते। जो लोग उनको जानने के बड़े बड़े दावे करते हैं, वे तो दरअसल उन्हें कतई नहीं जानते। ऐसा इसलिए, क्योंकि वे कल्पनाओं के पार के व्यक्ति थे, अदम्य उत्साही एवं परम पराक्रमी। वे न तो कोई कारोबारी परिवार से थे और न ही परिवार में पहले किसी ने व्यापार किया था, फिर भी केवल दो लोगों के साथ दो हजार रुपए से शुरू करके अपने कारोबार को 20 लाख करोड़ तक पहुंचाने और 9 लाख लोगों को रोजगार देने का पराक्रम भारत में उनके अलावा किसी और के खाते में दर्ज नहीं है।
वे चले गए, मगर यह उनके जाने का वक्त नहीं था। दरअसल, यही सही वक्त था उनको अपना वास्तविक पराक्रम दिखाने का, जो कि वे दिखा भी रहे थे। क्योंकि यश और अपयश का जो मिला जुला हिस्सा किसी भी सफल कारोबारी के जीवन की झोली में आता है, वह सहाराश्री के जीवन में भी आया।

सरकारी कायदे - कानून की उलझनें बहुत मुश्किलों से भरी होती हैं। कहते हैं कि उनमें फंस जाओ तो जीवन के अंत तक निकलना बेहद मुश्किल होता है। इसीलिए, बताए कर्ज के बोझ से भी सैकड़ों गुना ज्यादा संपत्ति के मालिक होने के बावजूद सरकारी नीतियों के जाल में फंस जाने की वजह से पिछले कुछ समय से वे एक अबूझ संकट में थे। मगर भारत से उनको प्रेम था और न्याय व्यवस्था में उनका भरोसा। अंततः निवेशकों के पैसे हड़पने के केस में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी मुश्किलों को समझा और न्याय करते हुए केस को जस का तस रखने का आदेश दिया और सहाराश्री को जमानत भी दे दी थी।
जीवन भर सबको यश, प्रतिष्ठा, मान और सम्मान देनेवाले किसी भी सफल मनुष्य के लिए अपयश का दंश सहना बहुत आसान नहीं होता। वही दंश उन्हें भीतर ही भीतर खाता रहा और अंत में लगातार बीमार करते हुए सन 2023 की दीपावली के दिन उन्हें अस्पताल ले गया, तो फिर वापस घर जाने ही नहीं दिया। अपने मित्र अनिल अंबानी की मालिकी वाले मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी हॉस्पिटल में सहाराश्री 12 नवंबर को इलाज के लिए आए और 14 नवंबर की रात 10.40 बजे 75 साल की उम्र में संसार से सदा के लिए विदा हो गए।
जीवन की सफलताओं के संसार में सुब्रत रॉय की सफलता का गहराई से आंकलन करें, तो यही कहा जा सकता है कि हिम्मत उनमें बहुत गजब की थी, मेहनत करना उनकी आदत में था और हार मानना तो उन्होंने सीखा ही नहीं था। इन्हीं अदृश्य शक्तियों के कारण सफलता ने उनको केवल दो लोगों की एक छोटी सी फाइनेंस कंपनी से शुरूआत करके उड्डयन, सिनेमा, मीडिया, हाउसहोल्ड्स, भवन निर्माण, होटल, रिसॉर्ट्स और ऐसे ही ना जाने किन-किन धंधों में आगे बढ़ते गये जिसने उनकी धमक और चमक दोनों की धार बढ़ाने में जबरदस्त मदद की। वे अपने कर्मचारियों को साथी कहते थे और मिलने पर स्वयं पहले सहारा प्रणाम करते थे। इसी अपनेपन की वजह से वे अपनी कंपनी को कारोबार नहीं बल्कि परिवार कहलाना पसंद करते थे, सहारा इंडिया परिवार।
दरअसल, कोई व्यक्ति एक ही जनम में आखिर क्या क्या हो सकता है, सुब्रत रॉय इसी आश्चर्य के आलोक में अपने उजियारे से अपने आस पास के सभी लोगों को चमकाते व चमत्कृत करते रहे। इस सदी के पहले दशक में तो एक समय ऐसा भी आया जब उनका सहारा इंडिया परिवार देश में सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देने वाली प्राइवेट सेक्टर कंपनियों में सबसे ऊपर पहुंच गया।
अपनी कोशिशों से सफलता का सबसे ऊंचा आसमान रचनेवाले सहाराश्री के जीवन में बारे में बहुत सारे किस्से कहे जाते हैं, ज्यादातर सच, कुछ कल्पित और कुछ कल्पनाओं से पार के भी। मगर हर किस्से के हर हिस्से का अपना किस्सा है और उस हर किस्से में जीवन के अद्भुत रंग हैं और तरंग भी। बिहार के अररिया के एक बंगाली परिवार में 10 जून 1948 को जन्मे सुब्रत रॉय कोलकाता पढ़ने गए और मन नहीं लगा, तो गोरखपुर पहुंच गए और बिस्किट व नमकीन बेचने लगे।
जमींदार परिवार से होने के कारण व्यापार का अनुभव नहीं था, मगर कुछ भी करने और उस किए हुए को शिखर पर पहुंचाने का अदम्य उत्साह व मेहनत उनमें बहुत ज्यादा थी, सो 30 साल की उम्र में 1978 में उन्होंने सहारा इंडिया परिवार नाम से दो लोगों व दो हजार रुपए के फंड से एक छोटी सी कंपनी की स्थापना की जो फाइनेंस सेक्टर में काम करती थी। उन्होंने रोजाना 100 रुपए कमानेवाले लोगों को भी रोज 20 रुपए के निवेश के लिए प्रेरित किया और बीतते वक्त के साथ के साथ सहारा इंडिया परिवार ने व्यापार के विभिन्न क्षेत्रों में अपने विस्तार के साथ ही सबसे बड़े व्यावसायिक साम्राज्य का रूप धर लिया।
सुब्रत रॉय महज 40 की उम्र आते आते सहारा इंडिया परिवार के मुखिया के रूप में भारत के सबसे बड़े कारोबारियों में शामिल हो रहे थे और खुद राज्यसभा में न जाकर दूसरों को वहां भेजने की ताकत बन रहे थे। बाद के दिनों में तो खैर, सहाराश्री भारत के सबसे बड़े स्पॉन्सर के रूप में भी विख्यात रहे। बचपन में कंचे और गिल्ली डंडा खेलने के शौकीन रहे सहाराश्री ने क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल और कई खेलों के खिलाड़ियों को जमकर सहयोग किया, तो कभी सिनेमा देखने का वक्त न निकाल पाने के बावजूद सिनेमा के सितारों की बुझती चमक को फिर से उजाला देनेवाले के रूप में भी विख्यात रहे।
बड़े से भी और ज्यादा बड़ा बनने की कोशिश में सहारा इंडिया परिवार को सुब्रत रॉय रियल एस्टेट सेक्टर में ले गए। प्रस्ताव, प्रोजेक्ट और भविष्य अच्छा था, सो सन 2014 तक उनकी रियल एस्टेट कंपनी में देश के 3 करोड़ लोगों ने 24 हजार करोड़ रुपए निवेश किए। उससे पहले सहारा ने 2009 में शेयर बाजार में उतरने के लिए सेबी के पास जो दस्तावेज जमा कराए थे उनमें गड़बड़ियां बताकर नियमों की अवहेलना के आरोप में सेबी ने सहारा पर 12 हजार करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया और मामला कोर्ट में चला गया। कोर्ट ने सहारा प्रमुख पर सख्ती करते हुए उस 12 हजार करोड़ रुपए के जुर्माने पर 15 फीसदी ब्याज लगाते हुए निवेशकों के 24 हजार करोड़ रुपए लौटाने का आदेश दिया और फरवरी 2014 में सुब्रत रॉय को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया।
निवेशकों का धन लौटाने के मामले में सहारा इंडिया का दावा है कि इस मामले में उनकी कंपनी सारी रकम सेबी में जमा करा चुकी है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा इंडिया के खिलाफ आगे किसी तरह की कार्रवाई पर यथास्थिति बनाए रखते हुए सहाराश्री को जमानत का आदेश दिया था। दो साल जेल में रहने के बाद वे बाहर ही थे। उन्हें न्याय पर भरोसा था और उससे भी ज्यादा खुद पर और भारत माता पर। वे भारत से प्यार करते थे और देश में कई जगहों पर भारत माता के मंदिर भी उन्होंने बनवाए। इसीलिए नीरव मोदी, विजय माल्या और ऐसे ही कुछ लोगों की तरह सहाराश्री विदेश नहीं भागे और भारत में ही आखिरी सांस तक अपने लिए न्याय की लड़ाई लड़ते रहे।
सहाराश्री सफल थे, समृध्द भी थे और प्रसिध्द भी। उनके जीवन का ज्यादातर हिस्सा लखनऊ में गुजरा। वो लखनऊ के एक घर में नहीं बल्कि लखनऊ शहर के बीच बसाये एक शहर में रहते थे, जिसका नाम था सहारा शहर। समाजवादी पार्टी के शासनकाल में इस शहर में अक्सर सितारों की भीड़ भी लगती थी और बेसहारा गरीब लड़कियों के शादी ब्याह का आयोजन भी होता था। उनका हर काम उन्हें एक नये तरह की प्रसिद्धि देता था। कभी कभी विवादित भी बनाता था। लेकिन सहाराश्री तो सहाराश्री थे। अगर उनकी कंपनी उनका परिवार थी तो वो भी कंपनी के मालिक या सीईओ नहीं बल्कि शीर्ष पर विराजमान श्री पुरुष थे।
लेकिन यही सफलता, समृद्धि और प्रसिध्दि उनकी नाव को घाट पर लगाने में अड़चन भी बनी। उनके जीवन का आखिरी दौर सहारा परिवार के पराभव और उनके अपने एकाकीपन और बीमारी में गुजरा। हर दौर के बारे में वे कहते थे कि ये दौर भी गुजर जाएगा। आखिरकार वह दिन भी आया जब स्वयं सहाराश्री भी गुजर गये। अब उनसे जुड़े किस्से ही लोगों के बीच तैरते रहेंगे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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