Startup Funding: स्टार्टअप में क्यों घट रहा है विदेशी पूंजी निवेश?
Startup Funding: अमेरिका और चीन के बाद भारत का स्टार्टअप तंत्र सबसे बड़ा है, लेकिन लगातार घट रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रकोप इस क्षेत्र को भी झेलना पड़ रहा है। कोविड महामारी से उपजी नकारात्मक अर्थव्यवस्था के चलते निवेशकों ने बड़े यूनिकॉर्न की जगह छोटे स्टार्टअप में रुचि लेना शुरू किया था लेकिन वैश्विक मंदी और महंगाई के कारण निवेशकों ने इससे भी मुंह फेरना शुरू कर दिया है।
निवेश घटने के कारण यूनिकॉर्न की संख्या लगातार सिमट रही है वहीं भारी तादाद में छोटे स्टार्टअप फंड के अभाव में निष्क्रिय हो रहे हैं। देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) प्रवाह चालू वित्त वर्ष में 34 प्रतिशत घटकर 10.94 अरब डॉलर रह गया है। पिछले वित्त वर्ष की समान तिमाही में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह 16.58 अरब डालर रहा था। जनवरी-मार्च 2023 तिमाही में भी एफडीआई 40.55 प्रतिशत घटकर 9.8 अरब डॉलर पर रह गया था।

उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से जून तक के 3 महीने में विदेशी निवेश घटकर क्रमशः 5.1, 2.67 और 3.6 अरब डॉलर रह गया है, जबकि पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि में यह आंकड़ा क्रमशः 6.46, 6.15 और 3.18 अरब डॉलर का था।
कोविड से अधिकतम प्रभावित वर्ष 2020 के बाद वर्ष 2021 तथा वर्ष 2022 में बाजार में लंबित मांग के कारण काफी उत्साह का माहौल था। लेकिन चालू वित्त वर्ष में यह उत्साह ठंडा पड़ता दिखाई दे रहा है। वर्ष 2021 में जहां भारत में कुल 42 यूनिकार्न बने वहीं इस साल यूनिकॉर्न स्टार्टअप के आगे बढ़ने के बजाय कर्मचारियों की छंटनी की खबरें ज्यादा आती रही हैं। लगता है जैसे निवेश के अभाव में भारतीय स्टार्टअप का स्वर्णिम दौर अब थम सा गया है। जो भारतीय स्टार्टअप पहले से हैं उनके लिए विदेशी फंडिंग में भारी कमी आई है।
इसके कारणों का विवेचन करने पर हमें सदी के पहले आर्थिक संकट (वर्ष 2008 की मंदी) की याद आती है। भारतीय बाजार में निवेश के संकट की छवि और कारणों को 15 साल पहले आए संकट में तलाश सकते हैं। इंटरनेट की पहुंच बढ़ने के साथ ही जहां डॉट काम कंपनियों की बाढ़ आ गई थी, उनमें बिना ज्यादा सोच विचार किये, निवेश की प्रवृत्ति भी बढ़ गई थी। ऐसा ही कुछ हालिया वर्षों में भी दिखा है। बिजनेस मॉडल और वास्तविक कमाई की जगह वैल्यूएशन की चर्चा अधिक हो रही है। बाजार में इस प्रवृत्ति को ग्रेटर फूल थ्योरी (Greater Fool Theory) या बड़ी बेवकूफी का सिद्धांत कहते हैं। ग्रेटर फूल थ्योरी कहती है कि किसी भी वस्तु या शेयर की कीमत तब तक बढ़ती है जब तक खरीदने वाले को यह यकीन रहता है कि कोई ना कोई मिल जाएगा जो बढ़ी हुई कीमत पर भी उस वस्तु या शेयर को उससे खरीद लेगा।
भारतीय बाजार में निवेशक इसी उम्मीद से निवेश कर रहे हैं कि उनके निवेश लागत से ज्यादा पैसे देकर कोई ना कोई उनके स्टार्टअप को ज्यादा वैल्यूएशन पर खरीदने को तैयार हो जाएगा। इससे बाजार में किसी नई कंपनी के बिजनेस मॉडल, आय के स्रोत और ग्राहक नीति को जांचने परखने का धैर्य नहीं रहता। इस तरह स्टार्टअप में निवेश की हो रही कमी को हम चार प्रमुख कारणों में वर्गीकृत कर देख सकते हैं।
पहला कारण है बाजार अनुरूप उत्पाद का अभाव। कई ऐसे स्टार्टअप मौजूद हैं जिनकी सेवाओं की जरूरत कोई खास दिखती नहीं है। उदाहरण के लिए एक स्टार्टअप 10 मिनट के अंदर आटे की बोरी पहुंचाने की घोषणा करता है तो दूसरा स्टार्टअप पतलून की जेब में खुशबूदार जूता रखकर चलने का मौका प्रदान करता है। भला 10 मिनट के अंदर आटे की बोरी कितने ग्राहकों को चाहिए। अथवा ऐसे कितने शौकीन लोग हैं जो अलग-अलग खुशबू का जूता जेब में रखकर चलना पसंद करेंगे। इस तरह के अजब गजब सेवा प्रदान करने वाले स्टार्टअप की भरमार है।
दूसरा कारण है मितव्ययिता का घोर अभाव। कई स्टार्टअप को फंडिंग आसानी से मिल गई। जिन्हें सहज फंड मिल गया उनमें खर्च करने की प्रवृत्ति बहुत ज्यादा देखी जा रही है। मार्केटिंग में बेतहाशा खर्च को ही निवेश का पर्याय मान लिया गया है। ऐसी कंपनियां जिन्होंने आज तक एक रूपया भी नहीं कमाया है उनके प्रचार पर भारी भरकम खर्च भला कैसे निवेश हो सकता है।
ऐसा भी नहीं है कि सारे स्टार्टअप अपनी वजह से ही असफल हो रहे हैं या फंडिंग के लिए तरस रहे है। सरकार द्वारा समय पर लगाए गए टैक्स कानून और अन्य कानून भी एक महत्वपूर्ण पहलू है। क्रिप्टोकरंसी और स्टार्टअप पर टीडीएस कानून इसकी एक बड़ी वजह है, इससे भी निवेशकों का उत्साह ठंडा पड़ रहा है।
चौथे कारक के रूप में हम ऐसे स्टार्टअप को देख सकते हैं जो समय से थोड़ा आगे हैं। एआई और मशीन लर्निंग पर आधारित स्टार्टअप जो निश्चित रूप से भविष्य में अपना स्थान बना सकते हैं, आज की जरूरत से थोड़ा कटे दिखते हैं। लेकिन यह कारण उतना भी महत्वपूर्ण नहीं है। अगर आइडिया में दम हो तो समय को भी बदला जा सकता है। मालूम हो की शादी डॉट कॉम जैसे स्टार्टअप भारत में तब शुरू हुई जब इंटरनेट की पहुंच नगण्य थी।
प्रश्न है कि आगे की राह क्या हो तो इसका उत्तर भी प्रश्न में ही छुपा है। यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि बिना किसी बिजनेस मॉडल और आय के निरंतर स्रोत वाली स्टार्टअप को फंडिंग मिलने का वक्त चला गया है। जिन्हें फंडिंग मिली भी है उन्हें भी अब वैल्यूएशन के खेल से बाहर निकल लाभ कमाकर दिखाना होगा। मार्केटिंग पर अंधाधुंध खर्च करने के बजाय सप्लाई चेन मजबूत करना और अपनी सेवा और उत्पाद की गुणवत्ता में सुधार लाना होगा।
कई एक स्टार्टअप जो दुबई जैसे देशों का रुख कर रहे हैं हमें उन्हें भारत में ही व्यापार करने के लिए प्रोत्साहन देना जारी रखना होगा। हम अपने स्टार्टअप के लिए केवल बाहरी निवेशकों का मुंह नहीं ताक सकते। नई पीढ़ी को आधिकाधिक आगे कर आईटी आधारित स्टार्टअप को प्रोत्साहित करने की जरूरत है। ऐसे स्टार्टअप जो सामाजिक सरोकार जैसे कचरा प्रबंधन, सीवर ट्रीटमेंट जैसे क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं उनको भी बढ़ावा देने की जरूरत है। जरूरी नहीं है कि हर नया स्टार्टअप ड्रोन टेक्नोलॉजी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर ही काम करें, गोबर और इथेनॉल से ऊर्जा पैदा करनेवाले स्टार्टअप या एमएसएमई सेक्टर के छोटे स्टार्टअप निवेश योजना में शामिल होने चाहिए।
हमारे स्टार्टअप को आज यह समझना होगा कि सिर्फ वैल्यूएशन और फंडिंग जुटा लेना ही सफलता का सूत्र नहीं है। ऐसा उत्पाद बनाना और ऐसी सेवा देना जरूरी है जिसके लिए उपभोक्ता खुद से पैसे देने को तैयार हो। सिर्फ कूपन डिस्काउंट और मुफ्त ऑफर के आधार पर जुटाया गया उपभोक्ता कभी भी टिकाऊ नहीं हो सकता।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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