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Soren Family JMM: क्या कल्पना सोरेन की एन्ट्री से मजबूत होगी झामुमो की पकड़?

Soren Family JMM: Will Kalpana Soren's entry strengthen JMM's hold?

Soren Family JMM: गिरिडीह के झंडा मैदान में 4 मार्च को झामुमो स्थापना दिवस की रवायत पूरी करने के लिए लोग जुटे। मंजर आम नहीं रहा। हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन की मौजूदगी ने इसे खास बना दिया।

झारखंड मुक्ति मोर्चा के सुप्रीमो शिबू सोरेन बुजुर्ग हो चले हैं। उनकी पत्नी व पूर्व सांसद रूपी सोरेन की सेहत ठीक नहीं इसलिए दोनों आ न सके। उनके पुत्र और झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन जेल में हैं। लिहाजा उनका आना भी मुमकिन न हो सका। शून्यता को भरने पहली बार घर की देहरी लांघकर पूर्व मुख्यमंत्री की पत्नी कल्पना सोरेन रैली को संबोधित करने पहुंची।

Soren Family JMM

राज्य में सत्तारूढ़ झामुमो के समर्थक मानते हैं कि माहौल अगर ऐसा ही बना रहा तो प्रतिपक्षियों खासकर भारतीय जनता पार्टी के लिए लोकसभा चुनाव परेशानी का सबब बन सकता है। झंडा मैदान की झामुमो स्थापना दिवस रैली में ढोल, मृदंग और गाजे बाजे से बड़े नेताओं की गैरमौजूदगी के गम दूर करने की कोशिशों के बीच एक वक्त ऐसा भी आया जब कल्पना सोरेन का धीरज जवाब दे गया। वह फूटफूटकर रोने लगीं। उसे देख क्या मंच, क्या भीड़, सबकी आंखें नम हो गईं। कुछ क्षणों की चुप्पी के बाद भाव विह्वल कल्पना का ढांढस बढ़ाने के लिए समर्थकों के बीच नारे तेज हो उठे "अरे! जेल का ताला टूटेगा, हेमंत सोरेन छूटेगा।"

भारतीय सेना के रिटायर कैप्टन अम्पा मुर्मू की बेटी कल्पना सोरेन 2006 से झारखंड के सबसे कद्दावर शिबू सोरेन परिवार की दूसरी बहू हैं। खुद को राजनीतिक मंचों से दूर रखने वाली कल्पना ने पहली सार्वजनिक उपस्थिति में ही समर्थकों का विश्वास जीत लिया।

51 वर्ष पहले इसी तारीख 4 मार्च को गिरिडीह के ऐतिहासिक झंडा मैदान में शिबू सोरेन ने अपने साथी बिनोद बिहारी महतो व अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की स्थापना की थी। राजनीतिक दल झामुमो की स्थापना का उद्देश्य अलग राज्य के संघर्ष को हवा देना था। लेकिन समय के साथ स्थापना के समय के बाकी साथी और उनके परिजन दरकिनार होते गए।

झामुमो का नेतृत्व जुझारू शिबू सोरेन के हाथों सिमटता चला गया। कठिन लंबे संघर्ष की वजह से उन्हें झारखंड में 'दिशाम गुरु' यानी पथ प्रदर्शक कहा जाता है। झामुमो की स्थापना के समय भी किसी को कतई यह आभास नहीं रहा होगा कि गिरिडीह का यह मैदान झामुमो स्थापना दिवस से तीन साल छोटी कल्पना सोरेन के राजनीति में पदार्पण का आधार बनेगा।

अपने पहले ही राजनीतिक भाषण में कल्पना सोरेन ने पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को राज्य की जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताने और उनके खिलाफ गहरी राजनीतिक साजिश का हवाला देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने केन्द्र की सत्ती में बैठी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मज़बूत नैरेटिव गढ़ने का काम किया। इसका असर आगामी लोकसभा चुनाव में झारखंड की सभी 14 लोकसभा सीटों पर पड़ेगा और अगर यही राजनीतिक सूरत बनी रही तो साल के अंत में होने वाले झारखंड विधानसभा चुनाव में भी देखने को मिल सकता है।

2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ बने गठबंधन का नेतृत्व करते हुए हेमंत सोरेन ने स्पष्ट जनादेश हासिल किया था। कल्पना सोरेन के मुताबिक सरकार के बेहतर कामकाज से घबराई भाजपा ने आरंभ से ही मुख्यमंत्री को आरोपों से परेशान करना शुरू कर दिया। पहले सीबीआई और फिर मुख्यमंत्री को गिरफ्तार करने के लिए ईडी जैसी एजेंसी लगा दी गई।

कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत की गिरफ्तारी से स्पष्ट नेतृत्व की कमी का शिकार झामुमो अब तक लोकसभा प्रत्याशियों की घोषणा तक नहीं कर पाया है। संभव है कि गिरिडीह में कल्पना की हुंकार के बाद पार्टी पर हेमंत की पकड़ मजबूत हुई हो और जल्द ही झामुमो- कांग्रेस गठबंधन के प्रत्याशियों को चुनावी रण में उतारने का फैसला ले लिया जाए। जबकि राज्य में गठबंधन मुक्त भाजपा ने झारखंड से सभी लोकसभा सीटों के अपने प्रत्याशियों के नामों की घोषणा पहली ही लिस्ट में कर दी है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चाबंदी का हवाला दे रही भाजपा की लिस्ट में चाईबासा से कांग्रेस की सांसद गीता कोड़ा शामिल हैं। चार हजार करोड़ रुपए के भ्रष्टाचार के आरोप में जेल में बंद रहे पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा ने राजनीति में भाजपा विरोधी लोगों से मिली सहानुभूति का भरपूर लाभ उठाया। समय चक्र की गति पूरा होने बाद पति के साथ वापस भाजपा में आईं हैं।

विपत्ति काल में झामुमो की नई नेत्री के तौर पर उभरी कल्पना सोरेन जब मंच से आहत बुजुर्ग शिबू सोरेन के आंसुओं का हवाला दे रही थीं ऐन उसी वक्त सुप्रीम कोर्ट 'नोट के बदले वोट' मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुना रहा था। फैसले में जनप्रतिनिधियों को राहत देने वाले 26 साल पुराने फैसले को पलट दिया गया है। यह मामला झामुमो के चार सांसदों के 1993 में अल्पमत नरसिंह राव सरकार को नोट लेकर बचाने का है। इसमें सीबीआई ने जांच में शिबू सोरेन व उनके सहयोगियों की वोट के बदले नोट लेने में स्पष्ट संलिप्तता पाई थी मगर संविधान के अनुच्छेद 105 में जनप्रतिनिधियों को मिली विशेष छूट का हवाला देकर 1998 में सुप्रीम कोर्ट का फैसले आया। तब उससे झामुमो सांसदों को बड़ी राहत मिली।

इसी आधार पर झारखंड से राज्यसभा चुनाव में धन लाभ लेकर वोट देने की आरोपी विधायक सीता सोरेन को राहत मिली हुई थी। विधायक सीता सोरेन शिबू सोरेन की बड़ी बहू हैं और दिवंगत पुत्र दुर्गा सोरेन की पत्नी हैं। सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से शिबू सोरेन के साथ ही सीता सोरेन के राजनीतिक भविष्य पर संदेह के बादल मंडराने लगे हैं। अगर पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पर भी भ्रष्टाचार के लगे कई आरोपों में से कोई एक भी सुप्रीम कोर्ट तक जाकर सही सिद्ध होता है तो लालू प्रसाद की तरह ही उन्हें चुनावी राजनीति से अलग होना पड़ेगा।

ऐसे में कल्पना सोरेन के लिए भ्रष्टाचार के कीचड़ से बचकर चलने की चुनौती रहेगी। क्योंकि वह नई उम्मीद बनकर सामने आई हैं। पांच दशक पुरानी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा अब भविष्य की अपनी ताकत को कल्पना सोरेन के सहारे ही बचाने की रणनीति पर काम कर रही है।

झारखंड के वोटरों में जेल भेजे गए आदिवासी नेताओं के प्रति जो हमदर्दी देखने को मिली है, उसके आधार पर कल्पना सोरेन का भविष्य अधर में नहीं दिख रहा। मौजूदा मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन का प्रभाव क्षेत्र समस्त झारखंड के बजाय महज कोल्हान इलाके तक सीमित हैं, वहां से सांसद गीता कोड़ा भाजपा की लोकसभा प्रत्याशी हैं। लोकसभा चुनाव की आचार संहिता लागू होने को है।

ऐसे में मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की अपने ही क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा है। वह जेल में बंद हेमंत सोरेन के यशोगान में व्यस्त रखते हैं। और खुद को कल्पना को सत्ता तक पहुंचाने की सीढ़ी ही मानकर चल रहे हैं। कल्पना सोरेन का झारखंड की राजनीति में सहानुभूति लहर पर सवार होकर सामने आना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती का सबब बन सकता है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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