Shankaracharya Jayanti: राष्ट्रीय एकता के सूत्रधार आद्य शंकराचार्य

आद्य शंकराचार्य ने भारत को एक सूत्र में पिरोने का जो महान कार्य किया था उसका भारत की एकता और अखंडता में बहुत बड़ा योगदान है।

Shankaracharya Jayanti

भारत की विविधता पश्चिमी जगत के लिए तो सदैव आश्चर्य एवं शोध की विषयवस्तु रही ही है, अनेक भारतीय भी इसे लेकर मतिभ्रम के शिकार रहे हैं। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भेदकारी बुद्धि से संपूर्ण भारतवर्ष में व्याप्त राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता का आंकलन किया ही नहीं जा सकता। उसके लिए तो समग्र दृष्टि चाहिए। जो लोग पश्चिमी राष्ट्र-राज्य की कसौटी पर भारत को कसते हैं, उन्हें अंततः निराशा ही हाथ लगती है।

वस्तुतः भारत की संप्रभुता जन में निहित है। यह राज्य (स्टेट) में न होकर धर्म, समाज और संस्कृति में है। ध्यान रहे कि भारत के लिए धर्म कर्त्तव्य-बोध या आचरणगत सदाचार है। एकता एवं अखंडता के सूत्र व तत्त्व हमने राज्य एवं राजनीति में नहीं, अपितु धर्म, अध्यात्म एवं संस्कृति में खोजे और पाए हैं। धर्म एवं संस्कृति ही हमारी चेतना को झंकृत करती है। वही हमारी प्रेरणा के अजस्र स्रोत हैं। इसीलिए हमारे यहां आम धारणा है कि धर्म व संस्कृति जोड़ती हैं, राजनीति तोड़ती है।

इसे आदि शंकराचार्य ने मात्र 32 वर्ष की अल्पायु में संपूर्ण भारतवर्ष का तीन बार पैदल भ्रमण कर बख़ूबी समझा और सतत साधना के बल पर प्रत्यक्ष अनुभव किया था। कदाचित यही कारण रहा कि वे राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता के स्थाई, मान्य एवं व्यावहारिक सूत्र देने में सफल रहे। पूरब से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक राष्ट्र को एकता एवं अखंडता के सूत्र में पिरोने में उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिली। सुदूर दक्षिण में जन्म लेकर भी वे संपूर्ण भारतवर्ष की रीति-नीति को भली-भाँति समझ पाए।

ईश्वर की सर्वव्यापकता, जीव-जगत-ब्रह्म के अंतःसंबंधों तथा इस चराचर में व्याप्त एक ही परम तत्त्व की उन्होंने प्रत्यक्ष अनुभूति की। इस प्रत्यक्ष अनुभूति के बल पर ही वे काल-प्रवाह में आए द्वैत का निराकरण कर तत्कालीन मतों को अद्वैत भाव से जोड़ पाए। उनका अद्वैत दर्शन सब प्रकार के भेद को दूर कर आत्मा को परमात्मा, जीव को ब्रह्म तथा व्यक्ति को प्रकृति से जोड़ने का माध्यम है। उनका अद्वैत दर्शन काल एवं देश की सीमाओं से परे एक विश्व-दर्शन है, जिसमें संपूर्ण मानवता के कल्याण का भाव निहित है।

उन्होंने एक ऐसी समन्वयकारी धार्मिक व्यवस्था दी कि वेश-भूषा, खान-पान, जाति-पंथ, भाषा-बोली की बाहरी विविधता कभी हम भारतीयों को आंतरिक रूप से विभाजित करने वाली स्थाई लकीरें नहीं बना पाईं। किसी ने ऐसा प्रयास भी किया तो उसे व्यापक सफलता नहीं मिली। आद्य शंकर के समन्वयकारी दर्शन एवं तर्कशुद्ध-तात्त्विक चिंतन ने अलग धाराओं को भी मूल धारा में समाहित कर लिया। यह उनकी दी हुई दृष्टि ही थी कि बुद्ध भी विष्णु के दसवें अवतार के रूप में घर-घर पूजे गए।

उन्होंने ऐसा राष्ट्रीय बोध दिया कि दक्षिण में पैदा हुआ व्यक्ति कम-से-कम एक बार अपने जीवन में उत्तर के काशी, केदार, प्रयाग, बद्रीनाथ की यात्रा करने की आकांक्षा रखता है तो वहीं पूरब के जगन्नाथपुरी का रहने वाला पश्चिम के द्वारकाधीश, सोमनाथ की यात्रा कर स्वयं को कृतकृत्य अनुभव करता है। देश के चार कोनों पर चार मठों एवं धामों की स्थापना कर उन्होंने एक ओर देश को मज़बूत एकता-अखंडता के सूत्रों में पिरोया तो दूसरी ओर विघटनकारी शक्तियों एवं प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया।

तमाम आरोपित भेदभावों के बीच आज भी गंगोत्री से लाया गया गंगाजल रामेश्वरम में चढ़ाना पुनीत कर्त्तव्य समझा जाता है तो जगन्नाथपुरी में खरीदी गई छड़ी द्वारकाधीश को अर्पित करना परम सौभाग्य माना जाता है। ये चारों मठ एवं धाम न केवल हमारी आस्था एवं श्रद्धा के सर्वोच्च केंद्रबिंदु हैं, अपितु ये आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक चेतना के सबसे बड़े संवाहक भी हैं।

उन्होंने द्वादश ज्योतिर्लिंगों का जीर्णोद्धार कराया। उन द्वादश ज्योतिर्लिंगों एवं 52 शक्तिपीठों की तीर्थयात्रा की आकांक्षा सभी सनातनियों के मन में सदैव रहती है। अखंड भारत में फैले ये द्वादश ज्योतिर्लिंग एवं 52 शक्तिपीठ हमारी सांस्कृतिक एकता के सर्वमान्य प्रतीक हैं। इनके प्रति पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण के लोगों की समान आस्था एवं श्रद्धा है। यह आस्था एवं श्रद्धा हमें आत्मिक तल पर सदैव जोड़े रखती है। यह विविधताओं के मध्य एकता की अनुभूति कराती है और देश के भूगोल को भी जोड़ती है।

शंकराचार्य ने हर बारह वर्ष के पश्चात महाकुंभ के अवसर पर भिन्न-भिन्न पंथों-मठों के संतों-महंतों, दशनामी संन्यासियो के मध्य संवाद तथा सहमति की व्यवस्था दी। उस मंथन एवं संवाद से निकले अमृत रूपी ज्ञान को जन-जन तक ले जाने की दृष्टि और संकल्प दिया। धर्म-दर्शन पर होने वाले मुक्त विमर्श एवं शास्त्रार्थ का ही सुखद परिणाम है कि सनातन संस्कृति एवं हिंदू-चिंतन में परंपरा के लिए तो सम्मान है, पर काल-विशेष में प्रचलित रूढ़ियों के लिए कोई स्थान नहीं है।

यह उन जैसे असाधारण तपस्वियों के प्रयासों का ही फल है कि हर कुंभ मेले पर लघु भारत का विराट स्वरूप उमड़ पड़ता है। करोड़ों श्रद्धालुओं का वहां एकत्रित होना, पवित्र नदी में डुबकी लगाना, व्रत-नियम का पालन करना, तंबु-डेरा डालकर हरिद्वार-प्रयाग-उज्जैन-नासिक में कई-कई दिनों तक निवास करना - संपूर्ण विश्व को विस्मय-विमुग्ध कर जाता है। वहां भाषा, जाति, प्रांत, पंथ व संप्रदाय की सभी बाहरी एवं कृत्रिम दीवारें स्वयंमेव ढह जाती हैं, और पारस्परिक एकता, सद्भाव, सहयोग एवं प्रेम का भाव साकार हो उठता है।

हर पीढ़ी के लिए आद्य शंकराचार्य की कृति चिंतन, मनन, अध्ययन के लिए समान रूप से उपयोगी है। निश्चय ही उनका जीवन एवं संदेश राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की भावना के संचार में सहायक है।

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