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11 फरवरी को तय होगा 'शाहीन बाग' सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

शाहीन बाग सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

भारत के शासन-प्रशासन की ताकत का सर्वोच्च केंद्र व देश का दिल कहे जाने वाली राजधानी दिल्ली में चल रहे विधानसभा चुनावों के लिए वोटरों ने 8 फरवरी को अपना वोट डालकर सभी प्रत्याशियों के भविष्य को ईवीएम मशीन में बंद कर दिया है, दिल्ली का सेहरा किस दल के सर पर बंधेगा, उसका परिणाम मतगणना के बाद 11 फरवरी को आयेगा। लेकिन यह तय हो गया है कि इस बार का दिल्ली विधानसभा चुनाव आरोप-प्रत्यारोप व तरह-तरह के हथकंडे अपनाये जाने के लिए हमेशा याद रखा जायेगा, इन मुद्दों में नेताओं की कृपा से जनहित के मसलों पर 'शाहीन बाग' में चल रहा धरना पूरे चुनावों में जबरदस्त रूप से हावी रहा, इस धरने के मसले ने आमजनमानस की ज्वंलत समस्याओं पर नेताओं को चुप्पी लगाने का स्वर्णिम अवसर प्रदान कर दिया, उनको दिल्ली की जनता के कटु सवाल से बचा दिया। जहां एक तरफ अब दिल्ली के चुनाव परिणामों के बारे में तरह-तरह के तर्क-वितर्क के आधार पर देशवासी कयास लगाने में व्यस्त हैं, वही दूसरी तरफ देश की मीडिया के एग्जिट पोल के अनुसार दिल्ली में एकबार फिर आप पार्टी की सरकार बन रही है। लेकिन इन चुनावों में माहौल पूर्ण रूप से भाजपा के विपरीत होने के बाद भी, गृहमंत्री अमित शाह व पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा की जबरदस्त मेहनत के बलबूते भाजपा की स्थिति अच्छी रहने की उम्मीद है, वही कांग्रेस के चुनाव पूर्व ही हार मानने वाले रवैये व पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के उदासीन रवैये के चलते पार्टी के खाता खुलने पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।

शाहीन बाग सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनावों में सत्ता पक्ष व विपक्ष के कुछ राजनेताओं के द्वारा जिस तरह 'शाहीन बाग' में चल रहे धरने का चुनावों में जमकर प्रयोग किया गया है, वह साबित करता है कि पक्ष-विपक्ष के राजनेताओं के पास लोगों को उकसाने व लड़ाने के अलावा कोई आमजनमानस के हितों का मुद्दा नहीं है, उनके पास जन कल्याण के हित करने के लिए कोई ठोस कारगर प्लानिंग, रणनीति व रूपरेखा नहीं है। देश के कुछ राजनेता केवल अपना राजनीतिक हित साधकर हर समय सत्ता की मलाई लूटने के लिए बेहद उतावले है, उनको देश की एकता, अखंडता, अमनचैन-शांति व विकास से कोई सरोकार नहीं है। जिस तरह से इस बार चुनावों के प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों के चंद नेताओं ने अपनी सीमाओं को लांघते हुए, केवल चुनाव जीतने की खातिर अपने जहरीले व्यंग्य बाण चलकर समाज में आपसी भाईचारे को खत्म करने का प्रयास किया है, वह भारतीय संविधान और नियम कायदे कानून पंसद व्यक्तियों व सभ्य समाज के लिए बहुत ही घातक है। मात्र चुनावों में लाभ लेने के अपने क्षणिक राजनीतिक हित साधने के लिए जिस तरह से कुछ नेताओं के आशिर्वाद से समाज में आपसी भाईचारे को खत्म करने के लिए तरह-तरह की नौटंकी करके षडयंत्र रचे गये है, कही ना कही वह चंद नेताओं के द्वारा भारत की एकता अखंडता व लोकतांत्रिक व्यवस्था के मूल्यों को दी गयी कड़ी चुनौती है।

शाहीन बाग सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

21वीं सदी के आधुनिक भारत में भी देश के जानेमाने प्रतिष्ठित नेताओं के द्वारा दिये गये उलजलूल बयानों के चलते पूरे चुनाव प्रचार के दौरान दिल्ली में बेहद तनाव पूर्ण माहौल बना रहा। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान सत्ता पक्ष व विपक्ष में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन कुछ लोगों ने जिस तरह समाज में जहर बोया व बाट़ा है वह दर्शाता है कि वो भारत के संविधान के प्रति अपने धर्म का सही ढंग से निर्वाह करने के लिए तैयार नहीं हैं, उन्होंने केवल अपने व अपने राजनीतिक दलों के हितों को साधने के लिए दिल्ली की आवोहवा में जहर फैलाकर समाज को बाट़ने का कार्य किया है, जो चुनावी परिपाटी भविष्य में भारतीय लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है। इस बार के चुनावों में हर समय कुछ नेताओं की कृपा से दिल्ली में बने बेहद तपिश युक्त माहौल से झुलस रही सम्मानित जनता को शांतिपूर्वक ढंग से चुनाव संम्पन्न होने से बहुत राहत मिली है।

शाहीन बाग सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

यह तो देश की जनता को समय ही बतायेगा कि 11 फरवरी को जब मतगणना के बाद चुनाव परिणाम आयेंगे, तब राजनीतिक दलों के लिए 'शाहीन बाग' संयोग बनेगा या एक नया राजनीतिक प्रयोग बनेगा। लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनावों में यह जरूर तय हो गया है कि देश के अधिकांश राजनेताओं को केवल अपने राजनीतिक हितों की चिंता रहती है, जनता के दुख दर्द किसी के लिए कोई मायने नहीं रखता हैं। क्योंकि जिस तरह से सारा चुनाव 'शाहीन बाग' के इर्दगिर्द रहा और फिर भी किसी भी दल को ना तो 'शाहीन बाग' में धरना देने वाली जनता की चिंता है, ना ही इस धरने की वजह से रोजाना लाखों लोगों को हो रही दिक्कतों की चिंता है और रोजाना लोगों के व देश के करोड़ों रुपये के नुकसान की चिंता है, जो अपने ही स्वार्थ पूर्ति के धुन में मस्त देश के कुछ नेताओं के स्वार्थी रवैये को दर्शाता है।

शाहीन बाग सत्ता दिलाने का योग बनेगा या केवल विफल प्रयोग

खैर जो भी हुआ सो हुआ लेकिन दिल्ली विधानसभा सभा के चुनाव हम सभी देशवासियों को एक करारा सबक दे गया है कि हमको देशहित में अपनी जिम्मेदारियों का स्वंय ही सही ढंग से पालन करते हुए, देश व समाज हित के लिए और अपनी समस्याओं व अधिकारों के लिए स्वयं ही जागरूक रहना होगा, वरना जिस तरह की राजनीतिक सोच आजकल देश के कुछ राजनेताओं की हो गयी है कि उनके लिए अपना हित सर्वोपरि हो गया है देश उनकी प्राथमिकता नहीं है वह ठीक नहीं है। इसलिए अब समय आ गया है जब देश की जनता को दलगत राजनीति से ऊपर उठकर लोकलुभावन व ज्वंलत मुद्दों के झांसे में आने की जगह देश की एकता, अखंडता व समाज के हित को सर्वोपरि मानने वाले सच्चे ईमानदार लोगों को राजनीति में आगे बढ़ाना होगा, तब ही देश व समाज का भला होगा।

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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