सेक्युलर राजनीति: गुजरात दंगों पर बार-बार चर्चा लेकिन गोधरा कांड पर एक बार भी नहीं
22 फरवरी 2002 को कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को एक पत्र लिखा। जिसमें उन्होंने अयोध्या में हो रही कारसेवा पर चिंता करते हुए जल्दी-से-जल्दी सभी दलों की एक संयुक्त बैठक बुलाने की मांग की। प्रधानमंत्री वाजपेयी ने उनकी इस मांग को स्वीकार कर लिया और 26 फरवरी की शाम को यह बैठक बुलाई गयी। अगले ही दिन, सुबह के 8-9 बजे के बीच, साबरमती एक्सप्रेस से अयोध्या से लौट रहे कारसेवकों को गुजरात के गोधरा शहर में हिंसक भीड़ ने रोककर, ट्रेन में आग लगा दी। जिसमें 59 हिन्दू कारसेवकों की मौत और 24 बुरी तरह से झुलस गए। बाद में इन घायलों में से कितने लोगों ने अपनी जान गंवाई, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

जिस दिन यह अमानवीय घटना हुई, उस दिन संसद में केंद्रीय बजट पेश किया जा रहा था। शाम होने तक गुजरात के कुछ हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे और अगले दो दिन तक वहां स्थिति तनावपूर्ण बनी रही। हालाँकि, राज्य सरकार की मुस्तैदी के चलते मात्र 17 घंटों में दंगों पर लगभग काबू पा लिया गया और 2 मार्च तक राज्य में शांति स्थापित हो गयी थी।
गुजरात में तो जन-जीवन सामान्य अवस्था में लौटने लगा था लेकिन दिल्ली में विपक्षी दलों को यह शांति खटकने लगी थी। कांग्रेस और वामपंथी दलों ने राज्य की विधानसभा भंग करने और राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे की मांग करनी शुरू कर दी। जबकि 1969 में अहमदाबाद में सांप्रदायिक दंगे हुए थे। उस दौरान वहां कांग्रेस के हितेंद्र देसाई मुख्यमंत्री थे और केंद्र में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार थी। हैरानी की बात यह है कि इन दंगों की जाँच के लिए न कोई एसआईटी गठित हुई और न ही न्यायालयों में मुकदमें चले। गैर-सरकारी संगठनों और मानवाधिकार संगठनों की तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया सामने नहीं आई। फिर 1985 में गुजरात में दंगे हुए, तब कांग्रेस के माधव सिंह सोलंकी मुख्यमंत्री थे और केंद्र में प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की सरकार थी। उस दौर में भी सोलंकी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
1984 के सिख विरोधी दंगों में दिल्ली में 3,000 से ज्यादा सिखों का नरसंहार कर दिया गया। यह बात किसी से नहीं छुपी है कि इन दंगों में कांग्रेस के हर स्तर के कार्यकर्ता की सीधे-सीधे भूमिका थी। फिर भी कांग्रेस ने आजतक अपने किसी भी नेता पर कोई कार्यवाही नहीं की, बल्कि उन्हें इनाम के तौर पर लोकसभा की टिकट दी गयी, राज्यसभा का सदस्य बनाया और कई तो बाद में अलग-अलग राज्यों के मुख्यमंत्री भी बने।
दरअसल, यह मुद्दा 2002 के दंगे बनाम अन्य दंगों का नहीं बल्कि कांग्रेस की दोहरी राजनीति का है। जब वे सत्ता में थे तो उन्होंने दंगों को कानून-व्यवस्था से जोड़कर रफा-दफा कर दिया। फिर जब वे सत्ता से बाहर हुए तो उन्हें 2002 के दंगों के अलावा कुछ दिखाई ही नहीं देता था। जबकि कांग्रेस के कई नेताओं की गोधरा नरसंहार व दंगों दोनों में संलिप्तता थी। पंचमहल जनपद के कांग्रेस नेता मोहम्मद एहसान कलटा ने ही भीड़ को साबरमती एक्सप्रेस में आग लगाने के लिए उकसाया था। कांग्रेस के एक और नेता अब्दुल गफ्फार शेख ने ट्रेन में लगी आग को बुझाने के लिए आई फायर बिग्रेड की गाड़ी को आगे बढ़ने से रोक दिया। ऐसे एक नहीं, कई नाम थे जिनके कांग्रेस से सबंध थे, फिर भी पार्टी की तरफ से उन पर कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
बावजूद इसके, उधर दिल्ली में सोनिया गाँधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों का प्रतिनिधि मंडल राष्ट्रपति अब्दुल कलाम से मिला और राज्य की नरेन्द्र मोदी सरकार को बर्खास्त करने की सिफारिश की। फिर सभी राजनीतिक दलों की तरफ से एक प्रतिनिधि मंडल गुजरात का दौरा भी करने गया। जिसके बाद 11 मार्च 2002 को लोकसभा में नियम संख्या 193 के अनुसार गुजरात के दंगों पर चर्चा हुई। आठ घंटे तक चली इस बहस में लगभग सभी दलों के कुल 24 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इस पूरी चर्चा के दौरान भी विपक्षी दलों का एकमात्र ध्यान राज्य के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस्तीफे और राज्य विधानसभा भंग करने पर ही अधिक था। सभी को अपनी बात कहने का भरपूर समय मिला। फिर भी पहले सोमनाथ चटर्जी और बाद में सोनिया गाँधी अपने-अपने दलों के साथ सदन का बहिष्कार करने लगे और यह कहते हुए बाहर आ गए कि इस चर्चा से हम संतुष्ट नहीं है।
अतः वाजपेयी सरकार ने विपक्षी दलों की संतुष्टि के लिए एकबार फिर इस विषय पर चर्चा कराने की मांग को स्वीकार कर लिया। इस बार मुलायम सिंह यादव ने 30 अप्रैल 2002 को देश के अल्पसंख्यको - मुसलमानों की सुरक्षा पर चिंता व्यक्त करते हुए दोपहर के 12 बजकर 4 मिनट पर एक प्रस्ताव लोकसभा में पेश किया। सभी दलों के कुल 35 सदस्यों ने गुजरात दंगों को लेकर अपने-अपने तथ्य रखे। अंत में अगले दिन यानि 1 मई को सुबह 4 बजकर 16 मिनट पर प्रस्ताव पर मतदान हुआ जिसके पक्ष में 194 जबकि विरोध में 281 मत मिले। इस प्रकार मुलायम सिंह का प्रस्ताव लगातार साढ़े सोलह घंटों तक चली ऐतिहासिक चर्चा के बाद अस्वीकृत हो गया।
विपक्ष को अभी तक अपनी बात खुलकर कहने का दो बार मौका मिल चुका था। फिर भी उनके मन में मुख्यमंत्री मोदी के इस्तीफे की कसक बाकी थी। इसलिए 23 जुलाई 2002 को दोपहर 12 बजकर 9 मिनट पर गुजरात दंगों पर तीसरी बार चर्चा शुरू हुई जो रात्रि 8 बजकर 17 मिनट पर समाप्त हुई। इस बार 8 घंटों से भी अधिक समय तक 25 सदस्यों ने अपनी बात रखी।
फिर इसी साल नवम्बर में सदन का शीत कालीन सत्र शुरू हुआ और लोकसभा में चौथी बार गुजरात दंगे पर बहस की मांग उठने लगी। इस क्रम में, 18 नवम्बर 2002 को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (मार्क्सवादी) के सुबोध रॉय ने केंद्र सरकार के खिलाफ एक प्रस्ताव पेश किया। जिसपर साढ़े छह घंटों तक बहस चली और 24 सदस्यों ने हिस्सा लिया। हालाँकि, चर्चा के अंत में यह प्रस्ताव स्वीकृत हो गया।
अब इन्ही दंगों से जुड़ा दूसरा दुखद पहलू देखिये, दरअसल, जब गोधरा में साबरमती ट्रेन को जलाया गया तो उसके तुरंत बाद केंद्रीय गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवानी ने लोकसभा में एक वक्तव्य देने की कोशिश की। 28 फरवरी को देश का बजट संसद में पेश किया गया था। जैसे ही वित्त मंत्री का बजट भाषण समाप्त हुआ तो गृह मंत्री ने दोहपर के 1 बजकर 5 मिनट पर गोधरा में मारे गए हिन्दुओं पर अपनी बात रखनी शुरू की। दुर्भाग्य इतना था कि विपक्षी दलों विशेषकर कांग्रेस द्वारा उनके बयान के बीच 42 बार व्यवधान डाला गया और मात्र 13 मिनट बाद 1 बजकर 18 मिनट पर गृह मंत्री को बैठना पड़ गया। हंगामा इतना मचा कि आखिरकार सदन की कार्यवाही अगले दिन के लिए स्थगित हो गयी।
इस प्रकार एक साल के अंतराल में लोकसभा के दो सत्रों में गुजरात दंगों पर कुल चार बार चर्चा हुई। इसमें पक्ष-विपक्ष के 108 लोकसभा सदस्यों ने हिस्सा लिया और कुल 38।6 घंटों तक सदन की कार्यवाही चली। मगर गोधरा नरसंहार पर तब के विपक्षी दलों ने बमुश्मिल 10 मिनट भी सहिष्णुता का परिचय नहीं दिया।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)
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