'ये तो होना ही था'- केजरीवाल के 'चाणक्य' ने क्यों छोड़ा साथ? 2024 में पड़ा था दरार का बीज!
Sandeep Pathak Exit From AAP Reason: 'ये तो होना ही था'...राजनीति के गलियारों में आज यही एक लाइन सबसे ज्यादा दोहराई जा रही है। AAP के राष्ट्रीय संगठन महासचिव और केजरीवाल के सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार डॉ. संदीप पाठक ने आखिरकार पार्टी का साथ छोड़ दिया। वे अकेले नहीं, राघव चड्ढा, अशोक मित्तल समेत AAP के 7 राज्यसभा सांसदों (कुल 10 में से 7) ने एक साथ BJP का दामन थाम लिया।
पहले कंस्टीट्यूशन क्लब में तीन पंजाब सांसदों के मीडिया से मुखातिब होने के बाद सीधे बीजेपी मुख्यालय पहुंचकर नितिन नबीन से मुलाकात और फिर आधिकारिक ऐलान। संख्या इतनी बड़ी कि पार्टी हाईजैक होने का खतरा भी टल गया। लेकिन सबसे चौंकाने वाला नाम रहा 'संदीप पाठक'। वो शख्स, जिसे केजरीवाल 'मेरा चाणक्य' कहकर बुलाते थे।

संदीप पाठक: IIT प्रोफेसर से पार्टी के बैकएंड मैनेजर तक
संदीप पाठक कोई साधारण नेता नहीं थे। छत्तीसगढ़ के छोटे गांव से निकलकर कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी, ऑक्सफोर्ड-एमआईटी में रिसर्च, IIT दिल्ली में असिस्टेंट प्रोफेसर। 43 रिसर्च पेपर और सैकड़ों सह-लेखन के बाद 2020 में उन्होंने अकादमिक करियर छोड़कर AAP जॉइन किया।
2022 पंजाब चुनाव में उनकी रणनीति ने AAP को 92 सीटों की ऐतिहासिक जीत दिलाई। लोकसभा चुनावों में जब केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सत्येंद्र जैन जेल में थे, तब संदीप पाठक ही दिल्ली से लेकर पंजाब तक पूरे ऑपरेशन को संभाल रहे थे। टिकट बंटवारा, बूथ मैनेजमेंट, डेटा-ड्रिवन कैंपेन, सब उनके हाथ में था। पार्टी ने उन्हें 2022 में पंजाब से राज्यसभा भेजा और राष्ट्रीय संगठन महासचिव बना दिया। वे शांत, लेकिन बेहद प्रभावशाली सेनापति थे।
नाराजगी की असली वजह: केजरीवाल की रिहाई के बाद शुरू हुआ साइडलाइनिंग
2024 लोकसभा चुनाव में AAP की हार और केजरीवाल की जेल से रिहाई के बाद पार्टी के अंदरूनी समीकरण बदल गए। सूत्रों के मुताबिक, केजरीवाल के करीबियों ने हार का ठीकरा संदीप पाठक और उनकी टीम पर फोड़ा। पाठक अपनी सफाई देना चाहते थे, लेकिन उनकी बात सुनी नहीं गई। नतीजा ये हुआ कि उनकी टीम को एक-एक कर बदल दिया गया। दिल्ली में सौरभ भारद्वाज जैसे नए चेहरे प्रभारी बन गए। पिछले डेढ़ साल से संदीप पाठक बिल्कुल साइडलाइन हो गए। दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी उन्हें कोई भूमिका नहीं दी गई।
एक समय ऐसा आया जब वो पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए। पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण, रणनीति और नेतृत्व की दिशा पर असहमति बढ़ती गई। यह सिर्फ व्यक्तिगत नाराजगी नहीं थी, यह AAP के अंदरूनी पावर स्ट्रक्चर का टूटना था।
राघव चड्ढा का हटाया जाना, बस ट्रिगर एक था
राघव चड्ढा को राज्यसभा में डिप्टी लीडर पद से हटाए जाने के बाद यह तय माना जा रहा था कि वे BJP जॉइन कर सकते हैं। लेकिन किसी को अंदेशा नहीं था कि यह 'सामूहिक विद्रोह' बन जाएगा। 10 AAP राज्यसभा सांसदों में से 7 (यानी दो-तिहाई) का जाना पार्टी के लिए सबसे बड़ा झटका है। उद्योगपति अशोक मित्तल जैसे नामों पर शायद आश्चर्य नहीं था, लेकिन संदीप पाठक का जाना AAP के कोर को हिला देने वाला है। जो शख्स कभी संगठन खड़ा करने में सबसे आगे था, वही आज उसी संगठन को तोड़ने में अहम भूमिका निभा रहा है।
AAP के लिए क्या मतलब?
यह विद्रोह सिर्फ 7 सांसदों का जाना नहीं है। यह AAP के 'आम आदमी' वाले नैरेटिव और संगठनात्मक मजबूती पर सवाल खड़ा करता है। 2022 पंजाब जीत और दिल्ली सरकार के बावजूद पार्टी अब अंदर से टूट रही है। केजरीवाल के सबसे करीबी 'चाणक्य' का जाना दिखाता है कि पार्टी में अब सिर्फ एक व्यक्ति का चेहरा बचा है, बाकी सब साइडलाइन हो चुके हैं। 2027 पंजाब चुनाव से पहले यह झटका AAP को कितना नुकसान पहुंचाएगा, यह तो समय बताएगा। लेकिन आज का दिन साफ तौर पर बता रहा है, ये तो होना ही था।
राजनीति में जो दिखता है, वो होता नहीं। और जो अंदरखाने हो रहा होता है, वो बाहर नहीं दिखता। संदीप पाठक का जाना AAP के अंदरूनी कलह का सबसे बड़ा प्रमाण है। केजरीवाल को अब अपने घर को संभालने की सबसे बड़ी चुनौती मिल गई है।













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