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Sakshi Murder: नशा, अपराध और शाहाबाद का 'मोस्ट वांटेड' साहिल

शाहाबाद डेरी में तीन हिस्से हैं। पक्की कॉलोनी, कच्ची कॉलोनी और झुग्गी झोपड़ी वाला हिस्सा। साहिल के हाथों मौत का शिकार होने वाली साक्षी इस कॉलोनी के तीसरे हिस्से में रहती थी जहां नशे-अपराध के कारोबार का बोलबाला है।

shahbad dairy case

शाहाबाद डेरी के झुग्गी झोपड़ी वाली कॉलोनी में साक्षी गौतम जिस "राहुल" से मिली थी वह हाथ में कलावा बांधता था, गले में रुद्राक्ष की माला डालता था, शिव के गीत गाता था। दोनों में दोस्ती हुई और साक्षी के घर पर राहुल का आना जाना भी। एक समय तक दोनों का मिलना जुलना होता रहा लेकिन फिर मानों समय ने करवट ले ली। अब उसी राहुल के हाथों साक्षी की हत्या हो चुकी है और पुलिस की फाइल में राहुल का नाम असली नाम 'मोहम्मद साहिल खान' लिख दिया गया है।

दिल्ली के शाहाबाद डेरी वाले इलाके में साक्षी का परिवार एक झुग्गी बस्ती में रहता है। दलित जाटव परिवार से आने वाली साक्षी के परिवार में मां हैं, पापा हैं और एक छोटा भाई है, जो आठवीं क्लास में पढ़ता है। मूलत: यूपी में अंबेडकर नगर के रहनेवाले पिता जनकराज गौतम, पेशे से राज मिस्त्री हैं और दिल्ली जैसे शहर में परिवार का गुजारा मुश्किल से होता है।

फिर भी साक्षी के सपने थे। वह एक अच्छा वकील बनना चाहती थी। समाज के लोगों को न्याय दिलाने के लिए लड़ना चाहती थी। ​किसे पता था कि जब साक्षी गौतम की कहानी लिखी जाएगी, वह खुद अत्याचार की शिकार हो चुकी होगी और उसके न्याय की लड़ाई दूसरे लोग लड़ेंगे।

शाहाबाद डेरी के तीन द्वार
शाहबाद डेरी क्षेत्र में दाखिल होने के लिए तीन द्वार हैं। एक है महात्मा बुद्ध द्वार। दूसरे का नाम है डॉ भीमराव अम्बेडकर द्वार। तीसरा द्वार मेन बवाना रोड से जाने पर मिलता है, संत रविदास द्वार। जहां साक्षी गौतम की हत्या की गयी वह घटनास्थल बी ब्लॉ​क के सबसे पास का द्वार है। बी ब्लॉक और संत रविदास द्वार के बीच मुर्गा मार्केट आता है जो कि मुस्लिम बहुल क्षेत्र है।

इसे पार करके जब आप बी ब्लॉक पहुंचते हैं तो उस स्थान को तलाश पाना किसी के लिए भी बहुत मुश्किल है, जहां साक्षी की निर्मम हत्या हुई थी। एक इतनी तंग गली की एक दो मोटरसाइकल साथ निकलें तो मुश्किल हो जाए। सामाजिक कार्यकर्ता कमलापति ने क्रॉस का निशान दिखाते हुए बताया "यह निशान पुलिस ने लगाया है। यहीं साहिल ने साक्षी को चाकुओं से गोद दिया था।" अब तक यह बात समझ आ गई थी कि उस गली में एक निशान ही घटना स्थल की पहचान है। वहीं कुछ मजदूर काम करते हुए मिले। उनकी बात करने में अधिक रूचि नहीं थी। उन्होंने इतना बताया कि पिछले शाम काम करके गए। सबकुछ सामान्य था। रात को कांड हो गया।

अभी बात हो रही थी, इतनी देर में वहां दस-बारह की संख्या में हिन्दू रक्षा दल के कार्यकर्ता आ गए। वे उस स्थान को देखना चाहते थे, जहां हत्याकांड को अंजाम दिया गया था। उनसे बातचीत के क्रम में पता चला कि भजनपुरा में हिन्दू रक्षा दल के कार्यकर्ता साक्षी गौतम के इंसाफ के लिए आमरण अनशन रखना चाहते थे। दिल्ली पुलिस से उन्हें अनुमति नहीं मिली। उन्होंने आनन-फानन में प्रदर्शन का स्थान बदल कर शाहाबाद डेरी कर दिया। एक दिन पहले यहां एक कैंडल मार्च भी निकला था, जिसमें आसपास के लोग साक्षी के लिए न्याय की मांग को लेकर सड़क पर उतरे थे। वे हत्यारे के लिए फांसी मांग रहे थे। साक्षी का परिवार भी हत्यारे के लिए फांसी की मांग कर रहा है।

हमें पैसा नहीं न्याय चाहिए
घटनास्थल ब्लॉक बी से ब्लॉक ई कच्ची बस्ती में साक्षी के घर तक पैदल जाने में दस मिनट का समय लगता है। उबड़-खाबड़ सड़कों के सहारे दाएं-बाएं रास्तों को पार करते हुए साक्षी के घर पहुंचा जा सकता है। बस्ती के अंदर घर तक गाड़ी नहीं जाती। गलियों से गुजरते हुए क्षेत्र की गरीबी साफ नजर आ रही थी। साक्षी की मां से मिलने के लिए जब उनके घर गए, अंदर से उनका घर देखकर, परिवार का संघर्ष समझ आया। यदि शासन की तरफ से राशन ना मिले तो घर चलाना भी मुश्किल हो।

साक्षी की हत्या के बाद भाजपा सांसद हंसराज हंस आकर जा चुके हैं। आम आदमी पार्टी की सरकार ने भी दस लाख रूपये देने का ऐलान किया है लेकिन अपनी गरीबी के बावजूद मां ने बातचीत में कहा कि हम गरीब जरूर हैं लेकिन हमें किसी से मदद के लिए कोई पैसा नहीं चाहिए। ईश्वर ने हमें गरीबी दी है तो हम गरीबी में जीने को तैयार हैं लेकिन हमारी बेटी के हत्यारे को फांसी जरूर मिले।

नशे की जद में शाहबाद डेरी
मीडिया में साक्षी के हत्यारे साहिल को चाहे जिस रूप में पेश किया जाए स्थानीय लोगों की नजर में एक छुटभैया गुण्डा और नशे का कारोबारी है। दबी जुबान में यहां लोग बता रहे हैं कि वह पुड़िया सप्लाई करता था। एसी फ्रिज मैकेनिक का काम तो वह अपने नशे के कारोबार को छिपाने के लिए करता था। उसकी असली आमदनी नशे के कारोबार से ही होती थी। वह जितना कमाता था उतना ही अपने दोस्तों पर खर्च भी करता था इसलिए आठ दस नशेड़ियों की एक छोटी मोटी गैंग उसके साथ हमेशा रहती थी। वह इंस्टाग्राम पर भी मौजूद था जहां एक रील में फोन करते हुए कहता है कि "मैं शाहाबाद का मोस्ट वांटेड हूं।"

हालांकि दो तीन सालों से वह शाहाबाद डेरी वाले इलाके से थोडा दूर रहने लगा था लेकिन इलाका उसका यही था क्योंकि यहां उसके नशे का कारोबार ठीक चलता था। अब जहां पुड़िया का कारोबार होगा वहां उसके खरीदनेवाले भी होंगे ही। यह पूरा क्षेत्र नशे से प्रभावित है। इस बात को स्थानीय विधायक भी मानते हैं कि नशे पर नियंत्रण होने से ही इस क्षेत्र के अपराध पर नियंत्रण होगा लेकिन फिलहाल वो कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं हैं।

अपराधियों का है दबदबा
इस पूरे क्षेत्र में अपराधियों का इतना दबदबा है कि यहां रहने वाले डरे रहते हैं। अगर आप बाहर से गये हैं तो यहां के हालात पर खुलकर कोई बात करने को तैयार नहीं होता है। दबी जुबान में ही सही यहां के लोग बताते हैं कि साक्षी की हत्या वाले दिन साहिल अकेला नहीं आया था। उसके साथ कई लोग थे। ऐसा लगता है कि उन्हें देखकर साक्षी समझ गई थी, अब वह फंस गई है। नाम न देने की शर्त पर एक व्यक्ति ने बताया कि कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी हमला होने पर बचने की कोशिश करता है। साक्षी ने बचने की कोशिश क्यों नहीं की? उसने पलट कर धक्का क्यों नहीं दिया? साक्षी हारने वालों में नहीं थी। वह लड़ना जानती थी। फिर हमले वाली रात को वह कमजोर क्यों पड़ गई? यह सवाल कोई क्यों नहीं पूछ रहा?

स्थानीय लोगों का कहना है कि हत्याकांड के समय साहिल अकेला नहीं था। उसके आसपास उसके कुछ लोग बिखरे थे। साक्षी संभवत: यह बात समझ गयी और यह भी समझ गयी कि अब उसका बचना मुश्किल है। इसलिए पहले वार से ही उसने अपने बचाव के कोई उपाय नहीं किये। सीसीटीवी फुटेज में आस-पास आते जाते लोगों को जो भीड़ बताया जा रहा है उस फुटेज को ठीक से देखने की जरूरत है। क्या पता कि सभी भीड़ का हिस्सा ना हो, बल्कि उसमें कुछ साहिल के साथ आये लोग भी हों।

हत्या से जुड़े कई सवाल हैं अनसुलझे
सामाजिक कार्यकर्ता सुभाष राठी कहते हैं कि शाहबाद डेरी झुग्गी क्षेत्र का एक सच यह भी है कि यहां के लोग मीडिया, कैमरा और पुलिस के चक्कर में पड़ना नहीं चाहते। फिर भी यह सवाल सबके मन में है कि क्या मोहम्मद साहिल नशे में इतना धुत था कि एक नृशंस दरिंदे की तरह वह दो दर्जन से अधिक बार लगातार साक्षी के शरीर पर चाकू से हमला करता रहा। पत्थर से उसका सिर कुचल दिया। राठी पूछते हैं, 'इस बात पर कैसे विश्वास हो कि उसके बाद उसने अकेले जाकर चाकू छिपाया। इस बात पर कौन विश्वास करेगा कि सबकुछ उस अकेले ने किया?'

राठी के सवाल को गंभीरता से इसलिए भी लेना चाहिए क्योंकिे शाहबाद डेरी से बुलंदशहर सौ किमी का रास्ता है, जहां उसकी बुआ रहती हैं। वहां तक अपनी गाड़ी हो तो भी पहुंचने में ढाई घंटे का समय लगेगा। अब सवाल है कि उस रात मोहम्मद साहिल बस से गया था या फिर उसका कोई दोस्त अपनी गाड़ी से उसे बुलंदशहर छोड़ कर आया। यदि बस से गया तो इतनी रात गए उसे बस कहां से मिली?

बहरहाल, साक्षी की हत्या की खबर के बाद मीडिया वालों और सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ताओं का जमघट मृतक साक्षी गौतम के घर के बाहर लग रहा है। सब उसके परिवार को न्याय का भरोसा देते दिख रहे हैं। जब तक मीडिया में इस हत्याकांड की चर्चा है तब तक आना जाना भी बंद नहीं होगा, उसके बाद फिर सबकुछ पहले वाले ढर्रे पर लौट जाएगा। असामान्य स्थितियां ही मानों यहां के लिए सामान्य परिस्थिति है।

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