Left Liberal Lobby: सिर्फ हंगामा खड़ा करना ही मकसद है जिनका
पहले असद के एनकाउंटर और अब अतीक और अशरफ की हत्या के बाद हंगामा करने वाले मैदान में उतर आये हैं। पुलिस कस्टडी में अतीक और उसके भाई की हत्या दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन क्या इतने से यह समुदाय विशेष पर हमला कहा जा सकता है?

Left Liberal Lobby: अपराधी अपराधी होता है वह किसी भी जाति धर्म का हो। क्या अपराधियों का जाति धर्म के नाम पर समर्थन स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे का संकेत नहीं है? फिर यह हंगामा क्यों? यह शोर क्यों? इसका उद्देश्य क्या है? क्या वो न्याय की बात कर रहे हैं? यदि न्याय ही उद्देश्य होता तो अतीक अहमद के सताए लोगों को अनदेखा नहीं कर दिया जाता। यह न्याय की चाह में होने वाला हंगामा है ही नहीं। यह भारतीय लोक को अपमानित करके उसे कथित अल्पसंख्यक विरोधी दर्शाने का हंगामा है, जिसमें अपराधी को पीड़ित एवं पीड़ित को अपराधी से बदल देना ही उद्देश्य है।
ऐसा नहीं कि अतीक अहमद की हत्या में या अतीक के बेटे के एनकाउंटर में ही यह हुआ हो। यह लॉबी हर उस अपराधी के बचाव के लिए शोर मचाती है जो उनके एजेंडे में फिट बैठता है। फिर चाहे वह कई वर्ष पूर्व हुआ इशरत जहां का एनकाउंटर हो या फिर आईआईटी मुम्बई में दर्शन सोलंकी द्वारा आत्महत्या किए जाने पर इकबाल अरमान खत्री का बचाव। इस हंगामे की शक्ल इतनी ही है कि इसने हवा से अपना आकार लिया है।
भारत की लेफ्ट लिबरल लॉबी नैरेटिव गढ़ना सबसे जरूरी मानती है और सबसे पहले हवा बनाती है, फिर उस हवा को अपने पक्ष में करती है। जैसे गोधरा के स्टेशन पर कारसेवकों के जले हुए शवों पर झूठा नैरेटिव बना दिया कि भीतर ही लोगों का झगड़ा हुआ और आग लग गयी। यह हवा इस कदर बनाई कि न्यायालय का निर्णय आने के बाद भी अभी तक मुनव्वर फारुकी गोधरा स्टेशन पर जले हुए शवों से भरी साबरमती एक्सप्रेस को "द बर्निंग ट्रेन" कहकर उपहास करता है और उसी हवा के हंगामे से प्रभावित होकर इसी भारत में तालियां बजाई जाती हैं।
अब जब अतीक अहमद जैसे माफिया की हत्या हुई है, किसने की, क्यों की, यह सब जांच का विषय है, परन्तु हवा बनाई जा रही है। उसके अल्पसंख्यक होने की हवा और गोली चलाने वाले के जै श्री राम के नारे की हवा। इस हवा का उद्देश्य यही है कि किसी भी प्रकार से भारत के उस लोक को वैश्विक परिदृश्य में बदनाम कर दिया जाए, जिस लोक के विषय में हजारों वर्षों से विदेशी यात्री भी प्रशंसा करते रहे हैं।
हंगामे होते रहे हैं, होते रहेंगे, परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि यह भारत की उस सूरत को बदलने के लिए हो रहे हैं, जो सहज समावेशी एवं सभी को साथ लेकर चलने वाली है। जो अपनी पहचान किसी पर नहीं थोपती है, बल्कि वह दूसरे के गुणों को आत्मसात करके स्वयं को ही और उन्नत करती है। यह हंगामे आरम्भ हुए थे रोहित वेमुला की कथित आत्महत्या के बाद। इसे लेकर भी भारत के लोक को कोसा गया, सरकार पर निशाना साधने के माध्यम से उस लोक को निशाना बनाया गया, जिसने इस सरकार को मत द्वारा चुना था।
यही हंगामा था, जो हाथरस में हुआ था, मगर उसमें तो हंगामे की ही सूरत स्पष्ट नहीं थी। एक सबसे मजेदार हंगामा हुआ था, अफगानिस्तान में मारे गए दानिश सिद्दीकी को लेकर। यह हंगामा बहुत ही सूक्ष्म मनोविज्ञान का सहारा लेकर गढ़ा गया था। कथित पत्रकार दानिश सिद्दीकी मारा गया अफगानिस्तान में, तालिबान और अफगानी सुरक्षा बलों के बीच झड़प को लेकर उसकी मृत्यु हुई थी, मगर इसमें तालिबान पर प्रश्न उठाने के स्थान पर हंगामा किया गया कि भारत का लोक दानिश की मृत्यु का अपमान कर रहा है।
दानिश सिद्दीकी की मृत्यु पर किया गया हंगामा इतना तेज था, कि इसने कुछ ही महीने पहले भारत में ही एक ऐसी घटना पर हुए छुटपुट हंगामे को एकदम शांत कर दिया, जिस पर वास्तव में हंगामा किया जाना चाहिए था। वह घटना थी महाराष्ट्र में पालघर में साधुओं की घेरकर हत्या। दो निहत्थे साधु, जिनका दोष क्या था, यह भी आज तक स्पष्ट नहीं है, परन्तु वर्ष 2020 में उन्हें भीड़ घेरकर मार डालती है। मगर हंगामा मचाने वाली लेफ्ट लिबरल लॉबी पुलिस के सामने हुई इस लिंचिंग पर, मौन साध जाती है।
भारत की लेफ्ट लिबरल लॉबी केवल और केवल अपने एजेंडे वाले मामलों पर ही हंगामा करना जानती है और चाहती है। वह न्याय नहीं चाहती। न्याय चाहती तो अफगानिस्तान में अपने प्रिय पत्रकार दानिश सिद्दीकी की मौत पर तालिबान से प्रश्न करती, तालिबान के प्रति भारत में ही सही, सांकेतिक प्रदर्शन करती। परन्तु ऐसा नहीं किया गया।
न्याय पाना मकसद होता तो रोहित वेमुला की चिट्ठी और जीवन एवं उसकी मानसिक व्यथा का विश्लेषण करती एवं सरकार का विरोध करने के स्थान पर असली दोषियों तक पहुंचती। यदि न्याय पाना ही मकसद होता तो दर्शन सोलंकी को आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए जब इकबाल अरमान खत्री को हिरासत में लिया गया, तो इस बात पर हर्ष की अभिव्यक्ति होनी चाहिए थी कि अंतत: अपराधी पकड़ा गया, परन्तु ऐसा नहीं हुआ। आरोपी के पकड़े जाने पर भी उनके जीवन में हर्ष और प्रसन्नता नहीं थी। ऐसा लगा जैसे उनके एजेंडे पर पानी फिर गया, उन्होंने कुछ और निष्कर्ष सोच रखा था, वह कुछ और निकल आया। "न्याय और एजेंडे वाले निष्कर्ष" में जो भिन्नता है, वही उनकी वास्तविकता है।
फिर यह हंगामा हवा में किया गया कि एनकाउंटर में न्याय नहीं मिलता या फिर जज साहब से गुहार लगाई जा रही है कि आप अदालत बंद कर दें। उत्तर प्रदेश के माफिया अतीक अहमद के हत्यारे बेटे के एनकाउंटर का विरोध यह कहकर किया गया कि मजहब विशेष का होने के कारण एनकाउंटर किया गया है, एवं ऐसा परिदृश्य रचा जा रहा है कि केवल मुस्लिमों के ही एनकाउंटर हो रहे हैं। परन्तु क्या वास्तव में एनकाउंटर के बार में न्याय ही उनका मकसद है? यदि ऐसा होता तो फिर अपराधी विकास दुबे के एनकाउंटर के प्रति भी इतना ही शोर लेफ्ट लिबरल वर्ग का होना चाहिए था?
आज जब उत्तर प्रदेश में माफिया की हत्या को लेकर लेफ्ट लिबरल लॉबी द्वारा हंगामा मचाया जा रहा है, तो क्या इनमें से एक भी "हंगामाकारिता" करने वाले ने अपनी ही बिरादरी के जागेन्द्र सिंह की हत्या पर शोर मचाया था, जिनकी हत्या जलाकर कर दी गयी थी? इतना ही नहीं यह हंगामाकारिता करने वाले तो अपने ही विचारों की पत्रकार रिजवाना तबस्सुम की आत्महत्या के मामले में भी उसके साथ नहीं आए थे क्योंकि उसे समाजवादी पार्टी का ही एक नेता शमीम नोमानी परेशान कर रहा था और वह अपने सुसाइड नोट में उसका नाम लिखकर गयी थी। यह वर्ष 2020 की घटना है, जो जाहिर है अधिक पुरानी नहीं है, परन्तु "हंगामाकारिता" करने वालों के लिए आउट ऑफ सिलेबस है, क्योंकि उन्हें न्याय के लिए हंगामा नहीं करना है!
लेफ्ट लिबरल की वितंडा और प्रोपोगैंडा उत्पन्न करने वाली लॉबी के लिए यह महत्वपूर्ण नहीं है कि अपराधियों को पकड़ा जाए एवं न्याय मिले। उसके लिए अपने एजंडे पर हंगामा खड़ा करना एक अवसर है। वह चाहती है कि जो लोक भारत की आत्मा है, उसे बदनाम किया जाए। वो आम जनमानस के प्रति वैश्विक विमर्श में यह अवधारणा बनाना चाहते हैं कि भारत के आम लोग या भारत का लोक विमर्श ही कथित रूप से जन विरोधी, अल्पसंख्यक और पिछड़ा विरोधी है।
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यह जो हंगामा है वह सूरत बदलने के लिए सूरत बिगाड़ने के लिए किया जा रहा है। और उपरोक्त तमाम घटनाओं के परिदृश्य में दुष्यंत से क्षमा याचना के साथ यही कहा जा सकता है कि:
"तब तक हंगामा खड़ा करना ही मेरा मकसद है दोस्तों, जब तक पूरी सूरत विकृत न हो जाए"।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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