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RSS Chief Interview: संघ के सामने खड़ी, दो चुनौतियां सबसे बड़ी

हाल ही में दिए एक साक्षात्कार में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने सबसे बड़ी चुनौती के रूप में दो बिंदुओं को रखा है। क्या है वे दो चुनौतियां?

rss chief mohan bhagwat told about challenges for sangh in future

RSS Chief Interview: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे अधिक चर्चा राजनीतिक विचारधारा के तौर पर होती है लेकिन संघ कभी स्वीकार नहीं करता कि वह राजनीतिक रूप से सक्रिय है। यहां तक कि भारतीय जनता पार्टी के साथ किसी प्रकार के राजनीतिक संबंध को भी संघ स्वीकार नहीं करता। हालांकि संघ यह स्वीकार करता है कि भारतीय जनता पार्टी में भी उसके स्वयंसेवक वैसे ही काम करते हैं, जैसे समाज के दूसरे क्षेत्रों और संगठनों में काम करते हैं।

वहीं, भारतीय जनता पार्टी आठ सालों से देश की केंद्रीय ताकत बनी हुई है। देश के अनेक राज्यों में उसकी सत्ता है। कई राज्यों में सत्ता में न होकर विपक्षी भूमिका में है। विपक्ष की इस भूमिका के साथ ही वह राष्ट्र और राज्य के जीवन में अपने तरीके से हस्तक्षेप कर रही है। भाजपा के सत्ता में होने के कारण निश्चित तौर पर संघ के स्वयंसेवकों का भी सत्ता से सतत संपर्क बना हुआ है।

एक संगठन के इतिहास के तौर पर देखें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके विचार परिवार के संगठनों के लिए आगे का मार्ग अब तक के उबड़-खाबड़ और कंटकाकीर्ण रास्तों से अलग है। मोहन भागवत ने पांचजन्य और आर्गेनाइजर में छपे अपने साक्षात्कार में स्वीकार किया है कि इन संघर्षों के बावजूद एक संगठन के रूप में संघ ने अपनी दिशा को सही रखा, अपने स्वत्व को बचाए रखा और अपने लक्ष्य की ओर लगातार आगे बढ़ता रहा।

संघ प्रमुख ने अपने इस साक्षात्कार के जरिए संघ के प्रति राजनीतिक और सामाजिक आवरण में छाए कुहासे को जहां काटने की कोशिश की है, वहीं संघ के आगामी कार्यक्रमों और चुनौतियों का भी जिक्र किया है।

संघ प्रमुख को अतीत की चुनौतियों से अगर आज की चुनौती अलग लगती है तो इसकी वजह है, सत्ता का संपर्क और उसके साथ आने वाली किंचित बुराइयां। सत्ता के साथ आने वाला ऐश्वर्य, उसके साथ आने वाली लक्ष्मी साथ में कुछ बुराइयों की वजह बन सकती है। संघ पर निगाह रखने वाले तटस्थ विचारक मानते रहे हैं कि ऐश्वर्य के साथ से स्वयंसेवक के भ्रमित होने का खतरा है। लगता है कि संघ के अंदरूनी हलके में भी इस चिंता को जताया जा रहा है।

rss chief mohan bhagwat

इसे लेकर भी मंथन हो रहा है, इसीलिए संघ प्रमुख को कहना पड़ा है कि "इन दिनों सबसे बड़ी चुनौती दिशा को सही रखना और स्वत्व को बचाए रखना है।" संघ प्रमुख ने जो कहा है, उस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा है, "हमें समाज का बहुत स्नेह मिल रहा है। विचार के लिए भी अनुकूलता है और विश्व परिस्थिति भी उस विचार की ओर मानवता को धकेल रही है। चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने उसी प्रकार सब लोग सोचने लगे हैं और यह प्रक्रिया बढ़ती जाएगी। इस कारण हमारा रास्ता थोड़ा सुगम बन गया है। यह भी एक चुनौती है। क्योंकि कंटकाकीर्ण मार्ग के कंटक बदल गये हैं। पहले तो विरोध और उपेक्षा के कंटक थे। उसको हम टाल भी सकते थे। लेकिन अनुकूलता के कारण जो साधन सुविधा, संपन्नता आ गई है और समाज में हम महत्वपूर्ण हो गये हैं, इस स्थिति में यह लोकप्रियता और सुविधाएं, यह हमारे लिए कंटक हैं, जिनसे हमको गुजरना होगा।"

राष्ट्रीय स्वयंसेवक अब विशाल वट वृक्ष के रूप में तब्दील हो गया है। संघ की इस विकास यात्रा पर भी संघ प्रमुख ने अपने साक्षात्कार में विशेष ढंग से रेखांकित किया है। संघ की कार्यपद्धति में किसी बदलाव की संभावना को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में मोहन भागवत ने इस बदलाव को विकास की प्रक्रिया ही माना है। उन्होंने कहा है, "परिवर्तन नहीं है। उसमें विकसन है- विकसित होने की क्रिया। कली खिलती है, तो सारी पंखुड़ियां एक साथ नहीं खिलतीं। पंखुड़ियां पहले से होती हैं। संगठन वही है। कार्य पद्धति वही है। हम संगठन के लिए ही संगठन कर रहे हैं। अन्यथा यह हो सकता है कि आज हमें इतने ही काम करने हैं कि शाखा नहीं चलाएंगे, तो भी लोग तो हमारे पास हैं ही, समाज में भी प्रतिभाएं हैं, जिनका उपयोग हम करते हैं।"

संघ प्रमुख को संघ के स्वयंसेवकों पर पूरा भरोसा है। इस भरोसे को उन्होंने बार-बार अपने साक्षात्कार में जाहिर किया है। हालांकि उन्होंने स्वीकार किया है कि भारत में जो कुछ भी होता है, उसे राजनीतिक चश्मे से देखा जाता है। उनका इशारा भाजपा में सक्रिय स्वयंसेवकों की कार्यशैली पर उठने वाले प्रश्नों पर भी है। संघ प्रमुख ने प्रकारांतर से स्वीकार किया है कि राजनीतिक चश्मे से देखने की यह परंपरा स्वयंसेवकों के कार्यों के बहाने संघ पर सवाल उठाने से नहीं हिचकती।

लेकिन इसके बावजूद संघ प्रमुख अपने विरोधियों को भी विरोधी मानने से इनकार करते हैं। वे संगठन और स्वयंसेवकों से भी अपेक्षा करते हैं कि वे भी अपने विरोधियों को विरोधी नहीं मानेंगे। संघ प्रमुख को उम्मीद है कि संघ को लेकर जैसा माहौल इन दिनों समाज में है, वैसा अतीत में कम ही रहा है। इसीलिए वे अपने लक्ष्य को पूरा करने पर जोर देने की बात कर रहे है। "अब संघ और समाज, इनमें एक अच्छा, पक्का मधुर संबंध है। आगे का स्वाभाविक चरण यह है कि संघ का कार्य सर्वव्यापी हो। उसके आधार पर हिन्दू समाज में जिस प्रकार का परिवर्तन चाहिए, जिस प्रकार का तालमेल चाहिए, समाज की एक संगठित अवस्था लाने के लिए आगे काम होगा। संघ के स्वयंसेवक भी करें, समाज के सज्जन भी करें।"

संघ की जब भी बात आती है और किसी राजनीतिक संगठन का जिक्र होता है, भारतीय जनता पार्टी का ही नाम सामने आता है। लेकिन हकीकत में तमाम दलों के नेताओं से संघ के संपर्क रहे हैं। चूंकि संघ को लेकर सार्वजनिक वैचारिकी में एक खास तरह का अछूत बोध भी अतीत में रहा है, इसलिए तमाम ऐसे लोग भी सार्वजनिक रूप से अपने संघ संपर्क को जाहिर करने से हिचकते रहे हैं। संघ भी अपनी ओर से ऐसे लोगों को सार्वजनिक करने से बचता रहा है।

लेकिन इस साक्षात्कार के एक जवाब में संघ प्रमुख ने जो कहा है, उससे साफ है कि अतीत में लोक के व्यापक हितों के लिए संघ अपने संपर्कों का प्रयोग करता रहा है। एक सवाल के जवाब में संघ प्रमुख ने जो कहा है, उसे इन संदर्भों में देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा है, "जो राजनीतिक गतिविधियां चलती हैं, उसमें जनता की कोई इच्छा है, कठिनाइयां हैं, जो हमारे पास आता है, वह स्वयंसेवकों के कारण (वहां तक) पहुंच जाती हैं। स्वयंसेवक सत्ता में नहीं थे, तब भी जो अन्य दलों के लोग हमें सुनते थे, वे थे। आज हैं, कल भी रहेंगे, उन तक हम बात पहुंचाते हैं। प्रणव दा कांग्रेस सरकार में वित्त मंत्री थे, संघ की दृष्टि से महत्वपूर्ण विषयों पर हम अपनी बात उनके पास पहुंचा देते थे। वे सुनते भी थे। यह हम करते थे। इतनी सी बात है। बाकी हमारा इस चालू राजनीति से कोई संबंध नहीं है।"

यह भी पढ़ें: RSS and Secularism: क्या संघ सेकुलर हो गया है?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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