Saraswati River: सूखते हरियाणा में कैसे जीवित होगी सरस्वती?
Saraswati River: नदी संस्कृति के मामले में हमारा भारत कभी सिरमौर था। संसार के किसी भी क्षेत्र की तुलना में सर्वाधिक नदियाँ हिमालय अधिष्ठाता शिव की जटाओं से निकलकर भारत के कोने-कोने को शस्य-श्यामला बनाती रही हैं। सभी नदियाँ करोड़ों लोगों के जीवन का सेतु और आजीविका का स्थायी स्रोत होने के साथ-साथ जैव विविधता, पर्यावरणीय और पारिस्थितिक सन्तुलन की मुख्य जीवनरेखा रही हैं।

ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी भी इनमें से एक थी। करीब पाँच हज़ार वर्ष पहले सरस्वती के विलुप्त होने के कारण चाहे कुछ भी रहे हों, लेकिन सरस्वती की याद दिलाने वाले इस पावन स्तोत्र को करोड़ों-करोड़ लोग आज भी गुनगुनाते हैं।
गंगे! च यमुने! चैव गोदावरी! सरस्वति!
नर्मदे! सिंधु! कावेरि! जलेડस्मिन सन्निधिं कुरु।।
नदी-भक्ति हम भारतीयों की असाधारण विशेषता है। नदियों को हम 'माता' कहते हैं। भारत में गंगा सहित तमाम नदियाँ मात्र जल से भरी नदियाँ नहीं मानी जाती हैं बल्कि मातृ रूप में पूजित हैं। हज़ारों वर्ष पहले विलुप्त हुई सरस्वती के लिये हमारा दिल आज भी धड़कता है। सरस्वती से जुड़ी मामूली खबर भी सरकारों और जन-मन के लिये कौतूहल का विषय बन जाती है।
पुण्यदायिनी इन नदियों का ही प्रताप है कि जितनी विविधता भरी और उपजाऊ भूमि भारत में है, उतनी दुनिया में और कहीं नहीं। लेकिन अफसोस की बात है कि पिछले दो सौ वर्षों की अंग्रेजी शिक्षा और साठ वर्षों की वामपंथी कुशिक्षा ने हमारे लहलहाते काल-बोध को कमजोर कर दिया है।
प्रत्येक नदी के स्तोत्र हैं, आरती-पूजा का विधान है। लेकिन इन्हें बचाए रखने का विधान कहीं खो गया लगता है तभी तो सरस्वती लुप्त हुई और यमुना सहित अनेक 'सरस्वतियाँ' विलुप्ति की कगार पर हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों और प्रकृति को मात्र भौतिक दृष्टि से देखना पश्चिम का भोगवादी नजरिया है। हमारी नदियों को किसी भौतिक ऊहापोह में नहीं बाँधा जा सकता।
लेकिन जिस दौर में केवल अधिकारों की छीना-झपटी मची हो, उस दौर में कर्तव्यों की चिन्ता भला किसे है! हमारे पुरखों ने नदियों से जुड़े विधि-विधान अपनी जीवनचर्या से जोड़ रखे थे। लेकिन उद्योग बनते सियासी तंत्र में अधिकार हमारे, कर्तव्य तुम्हारे का खेल चल पड़ा है। प्राकृतिक संसाधनों की लूट-खसोट ही सरकारों की मुख्य नीतियों में शुमार हो चुकी है।
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इसी बीच 'नमामि गंगे' के संकल्प और ' आज़ादी के अमृत महोत्सव ' काल में हर जिले में 75 तालाबों के निर्माण के साथ हरियाणा सरकार को अपने तमाम जलस्रोतों और छोटी-मोटी सभी नदियों को निर्मल बनाने की सार्थक और व्यावहारिक योजना बनानी होगी। जब तक जलस्रोतों को बचाने के ऐसे अभियान व्यावहारिक नहीं होंगे तब तक 'सरस्वतियाँ' यों ही लुप्त होती रहेंगी। राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वह प्रदेशवासियों के साथ मिलकर निर्मल नदी, निर्मल तालाब, निर्मल जोहड़, निर्मल बावड़ी और निर्मल जल के संकल्प को स्थायी बनाए।
सरस्वती का उद्गम स्थल आदिबद्री माना जाता है, लेकिन हैरानी की बात है कि इस क्षेत्र में न केवल नदियों के गर्भ से नाजायज़ माइनिंग हो रही है बल्कि प्लाइवुड उद्योग धड़ल्ले से जंगलों पर कुल्हाड़ी चला रहा है। प्लाइवुड उद्योग को लगभग चार सौ लाइसेंस पहले से जारी हैं, भविष्य में सैकड़ों लाइसेंस और देने की बात चल रही है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि इस क्षेत्र का बचा-खुचा भू-जल भी निपटता जाएगा।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि जीवन को चलाने के लिये कारोबार भी फलने-फूलने चाहिए, लेकिन ज़िम्मेदारी और नियमों के साथ। क्या ऐसा संभव नहीं कि प्रत्येक प्लाइवुड लाइसेंस धारक प्रतिवर्ष अपना लाइसेंस रिन्यू करवाने से पूर्व कम-से-कम पाँच सौ इसी क्षेत्र में पाए जाने वाले पेड़ लगाए? ऐसा सम्भव है। सरकार को ऐसे नियमों को सम्भव और आसान बनाना चाहिए ताकि भूजल स्रोतों का खजाना बचा रहे।
यमुनानगर के पूरे क्षेत्र में सफेदा या पॉपुलर वृक्ष अपार संख्या में रोपे गए हैं। प्लाईवुड के लिये तो ये वृक्ष काम आ सकते हैं लेकिन भूजल स्तर को ये कितना नुकसान देंगे इसका अंदाज़ा होते हुए भी सरकार का आँखें मूँदना बेहद घातक होगा।
सरकार मात्र नारियल फोड़ कर, चार चावल चढ़ा कर और तिलक लगाकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ सकती। उसे सरस्वती को पुनर्जीवित करने वाले इस क्षेत्र के सभी पुरातन जलस्रोतों को फिर से जीवित करने का ज़िम्मा उठाना होगा।
नदियाँ अगर दफ्तरों में बैठे बाबुओं द्वारा बचती होतीं तो आज देश के ग्यारह राज्यों में सुखाड़ न होता और तैंतीस करोड़ लोग जल संकट से प्रभावित न होते। नदियाँ जीवित होती हैं तालाब बचाने से, तालाब या अन्य जल स्रोत बचते हैं सघन वृक्षारोपण से।
हरियाणा आज अपनी भूजल सम्पदा के मामले में बड़े संकट के मुहाने पर है। हरियाणा में कुल जलसम्भर क्षेत्र 108 हैं, जिनमें से 82 डार्क ज़ोन में बदल चुके हैं।
मुख्यमंत्री जी के अपने क्षेत्र करनाल के सभी छह ब्लॉक डार्क जोन में हैं। हरियाणा देश का एकमात्र राज्य है जिसमें मात्र छह फीसद वन बचे हैं। जिस प्रदेश में वन इतने कम हों वहाँ कभी भी अकाल की स्थिति पैदा हो सकती है। सभी खोई और बची नदियों के किनारों पर युद्ध स्तर पर देशज पेड़ रोपने होंगे। पेड़ों से बड़ा जल संरक्षक कोई नहीं होता।
हरियाणा में आज भी महाभारत कालीन १३६ तालाब किसी न किसी रूप में जीवित हैं। बस सरकार को नए सपनों के साथ प्रदेश की शुष्क पर्यावरणीय स्थिति को श्रद्धा से सींचना होगा।
ऐसे हालात में भी हरियाणा सरकार सौभाग्यशाली है कि प्रदेश में सरस्वती के प्रकट होने की खबरें यदा-कदा आ रही हैं, लेकिन सरकार मात्र नारियल फोड़ कर, चार चावल चढ़ा कर और तिलक लगाकर या मात्र ' सरस्वती बोर्ड ' बनाकर अपने कर्तव्य से पल्ला नहीं झाड़ सकती बल्कि उसे सरस्वती के सभी पुरातन जलस्रोतों की सार-सम्भाल का ज़िम्मा उठाना होगा। नदियाँ या पर्यावरण अगर दफ्तरों में बैठ कर बचता होता तो आज विश्व पर्यावरण का संकट न होता।
सरकार को सेटेलाइट के माध्यम से सरस्वती के मार्ग की पहचान कर, सरस्वती के किनारे - किनारे बचे तालाबों को बचाने के लिये युद्ध स्तर पर जुटना होगा। अगर सरकार ऐसा कर पाती है तो छोटी-मोटी लुप्त नदियों के साथ सरस्वती के लौटने की सम्भावना बन सकती है। इसके लिये श्रद्धा तो चाहिए ही, साथ-साथ दृढ़ संकल्प भी चाहिए। यही देश की स्वयं सिद्ध और शास्वत सनातन नदी नीति है।
सरस्वती बोर्ड की सार्थकता तभी है जब हरियाणा की नदियाँ, तालाब, जोहड़, डबरे, बावड़ियाँ और कुएँ सम्भाले जाएँ। अन्यथा देखा जाता रहा है कि ऐसी संस्थाएँ कुछ ज्ञात-अज्ञात कार्यकर्ताओं या परिचितों के पेट रूपी गुल्लक की भेंट चढ़ जाती हैं।
अगर प्रदेश सरकार पर्यावरण प्रेमियों, किसानों, जल का महत्त्व समझने वालों, पंचायतों और युवकों को साथ लेकर अपने जलस्रोतों को बचाने में सफल होती है तो यकीन मानें इससे न केवल दिन-प्रतिदिन विलुप्ति की कंदराओं की ओर बढ़ती यमुना बच पाएगी बल्कि कोई 'सरस्वती' कभी लुप्त नहीं होगी।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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