Remembering Anupam Mishra: "बिन तालाब सब सून" के महत्व को हमें फिर से समझाने वाले अनुपम मिश्र
प्रकृति और पर्यावरण के बारे में गहरी से गहरी बात को एकदम सरल बनाकर भारतीय जनमानस के लिए प्रस्तुत करने में अनुपम मिश्र को महारत थी।

Remembering Anupam Mishra: बात बहुत छोटी सी थी। तालाब बचा लो, पानी बच जाएगा लेकिन प्रभाव बहुत बड़ा था। इतना कि धरती का अस्तित्व बचा लेने जैसा। जल है तो धरती पर जीवन है, नहीं है तो कुछ नहीं।
धरती पर पानी को बचाने का एक जरिया प्रकृति ने खुद निर्मित किया है। नदियां, झीलें और झरने। दूसरा जरिया मनुष्य ने विकसित किया। कुछ कुछ भगवान जैसा ही तरीका। तालाब। देखने सुनने में यह बात इतनी सामान्य लगती है कि ध्यान भी नहीं जाता लेकिन तालाब धरती पर पानी सहेजने का ईश्वरीय तरीका है। जैसे पहली बार अन्न उपजाकर मनुष्य ईश्वर होने के करीब पहुंचा, वैसे ही तालाब बनाकर वह ईश्वर के बहुत करीब पहुंच गया। लगभग ईश्वर ही हो गया वह।
तालाब में बारिश का पानी सहेजना मानव सभ्यता की सबसे उन्नत खोज रही है शायद। एकदम साधारण तरीके से एकदम असाधारण काम। आज भारत सरकार ही नहीं राज्य सरकारें भी खत्म होते तालाबों को बचाने के लिए योजनाएं बना रही हैं। सरकारों को समझ में आ गया है कि भारत की जलवायु में तालाब संजीवनी की तरह काम करते हैं। उन्हें खत्म होने से बचाने के लिए जो भी योजना बनानी पड़े हमें बनानी चाहिए।
हमारे देश में सरकारें भारत की होकर भी भारत के बारे में कम सोच पाती हैं। हमारी सरकारों का ढांचा कुछ ऐसा बना है कि उसमें बैठने वाले लोग अभारतीय होकर भारत के बारे में सोचते हैं। मानों वो यहीं के न होकर कहीं दूसरी जगह से आ गये हों। उनकी फाइलें, उनकी योजनाएं और उनका काम काज किसी और सभ्यता से उधार ली जाती हैं और उनकी नजरों में "अज्ञानी" भारत के सिर पर थोप दी जाती हैं।
इसलिए सूखे इलाकों तक पानी पहुंचाने के लिए नहरों को तारणहार बनाकर पेश किया गया। मानो समाज नहर के जरिए ही संसार की वैतरणी पार कर पायेगा। राजस्थान की इंदिरा गांधी नहर परियोजना इन सबमें सबसे ज्यादा प्रचारित और भारी भरकम योजना थी। लेकिन चालीस साल की तपस्या के बाद ये नहर राजस्थान के थार इलाके में सुविधा से अधिक समस्या बन गयी। जिस इलाके में कभी मच्छर नहीं होते थे वहां मलेरिया आम बीमारी बन गया। सिंचाई से ज्यादा इस योजना की असफलता के किस्से आकर्षित करने लगे।
लेकिन सरकारों को जमीन पर सफलता या असफलता से कोई मतलब होता भी नहीं है। सरकारों को कागज पर योजनाओं को सफल बनाना होता है और सरकारी अधिकारी इसमें कम ही असफल होते हैं। यूपीए सरकार के दौरान ज्यां द्रेज ने जिस ग्रामीण रोजगार गारंटी की योजना सामने रखी उसमें अधिकांश मिट्टी के काम को महत्व दिया गया। ग्रामीण इलाकों पर तालाब पर पहली बार सरकारी कागजात में उल्लेख और महत्व इसके बाद ही समझ में आया।
असल में 2012 के आसपास इंडियन इंस्टीट्यूट आफ साइंस, बंगलौर द्वारा मनरेगा के तहत किये गये कामों पर एक अध्ययन किया गया। इस अध्ययन में यह बात सामने आयी कि मनरेगा के तहत तालाबों की मरम्मत, छोटी नदियों का पुनर्जीवन जैसे प्रयास करने से भारत की इकोलॉजी में अच्छा सुधार हुआ है। यह एक तरह से मनरेगा का साइड इफेक्ट था जिसके बाद तालाब सरकारों के लिए सरकारी विषय बन गया।
लेकिन एक व्यक्ति ऐसा भी था जो इन सबसे करीब 20-25 साल पहले से तालाब की बात कर रहा था। वो दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में पर्यावरण कक्ष चलाने वाले अनुपम मिश्र थे। तालाब के महत्व पर 1993 में एक किताब लिखी 'आज भी खरे हैं तालाब।' राजस्थान, जहां इंदिरा गांधी नहर जैसी महंगी परियोजना लाई गयी थी, यह किताब उसके विकल्पों पर बात कर रही थी। उन्होंने राजस्थान की तालाब संस्कृति का अध्ययन किया और बताया कि राजस्थान में बारिश जरूर कम होती है लेकिन वहां के लोग प्यासे नहीं हैं।
अनुपम मिश्र ने भारत में तालाब संस्कृति खासकर राजस्थान का उल्लेख करते हुए लिखा था "सैंकड़ों हजारों तालाब अचानक शून्य से प्रकट नहीं हुए थे। इनके पीछे एक ईकाई थी बनवानेवालों की, तो दहाई थी बनानेवालों की। यह ईकाई दहाई मिलकर सैकड़ा हजार बनती थी। पिछले दो सौ वर्षों में एक नयी तरह की पढ़ाई पढ़ गये समाज ने इस इकाई दहाई सैकड़ा को शून्य ही बना दिया।"
जिन रेगिस्तानी जिलों जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर की प्यास बुझाने के लिए सरकार ने इंदिरा गांधी नहर योजना का उपहार दिया था, उसमें से एक जिले जैसलमेर के लगभग पांच सौ गांवों में कोई गांव प्यासा नहीं था। अपनी पुस्तक "आज भी खरे हैं तालाब" में अनुपम मिश्र लिखते हैं कि जिले के 99.78 प्रतिशत गांवों के पास अपना जलस्रोत है, कुआं, बावड़ी, टांका या फिर जलाशय। अपनी पुस्तक में तीन मील लंबे और एक मील चौड़े उस गड़सीसर (गड़ीसर) का भी जिक्र करते हैं जिसे राजा जैसल ने बनवाया था और राजा गड़सी ने पुनर्निर्माण करवाया था। इतने विशाल मरुस्थल में ऐसा विशाल सागर समाज ने अपने पुरुषार्थ से बना लिया था।
अनुपम मिश्र ने इसके बाद एक और किताब लिखी, "राजस्थान की रजत बूंदे"। करीब तीन दशक तक वो घूम घूमकर लोगों को तालाब का महत्व समझाते रहे और बताते रहे कि यह हमारे समाज की अपनी समझ है। जल संरक्षण और समृद्धि की इससे बेहतर समझ मिलना मुश्किल है, इसलिए तालाब और तालाब बनाने वाली समझ दोनों को बचाना जरूरी है।
अनुपम मिश्र की तालाब धुन आखिरकार सरकार को भी समझ आयी और यूपीए सरकार के दौरान ही इसे मनरेगा के मुख्य कार्यों में शामिल कर लिया गया। 19 दिसंबर 2016 को अनुपम मिश्र तो इस संसार से चले गये लेकिन अपने पीछे वो समझ छोड़ गये जो तालाब की ईकाई और उसे बनाने वाले लोगों की दहाई और सैकड़ा को जानने के लिए प्रेरित करती है। अनुपम मिश्र ने अपने आपको तालाब में समाहित कर लिया था। वो बिल्कुल नहीं चाहते थे कि लोग उनके बारे में जाने। वो चाहते थे कि लोग तालाब के बारे में जानें और इसे बनाने वाले अनाम लोगों को पहचाने।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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