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Ram Rajya: नये भारत के निर्माण की नींव है अयोध्या का राम मंदिर

Ram Rajya: अयोध्‍या में सोमवार की सुबह पिछले एक सप्‍ताह से अलग थी। लगभग नौ दिनों की घनघोर ठंड के बाद सूर्य भगवान के दर्शन हो रहे थे।

ऐसा लग रहा था कि भगवान सूर्य भी सूर्यवंशी रामलला मंदिर के प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना चाहते हों।

ram Rajya in bharat Ayodhyas Ram mandir is the foundation of new India

इस खुली सुबह में सरयू के तीरे स्थित नया घाट पर एक युवा नाविक एक सादा बोर्ड लिये घूम रहा था। वह लोगों के पीछे तेज-तेज चलते हुए उस बोर्ड पर कुछ लिखवाना चाहता है, लेकिन ज्‍यादातर लोग उसकी बात को अनसुना कर राम की पैड़ी पर लगे एलईडी स्‍क्रीन की ओर तेजी से बढ़ जाते हैं। सभी को रामलला के प्राण प्रतिष्‍ठा समारोह को एलईडी स्‍क्रीन पर बिल्‍कुल पास से देखने की अधीरता थी।

वह नाविक बोर्ड लिये अपने कैमरामैन से बात कर रहे पत्रकार निशांत चौरसिया की तरफ बढ़ आता है। उनसे आग्रह करता है कि जो बोल रहा हूं उसे बोर्ड पर लिख दीजिये। निशांत जब उससे कहते हैं कि तुम खुद क्‍यों नहीं लिख लेते हो? वह बताता है कि वह पढ़ा-लिखा नहीं है। नाव चलाकर परिवार का भरण-पोषण करता है। तब निशांत लिखने को तैयार हो जाते हैं। उन्‍हें लगता है कि वह युवा नाविक सरयू में श्रद्धालुओं को घुमाने का रेट लिस्‍ट लिखवाना चाहता होगा, लेकिन वह तब भौचक्‍क हो जाते हैं, जब युवा नाविक कहता है कि लिख दीजिये - ''श्रीराम लला के प्राण प्रतिष्‍ठा के अवसर पर मांझी समाज श्रद्धालुओं को निशुल्‍क बोटिंग करायेगा।''

निशांत की दिलचस्‍पी जगती है कि रोज कमाने खाने वाले क्‍यों मुफ्त सैर करायेंगे? वह उसका नाम तथा निशुल्‍क बोटिंग कराने का कारण पूछते हैं। युवा नाविक अपना नाम जोगिंदर मांझी बताता है। वह कहता है, ''जब भगवान श्रीराम को नदी हमारे पूर्वज निषाद राज ने पार कराई तो क्‍या हम उनके प्राण प्रतिष्‍ठा के अवसर पर इतना भी नहीं कर सकते हैं? मीरा मांझी के घर जाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो सम्‍मान केवट समाज को दिया है, उसके बदले तो यह कुछ भी नहीं है। हमारे समाज ने तो अपनी श्रद्धा और खुशी से यह निर्णय लिया है।'' दरअसल, यह श्रद्धा और खुशी उस आत्‍मसम्‍मान और आत्‍मगौरव के वापस लौटने की भी है, जिसे पांच सौ साल पहले बाबर के सेनापति मीर बांकी ने उनके अराध्‍य की जन्‍मभूमि पर मस्जिद बनाकर रौंद दिया था।

जोगिंदर मांझी उस भाव के प्रतिनिधि हैं, जिसे आज समूचा सनातन महसूस कर रहा है। यह भाव उस आत्‍मगौरव का जयघोष भी है, जिसे मुगलों ने रौंद दिया था। मुगल आक्रमणकारियों द्वारा सनातन धर्मस्‍थलों पर किया गया आक्रमण केवल धन लूट के लिये नहीं था बल्कि उस हौसले और आत्‍मसम्‍मान को तोड़ने के लिये था, जो सदियों तक विदेशी आक्रमणों के बाद भी अक्षुण्ण थी।

महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे आक्रमणकारियों ने सोमनाथ एवं कृष्‍ण जन्‍मभूमि जैसे सनातन धर्म के पूजा स्‍थलों पर कई बार लूटपाट की, तोड़-फोड़ की, लेकिन मुगल आक्रमणकारियों ने लूटपाट के बाद सनातन पूजास्‍थलों के ढांचे पर मस्जिदों का निर्माण कर सनातन समाज की चेतना और आत्‍मसम्‍मान पर भी चोट पहुंचाई।

धार्मिक आधार पर देश के बंटवारे के पश्‍चात मिली आजादी के बाद भी सनातन धर्म के आत्‍मसम्‍मान एवं आत्‍मगौरव को पुनर्स्‍थापित करने की कोई पहल नहीं हुई। पाकिस्‍तान के अलग देश बनने के बाद भी हिंदू अपने हिंदुस्‍तान में दोयम दर्जे का नागरिक बनकर जीने को मजबूर रहा। हिंदुत्‍व की बात करना धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध था। अपने ही देश में दोयम होने की यह टीस उसे चुभती थी।

आजादी के बाद अपने ही आराध्‍य की जन्‍मभूमि पाने के लिये उसे सड़क से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक संघर्ष करना पड़ा। अपना खून बहाना पड़ा। गोलियों का शिकार होना पड़ा। राम जन्‍मभूमि पर रामलला मंदिर का निर्माण पांच सौ साल में लाखों लोगों के बलिदान एवं संघर्ष का सुखद समापन है, परंतु यह अंत नहीं, शुरुआत है।

यह प्रस्‍थान बिंदु है उस आत्‍मगौरव का, उस आत्‍म विश्‍वास का, जिसका धैर्यपूर्वक पांच सौ सालों से राम के अनुयायियों और भारत को इंतजार था। राम मंदिर का निर्माण मरहम है, उस दर्द और टीस का, जो आजादी के बाद भी खत्‍म होने का नाम नहीं ले रही थी। इस मरहम के असर को केवल महसूस किया जा सकता है। भावों के जरिये समझा जा सकता है। शब्‍दों से इसकी व्‍याख्‍या नहीं की जा सकती है।

इस भाव को वही समझ सकता है, जिसने अयोध्‍या में राम की पैड़ी पर लगे एलईडी स्‍क्रीन के सामने खड़े होकर प्राण प्रतिष्‍ठा के दौरान श्रद्धालुओं की नम और बहती आंखें देखी हों, जिसने उनके सिसकने की आवाजें सुनी हों, जिसने उनके मुख से जय श्रीराम का कानफोड़ू घोष सुना हो।

राम मंदिर का निर्माण केवल सदियों से चली आ रही गुलाम मानसिकता का अंत भर नहीं है, बल्कि यह नये भारत के निर्माण की नींव है। यह नये भारत के विश्‍वास एवं भरोसे का प्रतीक है। यह नये भारत के आत्‍मगौरव एवं आत्‍मसम्‍मान का उद्घोष है। यह मजबूत एवं निर्णय लेने वाले भारत की प्राण प्रतिष्‍ठा भी है।

इतिहास को यह दर्ज करने को मजबूर होना पड़ेगा कि हजारों साल तक शक, हूण, यवन, मंगोलों, इस्‍लामी, मुगल, पुर्तगाली, फ्रांसीसी, अंग्रेजों और घर के जयचंदों से जूझने के बावजूद हिंदू समाज अपने धैर्य एवं बलिदान के बल पर अपने धर्म सत्‍ता के सर्वोच्‍च प्रतीक को जन्‍मस्‍थल पर पुनर्स्‍थापित करने सफल रहा।

संभवत: यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अयोध्या से उद्घोष किया कि अब भारत का कालचक्र बदल गया है। अब आगे शुभ ही शुभ होगा। उन्होने अगले हजार साल की सीमारेखा खींची है। मतलब आनेवाली पीढियां जिस भारत में जियेंगी वो आत्महीनता की बजाय आत्मगौरव के साथ आगे बढेंगी। वो उस भारत के निर्माण का प्रयास करेंगी जिसे संतजन रामराज्य कहते हैं। उस रामराज्य के लिए ही चक्रवर्ती सम्राट मर्यादापुरुषोत्तम राजा राम अपने धाम में विराजे हैं।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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