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Sagun Nirgun Ram: जय निर्गुन जय जय गुन सागर

Sagun Nirgun Ram: संसार में जितनी सभ्यताएं रही हैं उनके लिए ईश्वर एक ऐसी कल्पना रहा जो उनकी बुद्धि से परे था। प्रकृति की व्यापकता के सामने मनुष्य की सीमित बुद्धि ने एक अवधारणा विकसित कर ली कि कोई ईश्वर होगा जिसने यह सब बनाया है। वही इसे संचालित कर रहा है।

लेकिन इसके आगे उस ईश्वरीय रहस्य को समझने या भेदने की कला भारत के बाहर संसार की किसी सभ्यता में दिखाई नहीं देती।

Sagun Nirgun Ram: Jai Nirgun Jai Jai Gun Sagar

वर्तमान सीरिया, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया या फिर अरब देशों में ईश्वर की जो अवधारणा रही है वह समृद्ध तो थी लेकिन उसकी अनुभूति की जो थीड़ी बहुत विधि उनके पास थी उसे इस्लाम और ईसाईयत ने नष्ट कर दिया। अब जो है वह कल्पना और भय है जो अल्लाह या गॉड के नाम पर उन्हें माननेवालों के बीच फैलाया जाता है।

परंतु धर्मभूमि भारत में ईश्वर भय नहीं है। वह रहस्य तो है लेकिन रहस्य भी नहीं है। वह बुद्धि के परे तो है लेकिन अनुभूति के परे नहीं है। उसे समझा नहीं जा सकता लेकिन अनुभव में उतारा जा सकता है। वह आज भी नानारूपों में प्रकट होता है और एक नियामक सत्ता के रूप में व्यवस्थाओं को संचालित करता है। वह सर्वशक्तिमान है और सर्वव्यापी भी। वह चमत्कार भी करता है इसलिए भारत के लोग मात्र कल्पना मानकर भयभीत नहीं होते, यथार्थ स्वरूप में मानकर उसे पूजते हैं।

दार्शनिक रूप से अगर ईश्वर को परिभाषित करने का प्रयास भी करें तो वह साकार और निराकार रूप में परिभाषित होता है। ईश्वर का एक स्वरूप वह जो साकार है और ईश्वर का एक स्वरूप वह जो निराकार है। मोटे तौर पर भारत में ईश्वर की खोज इन्हीं दो रास्तों से होती आयी है। जो साकार स्वरूप है उसे अनुभव करने का रास्ता मूर्तिपूजा की ओर से जाता है और जो निराकार स्वरूप है उसका रास्ता तप, योग और साधना की ओर से जाता है। भारत में दोनों ही रास्तों से ईश्वर को अनुभव करने का शास्त्र बताया गया है। जो जैसे चाहे वैसे ईश्वर की अनुभूति कर ले।

भारत की इस दार्शनिक पृष्ठभूमि से राम को देखें तो राम एक ऐसे नाम हैं जो सगुण, साकार भी हैं तो निर्गुण निराकार भी। जो सगुण साकार राम हैं वो कोई दस हजार साल पहले भारत के रघुकुल में अवतरित हुए। लेकिन वह उनका पहला सगुण साकार रूप तो है नहीं। कागभुसुंडि गरुड़ को अपनी रामकथा सुनाते हुए बताते हैं कि राम तो हर चतुर्युग में अवतार रूप में आते ही रहते हैं। वो तो गरुड़ जी को सिर्फ इस चतुर्युग के राम की कथा सुना रहे हैं। इसका आशय यह है कि वो सगुण रूप में हर चतुर्युग में धरती पर आते हैं और धर्म की स्थापना करके चले जाते हैं।

भारत के अवतारवाद का सिद्धांत भले ही काल्पनिक लगता हो लेकिन यह सामूहिक चेतना का विशुद्ध विज्ञान है। इस विशुद्ध विज्ञान के अनुसार अवतार जन की सामूहिक चेतना का प्रकटीकरण होता है जब नारायण स्वयं नर रूप में धरती पर आते हैं। राम ऐसे ही नारायण के रूप हैं जो और कुछ नहीं बल्कि जन की सामूहिक चेतना ही हैं। राम जन की सामूहिक चेतना का प्रकटीकरण हैं इसलिए वह सगुण रूप में नारायण हैं तो उनका नाम निर्गुण ब्रह्म है। इसलिए जो निराकार और निर्गुण ईश्वर के उपासक हैं वो भी राम नाम में आश्रय पाते हैं। सगुण साकार ईश्वर ही तो निर्गुण निराकार का प्रकट रूप है।

सनकादि ऋषि जब राम की स्तुति करते हैं तो उन्हें निर्गुण सगुण दोनों ही उपाधि से संबोधित करते हैं। "जय निर्गुन जय जय गुन सागर, सुख मंदिर सुन्दर अति नागर।। जय इंदिरा रमन जय भूधर, अनुपम अज अमादि सोभाकर।।" अर्थात, राम आप सुख के धाम, अत्यंत सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति आपकी जय हो। हे पृथ्वी के धारण करनेवाले आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और सदैव शोभायमान हैं।"

रामचरित मानस में सनकादि ऋषियों की जैसी उपासना तुलसीदास ने प्रस्तुत की है, असल में वही राम की वास्तविक परिभाषा है। वो दशरथ के घर जन्म तो लेते हैं लेकिन वो अजन्मा हैं। वो सगुण रूप में शरीरधारी तो हैं लेकिन वो असल में निर्गुण निराकार हैं।

भारत में भक्ति परंपरा के कवियों के नाम पर इस सगुण निर्गुण का बंटवारा अधिक किया जाता है लेकिन न तो कबीर ऐसा करते हुए दिखते हैं और न ही नानक। कबीर राम को राजा राम भी कहते हैं तो निर्गुन राम भी। इसलिए कबीर कहीं तो यह कहते नजर आते हैं कि "दुलिहिनी गावौ मंगलाचार, मेरे घर आये राजा राम भरतार।'' तो कहीं वो राम को निरंजन बताते हैं " राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे।" निर्गुण सगुण की बहस को खुद कबीर ही खारिज करते हुए कहते हैं "मेरे संगी दोई जना, एक बैष्णों एक राम, वो है दाता मुकुति का जो सुमिरावै नाम।"

गुरु नानक हों या संत रविदास वो जिस राम नाम जप का उपदेश करते हैं वो कबीर की तरह ही प्रकट रूप में साकार राम हैं तो अप्रकट रूप में निर्गुण निराकार राम। इसके पीछे इन महान संतों का मात्र एक ही उपदेश रहा है कि जैसे भी हो राम नाम का आश्रय लो। राम का नाम सभी प्रकार के कष्ट को हरनेवाला है।

राम नाम एक ऐसे आध्यात्मिक सुपर पॉवर हाउस की तरह है जो उसके संपर्क में आता है उसका इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाता है। गांधी जी तो राम नाम को ही अपना सबसे बड़ा सहारा मानते थे। दिल्ली में रहते हुए एक बार वो बीमार पड़े तो लोगों ने उन्हें डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी। हालांकि वो स्वयं प्राकृतिक तरीकों से अपना इलाज करते थे लेकिन जब लोगों ने उन्हें डॉक्टर को दिखाने की बात कही तो वो दुखी हो गये।

बहुत दुखी मन से गांधी जी ने लिखा था कि जब कोई छोटी मोटी बीमारी हो तो लोग राम नाम का आश्रय लेते हैं लेकिन बीमारी गंभीर हो जाए तो राम पर भरोसा नहीं करते। उन्हें लगता है कि डॉक्टर ज्यादा अच्छा इलाज करेगा। लेकिन मेरा भरोसा तो राम नाम में ही है। जो बीमारी वो ठीक नहीं कर सकते उसे भला संसार का कौन सा डॉक्टर ठीक कर देगा?

यह गांधी जी की राम नाम में यह अगाध श्रद्धा ही थी कि उन्होंने अपने हर संकट का समाधान राम नाम में ही खोजा। लेकिन उनके राम को भी निर्गुण राम बताकर कुछ लोग वितंडा करते हैं। जबकि गांधी जी स्वयं लिखते हैं "दुनिया के आध्यात्मिक साहित्य में तुलसीदास के रामचरित मानस का स्थान प्रमुख है। इसमें वह आकर्षण है जो महाभारत या वाल्मिकी रामायण में नहीं है।"

अर्थात दशरथ के राम ही गांधी के राम हैं। दशरथ के राम ही कबीर के राम हैं। दशरथ के राम ही रैदास और नानक के राम हैं। दशरथ के राम ही साकार राम हैं। दशरथ के राम ही निराकार राम है। दशरथ के राम ही नित्य और अनित्य राम हैं। दशरथ के राम ही जन्मा और अजन्मा राम हैं। दशरथ के राम ही इस देश के राम हैं।

वही राम हैं जो दशरथ के घर माता कौशल्या के पुत्ररुप में भी पैदा होते हैं और वही राम हैं जिनके नाम जप से ही संसार में सच्चा सुख मिलता है। भारत के आम जन के मन में राम और राम नाम में वैसा कोई सगुण निर्गुण का भेद नहीं है जैसा बुद्धिजीवियों ने पैदा करने का प्रयास किया है।

इसीलिए आज जब लगभग पांच सौ वर्ष बाद अयोध्या में रामलला के लिए दिव्य भव्य भवन बनकर तैयार हो रहा है तब भारत के हर मत, पंथ, संप्रदाय के लोग अपने अपने तरीके से उसमें सहभागी होने का प्रयास कर रहे हैं। यही राम नाम की महिमा है। यही उनकी सर्वस्वीकार्यता का प्रमाण है।

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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