Rajasthan Congress: गहलोत की लोकप्रियता का लाभ उठाने में कांग्रेस हो रही विफल
Rajasthan Congress: राजस्थान में चुनाव का मौसम चरम पर है और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इन दिनों अपने 50 साल के सार्वजनिक जीवन के सर्वाधिक सक्रिय स्वरूप में हैं। राजस्थान में एक बार फिर कांग्रेस की सरकार लाने का गहलोत का सपना है और यह सपना पूरा करने का पूरा दारोमदार उनकी जनकल्याणकारी योजनाओं पर निर्भर है। मार्च महीने से लेकर लगभग छह महीने तक लगातार पूरा राजस्थान इन लाभकारी योजनाओं के आक्रामक प्रचार से अटा पड़ा रहा।
योजनाओं के गुलाबी इश्तेहारों पर गहलोत की मुस्कुराती तस्वीर निश्चित रूप से सचिन पायलट को छोड़, सबको लुभाती रही। मगर क्या ये मुस्कुराहट इस चुनाव के बाद भी आबाद रहेगी, यह सबसे बड़ा सवाल है। गहलोत के बारे में प्रदेश में नारा चला है- 'काम किया है दिल से, गहलोत सरकार फिर से।' लेकिन 25 नवंबर को होने वाले चुनाव के लिए स्थानीय स्तर पर कांग्रेस की कमेटियां कितनी सक्रिय हैं, कोई नहीं जानता और सत्ता में फिर से आने के लिए पार्टी में कार्यकर्ताओं की जो समर्पित फौज होनी चाहिए, वह कांग्रेस में ग्राउंड पर कम ही दिखी है।

जनलाभकारी योजनाओं से लदे गहलोत के गुलाबी अभियान का दम पूरे प्रदेश में यहां तक दिखा कि विरोधी भी चिढ़ने लगे। बीजेपी को भी लगने लगा कि क्या होगा। क्योंकि महंगाई राहत कैंप के जरिए सरकार की जनता तक पहुंच बढ़ी। दस कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हर व्यक्ति को दिए जाने की बात लगभग सफल रही। हां, आचार संहिता लगते लगते जो मोबाइल फोन महिलाओं को बंटने थे, वे कहीं कहीं जरूर रुक गए।
संगठन स्तर पर कांग्रेस की कमजोरी यही रही कि कुछेक जनप्रतिनिधियों को छोड़कर कांग्रेस और कांग्रेसियों का इस अभियान से गहरा जुड़ाव कहीं नजर ही नहीं आया। महंगाई राहत कैंप का अभियान भी उन सरकारी अधिकारियों के भरोसे चलता रहा, जो चुनाव की घोषणा के होते ही आचार संहिता लागू होने के बाद केंद्र का हुकुम बजाने लग गए।
लोकतंत्र की मुश्किल यह है कि लोगों को हर बात लगातार याद दिलानी होती है, तभी वे लाभ के लोभ में साथ खड़े होते हैं। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार के फिर से रिपीट होने में बीजेपी के लाभार्थियों को मत देने के लिए बूथ तक पहुंचाने में उसके लाखों समर्पित कार्यकर्ताओं का जबरदस्त रोल रहा। लेकिन राजस्थान में लाभार्थियों को याद दिलाने वाले कार्यकर्ता बेहद कम हैं। जो कार्यकर्ता समर्पित हैं, उनको वहां के स्थानीय विधायकों, नेताओं व संगठन में सम्मान नहीं मिलने की शिकायत आम है।
मुख्यमंत्री गहलोत ने हर व्यक्ति को 25 लाख रुपए का मेडिकल बीमा कवर दिया, हर घर में गैस सिलेंडर दिया, बिजली के बिल कम किए, पेंशन घर घर पहुंची और महिलाओं को मोबाइल से लेकर गरीब को रोजगार की गारंटी मिली। जो लोग खुश हैं और वोट भी गहलोत को ही देना चाहते हैं उनको मतदान के बूथ तक कौन ले जाएगा, यह कोई नहीं जानता।
समूचे राजस्थान में सरदारपुरा, राजाखेड़ा, सिविल लाइंस, टौंक, बायतू जैसे कुछ गिने - चुने विधानसभा क्षेत्रों को छोड़कर हर जगह पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का जवाब है कि विधायकों का घमंड सातवें आसमान पर है। किसी भी कांग्रेस कार्यकर्ता के पास कोई सीधी जिम्मेदारी नहीं है और न ही उनका कहीं पर समावेश हो रहा है।
लग तो रहा था कि लाभार्थियों के दम पर गहलोत फिर से सरकार बना ही लेंगे, ठीक वैसे ही, जैसे उत्तर प्रदेश में बीजेपी फिर से बड़े बहुमत से सरकार में आई। लेकिन न तो कांग्रेस के कार्यकर्ता उत्साहित हैं और न ही उनमें उत्साह भरनेवाले लोग। चुनाव चल रहा है, मगर कई विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के पास न तो लाभार्थियों की सूची है और न ही उनको पता है कि लाभ लेने वालों को जोड़ने के लिए आखिर करना क्या है और करना है, तो उसका खर्चा कहां से आएगा।
खास बात यह है कि कब, कहां, कैसे, कौन, कितने लाभ में रहा, यह भी कार्यकर्ताओं को ज्यादा नहीं पता। जबकि कायदे से तो प्रदेश कांग्रेस से इस मामले में पूरा प्रोग्राम बनना चाहिए था और संगठन स्तर पर जिला कमेटियों के माध्यम से इस कार्यक्रम के अमल की प्रक्रिया पूरी बननी चाहिए थी। आखिर प्रदेश कांग्रेस में कुछ महीने पहले नियुक्त किए गए 21 उपाध्यक्ष, 48 महासचिव और 121 सचिव आखिर किस काम के?
दरअसल, कांग्रेस को अपने संगठन को हर स्तर पर जिस तरह से संवारना चाहिए था, चुनाव से पहले तक भी वह कर नहीं पाई, और चुनाव के बाद भी नहीं कर पा रही है। कार्यकर्ता को कसकर रखना था, जो हुआ नहीं। नेताओं को निजी जिम्मेदारियां सौंपकर जवाबदेही लेनी थी, वो भी नहीं हुआ। फिर, कांग्रेस ने तो अपने जिलाध्यक्ष तक साढ़े चार साल बाद बनाए, यहां तक कि 2018 के विधानसभा चुनाव में जमानत जब्त जिलाध्यक्ष भी लगातार साढे चार साल तक जिलों में अध्यक्ष पद पर बने रहे।
कांग्रेस के लिए निश्चित तौर पर यह सबसे बड़ी चुनौती है। लेकिन लाभ लेनेवालों को वोट देने वाले व्यक्ति के रूप में तब्दील करने की कोशिश किये बिना फिर से कांग्रेस की सरकार को लाना संभव ही नहीं है। लोकतंत्र में वैसे भी चुनाव जीतना बेहद मुश्किल काम होता है। फिर राजस्थान में तो हर पांच साल में बदलाव की बयार में अरमानों का बह जाना भी आम बात है। माना कि राजस्थान रंगों का प्रदेश है, लेकिन अगर कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कोशिश ही नहीं की तो गहलोत के गुलाबी अभियान की गुलाबी रंगत कैसे निखरेगी?
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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