Ashok Gehlot: कांग्रेस आलाकमान के सामने अशोक गहलोत की चुनौती
Ashok Gehlot: क्या कांग्रेस की आलाकमान संस्कृति को चुनौती मिलने जा रही है? क्या कांग्रेस के दबंग क्षत्रप पार्टी में बने भी रहेंगे और आलाकमान उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा? इस सवाल को जितनी गंभीरता से उठना चाहिए, नहीं उठ रहा है। इस मुद्दे पर जैसा विचार होना चाहिए था, वह भी नहीं हो पा रहा। जबकि मौजूदा विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस में ऐसा होता साफ नजर आ रहा है।
इन दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की धूम है। राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, मिजोरम और तेलंगाना में चुनाव हो रहे हैं। कांग्रेस ने इन राज्यों में सत्ता में वापसी के लिए जोर लगा रखा है। लेकिन कांग्रेस के अघोषित, लेकिन वास्तविक आलाकमान राहुल गांधी ने राजस्थान में महज तीन सभाएं की। वह भी चुनाव घोषित होने के पूरे पचपन दिनों बाद।

आमतौर पर किसी भी पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उन इलाकों में प्रचार से बचता है, जहां की रिपोर्ट उसकी पार्टी के प्रतिकूल होती है। बेशक राजस्थान में अब तक एक बार कांग्रेस तो अगली बार भाजपा के राज की परंपरा रही है। लेकिन इस बार माना जा रहा है कि कांग्रेस राजस्थान में एक बार फिर लौटने के लिए पूरा जोर लगा रही है। कांग्रेस को लेकर खराब माहौल भी नहीं बताया जा रहा है।
इसके बावजूद कांग्रेस के प्रिंस और वास्तविक आलाकमान वहां प्रचार के लिए चुनाव अभियान शुरू होने के पचपन दिनों बाद पहुंचते हैं और वह भी सिर्फ चार घंटे के लिए। जिस राज्य में 200 विधानसभा सीटें हों, जहां अपनी पार्टी की सरकार हो, वहां आलाकमान सिर्फ चार घंटे प्रचार करता है और उसके दायरे में आती महज डेढ़ दर्जन सीटें। राहुल विरोधी राजनीतिक ताकतें इसे उनकी उदासीनता बताकर उनकी खिल्ली उड़ा सकती हैं, लेकिन यह सिर्फ उदासीनता नहीं है। इसके इतर कुछ है, जो राहुल को राजस्थान जाने से रोक रहा है।
आजादी के फौरन बाद से लेकर नेहरू के पूरे कार्यकाल तक कांग्रेस में ताकतवर नेताओं की पूरी फौज थी। उसके क्षत्रप अपने-अपने इलाकों के दबंग नेता था। जनता पर उनकी पकड़ थी। कमोबेश यह स्थिति कांग्रेस के बंटवारे के पहले तक इंदिरा के दौर तक रही। लेकिन इंदिरा के दौर में कांग्रेस में आलाकमान संस्कृति का विस्तार हुआ। क्षत्रपों को कभी मजबूत होने ही नहीं दिया गया। अगर क्षत्रप मजबूत हुआ तो किसी न किसी बहाने उसकी मौजूदा भूमिका को बदलकर किसी ऐसे स्थान पर डाल दिया जाता था, जहां वह धीरे-धीरे या तो श्रीहीन हो जाए या घर बैठ जाए।
इंदिरा काल में क्षत्रपों के साथ होने वाले ऐसे व्यवहार को लेकर एक अहम बात कही जाने लगी थी। तब कहा जाने लगा था कि इंदिरा एक पौधा लगाती हैं, उसे पोषती हैं और फिर जब वह जड़ पकड़ने लगता है तो उसे उखाड़ कर दूसरी जगह रोप देती हैं या उसकी जड़ को ही हिला देती हैं। उसके बाद तो कांग्रेस में यह परिपाटी स्थापित हो गई। इसकी वजह से इंदिरा परिवार कांग्रेस का केंद्रबिंदु बनता चला गया। क्षत्रप अपने जनाधार को मजबूत करने, अपनी स्थानीय ताकत बढ़ाने के बजाय इंदिरा परिवार के प्रति अपनी निष्ठा पर ही ज्यादा मेहनत करने लगे।
प्रधानमंत्री बनने के पहले तक नरसिंह राव भी इसी परिपाटी का पालन कर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपवाद बनने की कोशिश की। यह अपवाद बनने की उनकी कोशिश ही रही, मरणोपरांत उस कांग्रेस मुख्यालय में उनकी निर्जीव काया तक को रखने की अनुमति नहीं मिली, जिसकी उन्होंने ताजिंदगी सेवा की। इंदिरा के बाद राजीव का दौर रहा हो या फिर सोनिया का या फिर राहुल-प्रियंका का, कांग्रेस में सबसे महत्वपूर्ण और ताकतवर केंद्र इंदिरा परिवार के ये वारिस ही रहे हैं। साल 2004 से 2014 तक चली केंद्र की सरकार के मुखिया भले ही मनमोहन सिंह थे, लेकिन राजनीति और नौकरशाही को पता है कि देश पर वास्तविक शासन सोनिया गांधी का ही रहा।
कांग्रेस के केंद्रीय परिवार द्वारा राजस्थान के चुनाव में महज चार घंटे देने को राजनीतिक जानकार यहां के कांग्रेसी क्षत्रप अशोक गहलोत के प्रति नाराजगी से जोड़कर देख रहे हैं। अशोक गहलोत अपने मौजूदा कार्यकाल में इतने ताकतवर हो गए हैं कि वे कांग्रेस आलाकमान की भी परवाह नहीं कर रहे। जब सचिन पायलट ने बगावत की थी, तब से उनका यह रूख दिख रहा है।
सचिन पायलट को बगावत के बाद भी सरकार और संगठन में महत्त्व देने के आलाकमान के सुझाव की नाफरमानी करते हुए गहलोत ने सचिन को उप मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष दोनों पदों से हटने पर मजबूर करके नाक रगड़ने के लिए मजबूर कर दिया। बगावत विफल होने पर सचिन को वापस कांग्रेस में ही लौटना पड़ा, इस उम्मीद के साथ कि कभी तो जादूगर का जादू फेल होगा और उन्हें आगे आने का मौका मिलेगा। हालांकि ऐसा होता नजर नहीं आ रहा है।
इसके पहले आलाकमान ने गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की तैयारी की। लेकिन गहलोत ने उसे मानने से इनकार कर दिया था। जादूगर के नाम से मशहूर अशोक गहलोत को तब राजस्थान का मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए आलाकमान ने संदेश दिया था। वह संदेश लेकर आज के कांग्रेसी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और अजय माकन जयपुर गए थे, लेकिन गहलोत ने अपनी जादूगरी दिखा दी।
जब आलाकमान ने दबाव में अशोक गहलोत को इस्तीफा देने का संदेश दिया तो गहलोत ने इस्तीफा तो दिया ही नहीं, उलटे अपने विधायकों के जरिए समानांतर अभियान चला दिया। उसकी अगुआई उनके मंत्रिमंडल के वरिष्ठ सहयोगी शांति धारीवाल करते रहे। पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में धारीवाल तो सोनिया गांधी पर भी टिप्पणी करने से नहीं हिचके। कहा जाता है कि उन्होंने तब कह दिया था कि कौन हैं सोनिया गांधी।
सोनिया परिवार धारीवाल की इस भाषा को पचा नहीं पाया। उनका टिकट काटने की कोशिश हुई। अशोक गहलोत को संदेश भी दिया गया। लेकिन गहलोत पीछे नहीं हटे और इस चुनाव में शांति धारीवाल को पार्टी टिकट दिलाने में कामयाब रहे। मीडिया में यह भी चर्चा चली थी कि टिकट तय करने हेतु आयोजित कांग्रेस की बैठक में सोनिया गांधी की उपस्थिति में गहलोत ने राहुल गांधी के साथ ऊंची आवाज में बहस भी की और उनके सुझाव मानने से इंकार भी कर दिया।
अशोक गहलोत जानते हैं कि राजस्थान में अगर वे हैं तो कांग्रेस है। उनके कदमों से ऐसा लगने लगा है कि वे बाहर से आलाकमान का सम्मान भले ही कर रहे हों, लेकिन राजस्थान के मामलों में उनकी ही चलेगी। कांग्रेस अध्यक्ष पद लेने से मना कर देना और राज्य के मामलों में अपनी मर्जी चलाने के गहलोत के फैसले से एक तथ्य साफ है कि गहलोत की दिलचस्पी राजस्थान छोड़ने में नहीं हैं। गहलोत को शायद लगता है कि राजस्थान पर पकड़ से ही उनकी राजनीतिक ताकत है। इसीलिए वे राजस्थान में अपने ढंग से संगठन और सरकार चला रहे हैं।
इंदिरा गांधी के दौर से कांग्रेस पर अपने फैसले लागू करने वाले नेहरू परिवार को गहलोत के ऐसे कदम शायद पसंद नहीं आ रहे हैं। राजस्थान की सियासी फिजाओं में चर्चा है कि राहुल इसीलिए राजस्थान में प्रचार करने नहीं आए और आए भी तो सिर्फ रस्मी तरीके से। कभी कांग्रेस आलाकमान की नाराजगी से कांग्रेसी क्षत्रप हिल जाया करते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा। कम से कम राजस्थान के मामले में तो ऐसा नहीं दिख रहा। अतीत में शरद पवार जैसे लोग कांग्रेस से अलग भले हो गए, लेकिन कांग्रेस में रहते हुए नाफरमानी नहीं कर पाए। लेकिन गहलोत ऐसा कर रहे हैं।
कांग्रेस के एक कद्दावर नेता अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार करते हैं कि अगर राजस्थान में कांग्रेस जीती तो तय है कि गहलोत अपनी मर्जी से सत्ता संभालेंगे, आलाकमान चाहकर भी उन्हें नहीं रोक पाएगा। तो क्या माना जाए कि गहलोत कांग्रेस में एक बार फिर आलाकमान से इतर क्षेत्रीय क्षत्रप की परंपरा डाल रहे हैं? उनके कदमों और उस पर आलाकमान की मजबूरी भरे कदमों को देखकर ऐसा ही लग रहा है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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