Rahul Gandhi Statement: सूरत कोर्ट का संदेश समझें नेता लोग
समय आ गया है कि सूरत कोर्ट के फैसले को राजनीतिक नेता गंभीरता से लें और विभाजनकारी बयानबाजी से परहेज करें। नहीं तो अब न जाने कितने नेताओं को अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ जाएगा।

राहुल गांधी द्वारा जिस बात को बोलने पर सूरत की कोर्ट ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 499 और 500 के तहत दोषी करार दिया उससे ज्यादा नफरत से भरे असंवेदनशील बयान राजनीतिक नेताओं द्वारा रोज दिये जाते हैं। लेकिन कोर्ट कचहरी को ऐसे बयानों से कोई मतलब नहीं होता। कोर्ट उस बात पर गौर करता है जिसकी शिकायत लेकर कोई उसके पास पहुंचता है।
2019 में राहुल गांधी ने कर्नाटक की एक रैली में मोदी के शासनकाल में घोटालेबाजों के देश छोड़ने का उल्लेख किया था। इसमें मेहुल चोकसी, नीरव मोदी और ललित मोदी का जिक्र किया था। फिर उन्होंने एक सवाल पूछा था कि "अच्छा एक छोटा सा सवाल। इन सब चोरों के नाम मोदी, मोदी, मोदी कैसे हैं? नीरव मोदी, ललित मोदी, नरेन्द्र मोदी। और अभी थोड़ा ढूंढेगे तो और बहुत सारे मोदी निकलेंगे।"
उनके इसी बयान के आधार पर गुजरात भाजपा के एक विधायक पूर्णेश मोदी ने सूरत में उनके खिलाफ मानहानि का मुकदमा दर्ज करवाया था। इस मुकदमे में उन्होंने राहुल गांधी पर आरोप लगाया था कि वो देश में एक समुदाय विशेष को उसके उपनाम के कारण चोर ठहरा रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी के भाषण की विडियो क्लिप देखने पर ऐसा नहीं लगता। वो एक समुदाय को चोर ठहराने की बजाय उन "चोरों" के नाम में मोदी होने को लेकर सवाल पूछ रहे थे।
बहरहाल, सूरत की स्थानीय अदालत ने राहुल गांधी को मानहानि तथा दो समुदायों के बीच वैमनस्यता फैलाने का दोषी पाया। सूरत के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट एचएच वर्मा ने 23 मार्च को उन्हें दोषी करार देते हुए अधिकतम दो साल की सजा सुना दी। हालांकि अदालत ने उन्हें तत्काल जमानत देते हुए एक महीने तक सजा को लागू करने पर रोक भी लगा दी ताकि 'दोषी' ऊपरी अदालतों में अपील कर सके।
यह तो हुआ राहुल गांधी का "अपराध" और उस पर सूरत कोर्ट का फैसला। लेकिन राहुल गांधी अभी आगे कोई कदम उठाते इसके पहले 24 मार्च को लोकसभा सचिवालय की ओर से एक पत्र राहुल गांधी को भेजा गया। लोकसभा सचिवालय के सेक्रेटरी जनरल उत्पल कुमार सिंह द्वारा राहुल गांधी को सूचित किया गया कि "सूरत के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा सजा सुनाये जाने के बाद उसी तिथि से वायनाड से सांसद श्री राहुल गांधी लोकसभा सदस्यता के अयोग्य हो जाते हैं। यह (निर्णय) संविधान के अनुच्छेद 102(ए)(ई) और जनप्रतिनिधि कानून 1951 के सेक्सन 8 के अनुसार है।"
लोकसभा सचिवालय द्वारा सजा सुनाये जाने के 24 घण्टे के भीतर ही राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता खत्म कर दी गयी। राहुल गांधी को ऊपरी अदालतों में एक महीने के भीतर अपील करने का अधिकार उसी अदालत ने दिया था जिसने सजा सुनाई। ऐसे में लोकसभा सचिवालय का आदेश तकनीकी रूप से सही है या गलत इसका फैसला भी अदालत की चौखट पर ही होगा जहां संविधान और कानून की धाराओं का बारीक विश्लेषण किया जाएगा।

सूरत कोर्ट ने राहुल गांधी को आईपीसी की धारा 499 और 500 के तहत दोषी करार दिया है। आईपीसी की ये दोनों धाराएं लोगों के बीच वैमनस्य पैदा करने या फिर किसी को जानबूझकर अपमानित करने संबंधी दोष निर्धारित करती हैं। जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 का सेक्शन 8 भी दो समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाने या किसी समुदाय के खिलाफ जानबूझकर गलत बयानी करने पर उसकी सदस्यता खत्म करने का प्रावधान है। संभवत: यही कारण है कि सूरत की अदालत ने भले ही राहुल गांधी को आईपीसी की धारा 499 के तहत दोषी ठहराया हो, लोकसभा सचिवालय ने जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के सेक्शन 8 का उल्लेख किया है क्योंकि दोनों में ही एक बात कही गयी है।
अब क्योंकि ये सब कानून की महीन बातें हैं जिनका राजनीतिक नेताओं के बयानों से कभी भी दूर दूर का रिश्ता रहा नहीं है। आज की जो भारतीय राजनीति है उसमें दो समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाना ही राजनीतिक सफलता का आधार बन गया है। बीते चार पांच दशक की कांग्रेसी राजनीति का जायजा लें तो पता चलेगा अंग्रेजों के बाद कांग्रेस ने सबसे अधिक बांटों और राज करो की नीति पर काम किया है। इसके कारण भारतीय राजनीति में खालिस्तान, जातिवाद, तथा मुस्लिम तुष्टीकरण जैसे ऐसे रक्तबीज पैदा हुए जो अब खत्म होने का नाम नहीं ले रहे।
भारत में समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करके राजनीतिक सफलता प्राप्त करना आज की तारीख में किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे सस्ता शार्टकट है। राजनीतिक दलों के नेता बहुत संकट की स्थिति में भी अपने वोटबैंक के हिसाब से ही राजनीतिक बयान देते हैं। उनके इन बयानों से समाज में कैसा बिखराव पैदा होगा, इसकी वो कभी चिंता नहीं करते। उन्हें सिर्फ अपनी जीत हार से मतलब होता है।
भारत की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता है। यहां जातियों में जातियां, वर्गों में वर्ग और समुदाय में समुदाय रहते हैं। लेकिन यह भारतीय नेताओं की ही विभाजनकारी सोच है कि आज भारत की यही विविधता इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई है। कभी दलित ओबीसी के नाम पर, कभी अगड़े पिछड़े के नाम पर तो कभी अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक के नाम पर नेताओं ने भारत के लोगों को भीतर से इतना बांट दिया है कि आज हमारी राष्ट्रीय पहचान ही खतरे में पड़ गयी है।
राहुल गांधी पर सूरत कोर्ट की सजा के बहाने ही सही सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को होश में आने का समय आ गया है। अगर अब भी वो वर्ग समन्वय के बजाय वर्ग संघर्ष की राजनीति को बढ़ावा देने वाले बयान ही देते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब न जाने किन किन नेताओं की सदस्यता खतरे में पड़ जाएगी। अगर कोर्ट कचहरी से नेतागीरी का भविष्य तय होना है तो राहुल गांधी के जिस बयान के लिए उन्हें सजा मिली, उससे ज्यादा जहरीले बयान देनेवाले नेता भला अब कैसे बच पायेंगे?












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