Rahul Gandhi Case: क्या अब अदालतों में तय होगा नेताओं का राजनीतिक भविष्य?
राहुल गांधी का राजनीतिक भविष्य एक स्थानीय अदालत से निर्धारित करने का प्रयास किया गया है, वह भी उनके एक राजनीतिक बयान पर। तो क्या अब अदालतों से ही नेताओं का भविष्य तय होगा?

Rahul Gandhi Case: संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव व्यवस्थाओं का वर्णन है। गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 और अन्य ब्रिटिश कानूनों में चुनाव का जिम्मा कार्यपालिका पर होने से केवल मजाक होता था। संविधान सभा में भी स्वतंत्र चुनाव आयोग की राय उभरी थी। चुने हुए व्यक्तियों में कदाचार की भी संभावना व्यक्त की गई थी। इसीलिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (1) तथा (2) में ऐसे अपराध वर्णित हैं जिनमें कम या ज्यादा सजा होने पर भी तत्काल प्रभाव से सदन की सदस्यता से अयोग्यता लागू हो जाती है।
इनमें भारतीय दंड संहिता के तहत समुदायों के बीच सामाजिक विद्वेष, चुनाव संबंधी अपराध, बलात्कार, स्त्री के प्रति क्रूरता, आदि सहित नागरिक अधिकार अधिनियम, कस्टम अधिनियम, गैर कानूनी गतिविधि प्रतिरोध अधिनियम, फेरा, मादक द्रव्य संबंधी अपराध, आतंकवादी गतिविधियां, पूजा स्थल संबंधित अधिनियम, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का अपमान, भ्रष्टाचार अधिनियम, मुनाफाखोरी तथा जमाखोरी मिलावट खोरी के अपराध सहित दहेज संबंधी अपराध भी शामिल हैं। अन्य किसी अपराध के लिए भी 2 वर्ष या अधिक की सजा किसी नागरिक को मिले तो वह चुनाव लड़ने के लिए योग्य नहीं होता है लेकिन ऐसी सजा मिलने के वक्त यदि वह सांसद या विधायक है तो उसे तब तक अपने संसदीय आसन पर बैठे रहने का अधिकार होगा जब तक कि उसके द्वारा की गई अपील या रिवीजन पर कोई निर्णय ना हो जाए।
अधिनियम की धारा 83 में लिखा है कोई व्यक्ति जो उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी अपराध से भिन्न किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया गया है और 2 वर्ष या अधिक के कारावास से दंडित किया गया है, वह ऐसी दोष सिद्धि की तारीख से अयोग्य होगा और उसे छोड़े जाने से 6 वर्ष की अतिरिक्त कालावधि के लिए अयोग्य बना रहेगा। इस अधिनियम की धारा 8 के (4) में इसे और अधिक पुख्ता किया गया है।
स्वर्गीय राजीव गांधी के काल में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) के अनुसार 2 वर्ष या अधिक के लिए दोष सिद्ध हो कर सजा प्राप्त सांसदों और विधायकों को तब तक के लिए कुर्सी पर बने रहने का अभयदान दे दिया गया जब तक उनके आपराधिक प्रकरणों से संबंधित अपीलों का आखिरी निपटारा नहीं हो जाता। 1989 में आए इस संशोधित प्रावधान के 16 साल बाद लोक प्रहरी नामक संस्था की ओर से लिली थॉमस ने जनहित याचिका के रूप में इसे चुनौती दी। 10 जुलाई 2013 को न्यायमूर्ति एके पटनायक और एसजे मुखोपाध्याय की बेंच ने उपरोक्त धारा 8 (4) को असंवैधानिक करार दिया।
सरकार की ओर से उच्चतम न्यायालय को बताया गया कि दोष सिद्ध सांसद या विधायक को कोई लाभ नहीं मिलता है उनका मकसद केवल सदन की संरचना की सुरक्षा है। सरकार की ओर से खड़े वकीलों का यह भी तर्क था कि अपराधिक अपीलीय न्यायालय केवल सजा को स्थगित कर सकते हैं दोष सिद्धि के तर्क को नहीं। इसके विरोध में तर्क दिया गया कि नवजोत सिंह सिद्धू बनाम पंजाब राज्य 2007, रमा नारंग बनाम रमेश नारायण 1955, रवि कांत एस पाटिल बनाम स्वभाव एस बंगाली 2007 जैसे प्रकरणों में उच्चतम न्यायालय ने साफ साफ कहा है कि मुनासिब प्रकरणों में दोष सिद्धि के प्रभाव को भी अपीलीय न्यायालय तथा हाई कोर्ट द्वारा अपील के निराकरण तक स्थगित किया जा सकता है। कई प्रकरणों में ऐसे आदेश पारित भी हुए हैं। तब अदालत का कहना था कि दोष सिद्धि को भी स्थगित कराने का उल्लेख स्पष्ट रूप से करना होगा।
सामान्य तौर पर मजिस्ट्रेट के दंड आदेश या देश के विरुद्ध दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 374 में अपील की जाती है। अपील पेश करने के बाद धारा 389 के अंतर्गत अपील लंबित रहने तक दंड आदेश या अन्य आदेश का निलंबन और अपीलार्थी को जमानत पर छोड़े जाने के आवेदन किए जा सकते हैं। रमन के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि अपीलीय न्यायालय को धारा 389 के तहत दंड आदेश को स्थगित करने का जो अधिकार है उससे दोष सिद्धि को स्थगित करने का अधिकार भी मिल जाता है। हालांकि धारा 482 के तहत अतिरिक्त रिवीजन न्यायालय और हाई कोर्ट को भी पूरा अधिकार है कि वह दोष सिद्धि के दंड को स्थगित कर दें।
इस तरह के मामले में नवजोत सिंह सिद्धू का मुकदमा बहुत दिलचस्प है। 27 दिसंबर 1988 को नवजोत सिंह सिद्धू ने एक बुजुर्ग से मारपीट की थी, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई थी। उस प्रकरण के बाद वर्षों तक चले मुकदमे में सजा की बात अखबारों में छपी तो सिद्धू ने नैतिकता के आधार पर संसद से इस्तीफा दे दिया था। बाद में चुनाव लड़ने के लिए सिद्धू उच्चतम न्यायालय गए। इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सिद्धू को चुनाव लड़ने की पात्रता मिलनी चाहिए। अदालत ने सिद्धू की नैतिकता को आगे कर उनके पक्ष में फैसला दिया था।
पहले सांसद या विधायक अपराध में लिप्त पाए जाने के बावजूद कानून की आड़ लेकर ठाट से संसद या विधानसभा में बने रहते थे। लिली थॉमस के फैसले में उच्चतम न्यायालय ने सबको सामान्य नागरिक की कोठी में लाकर खड़ा कर दिया था। मनमोहन सिंह की सरकार ने अदालत के इसी फैसले को निष्क्रिय करने के लिए अध्यादेश पारित कराया था जिसकी प्रतियां राहुल गांधी ने फाड़ते हुए कहा था क्या बकवास है। इसके बाद मनमोहन सिंह सरकार ने वह अध्यादेश वापस ले लिया था।
संविधान के अनुच्छेद 19( दो) में लिखा है कि मानहानि के आधार पर अधिनियम बनाने पर अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रतिबंध लग सकता है। सरकार ने अभी तक कोई अधिनियम नहीं बनाया लेकिन भारतीय दंड संहिता इस संबंध में लागू है। भारतीय दंड संहिता की धारा 499 में मानहानि की परिभाषा दी गई है और विस्तार से उसके अपवाद भी दिए गए हैं। धारा 500 में 2 वर्ष की सजा या जुर्माने का प्रावधान है। इन धाराओं में पहली बार अमूमन सजा नहीं दी जाती, जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जाता है। लेकिन राहुल गांधी के प्रकरण में एक वाक्य के कारण 2 वर्ष की सजा दे दी जो भारत के इतिहास में शायद अनोखी है। इस मामले में अदालत की अति सक्रियता भी काबिले गौर है।
छोटी अदालतों से निकलने वाले फैसले किस तरह लिए जाते हैं इससे कमोबेश हर आदमी परिचित है। रसूखदार लोग अपने पक्ष में अक्सर फैसला करवाते रहते हैं। ऐसे हालात में लोक प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन आवश्यक है। नहीं तो अंग्रेजों के जमाने में बने कानूनों का सहारा लेकर राजनीतिक दल एक दूसरे को निशाना बनाते रहेंगे। उदाहरण के लिए अश्लीलता को लेकर भारतीय दंड संहिता में धारा 292 और 294 है। वहां किसी भी लेखक की कृति को, पुस्तक को, कविता को, उपन्यास को, चित्रकला को, नाटक को लेकर कोई भी पुलिस में रिपोर्ट कर सकता है कि फलां रचना अश्लील है और पुलिस उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। अब सवाल है कि एक सिपाही कविता में अश्लीलता कैसे ढूंढ लेगा। लेकिन ढूंढ लेता है। मुकदमे हो जाते हैं और सजा हो गई और वह निर्वाचित प्रतिनिधि हुआ तो एक थानेदार के विवेक पर किसी जन नेता या उस प्रतिनिधि का पूरा भविष्य सलीब पर चढ़ जाएगा।
भारतीय राजव्यवस्था में बहुत खामियां हैं इस पर गंभीरता से सोचा जाना चाहिए। पहले के नेताओं का राजनीतिक व्यवहार अलग किस्म का था आजकल के नेता एक दूसरे को गड्ढे में डालने में कोई हिचक नहीं करते। परस्पर सहानुभूति का दौर खत्म हो गया है। राजनीति तो वैसे ही फुल टाइम जॉब है। एक दूसरे का जानी दुश्मन बनने के बजाय राजनीतिक दलों को पूर्व की भांति टेबल पर बैठकर कहकहों के बीच ही राजनीति का ककहरा, मुहावरा गढ़ना श्रेयस्कर होगा।
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वरना अतीत में दिये गये आपत्तिजनक बयानों के भंडार पड़े हैं। मौत का सौदागर, चौकीदार चोर है, जर्सी गाय, 100 करोड़ की विधवा, सारे आतंकी एक धर्म विशेष से, कश्मीरी गांधी, राम ज्यादा ह*******, देश के गद्दारों को गोली मारो आदि टिप्पणियों को भी अगर अदालत की चौखट तक ले जाया गया तो नेताओं का राजनीतिक भविष्य अदालतों से ही तय होगा।
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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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