Rahul Gandhi: कम्युनल पॉलिटिक्स का मुखौटा बनते राहुल गांधी
आज जब देश एक और आमचुनाव के लिए तैयार हो रहा है तब भारत की सबसे पुरानी पार्टी के रूप में कम्युनिस्ट पार्टियों की कुछ खास मौजूदगी दिखाई नहीं देती। लेकिन कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी कम्युनिस्टों की कम्युनल पॉलीटिक्स का मुखौटा बने घूम रहे हैं।
भारत जोड़ो यात्रा के समापन के मौके पर बिला वजह उन्होंने 'हिन्दू धर्म में एक होती है शक्ति' का उल्लेख करके उसे खत्म करने की बात कह दी। विवाद बढा तो उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफार्म X पर सफाई दे दी कि वो नरेन्द्र मोदी द्वारा इकट्ठी की जा रही शक्ति की बात कर रहे थे। अगर ऐसा ही था तो उन्होंने उसे हिन्दू धर्म से क्यों जोड़ा, यह समझना कठिन है।

असल में राहुल और प्रियंका के आसपास उनके कम्युनिस्ट सलाहकारों का घेरा है जिसके खिलाफ प्रमोद कृष्णम जैसे उनकी पार्टी के नेता ही सवाल उठा चुके हैं। ये कम्युनिस्ट सलाहकार ही इस समय राहुल गांधी और प्रियंका को संचालित कर रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस पर कम्युनिस्टों का वैचारिक प्रभाव रहा है लेकिन जब से कम्युनिस्ट पार्टियों का भारत में पतन हुआ है, कांग्रेस नवोदित कामरेडों की शरणस्थली बन गयी है।
अब न सिर्फ कैडर के रूप में आईसा और एसएफआई के वर्कर कांग्रेस में पहुंच रहे हैं बल्कि वैचारिक रूप से कांग्रेस पार्टी अब कम्युनिस्ट पार्टी में ही परिवर्तित हो गयी है। कम्युनिस्ट पार्टियां जिस विभाजनकारी राजनीति के चलते भारत में अप्रासंगिक हो गयीं, अब कांग्रेस पार्टी भी उसी विभाजनकारी राजनीति को अपना चुकी है।
बहुत कम लोग इस बात को समझ पाते हैं कि भारत में कम्युनल और कास्टिस्ट (सांप्रदायिक और जातिवादी) राजनीति की बुनियाद कम्युनिस्ट नेताओं और विचारकों ने ही डाली है। समकालीन भारत में हम जितनी भी राजनीतिक समस्याएं देखते हैं, उसकी बुनियाद में कहीं न कहीं, कोई न कोई कम्युनिस्ट बैठा मिलेगा। बंगाल और त्रिपुरा में राजनीतिक रूप से हैसियत खो देने के बाद अब उनकी राजनीति केरल तक सिमटी हुई है। इसलिए उनकी राजनीतिक आवाज भले न हो लेकिन बौद्धिक रूप से आज भी वो भारत की राजनीति को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं।
समाजकर्मी से लेकर रंगकर्मी, साहित्यकार, समाचार जगत, न्यायालय हर ओर उनका दबदबा है। सामाजिक बहस पैदा करने या राजनीतिक एजंडा खड़ा करने में वो आज भी संघ परिवार से बहुत ताकतवर हैं। उनके पास कमी है तो सिर्फ उस मुखौटे की जो उनके एजंडे को राजनीतिक रूप से आवाज दे सके। बिहार में तेजस्वी यादव हों, तमिलनाडु में स्टालिन हों या केन्द्र में राहुल गांधी। ये नेता कम्युनिस्टों की उसी कम्युनल राजनीति को आवाज देते हैं जिसकी आड़ में वो आज भी भारत में वर्ग संघर्ष का स्वप्न देखते हैं।
इसे और अच्छे से समझने के लिए राहुल गांधी की दो भारत यात्राओं का भी अध्ययन करना चाहिए। अपनी दोनों ही यात्राओं के दौरान उन्होंने अल्पसंख्यवाद के नाम मुस्लिमों का बचाव किया और बहुसंख्यकवाद के नाम पर हिन्दुओं का विरोध। अगर राहुल गांधी आरएसएस पर वैचारिक हमला बोलते हैं और कहते हैं कि वो एक विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं तो यह कांग्रेस के नेता की आवाज नहीं होती। कांग्रेस ने कभी विचारधारा की राजनीति में विश्वास ही नहीं किया। यही उन्हीं कम्युनिस्टों की आवाज है जो आरएसएस को देश के एक दुश्मन के तौर पर प्रस्तुत करके समूचे हिन्दुओं पर निशाना साधना चाहते हैं।
कम्युनिस्टों का आरएसएस की विचारधारा से टकराव है जिससे पर वो निरंतर हमला करते रहते हैं। फिर चाहे वह सावरकर का माफीनामा हो या नाथूराम गोडसे द्वारा गांधी की हत्या। कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी और नेता इन घटनाओं को आरएसएस से जोड़कर उस पर निशाना साधते हैं। यह कांग्रेस के एजंडे में कभी शामिल नहीं रहा लेकिन जब से राहुल गांधी कम्युनिस्टों का मुखौटा बनकर घूमने लगे हैं वो ऐसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाने लगे हैं।
यह राहुल गांधी की राजनीतिक समझ की कमी है या फिर वो ऐसा सोच समझकर करते हैं यह तो वो ही जाने लेकिन राहुल गांधी के बयान, बर्ताव और व्यवहार का नुकसान आखिरकार कांग्रेस को ही होता है। यह कम्युनिस्ट विचारधारा के लोगों की जीत भले ही कही जाए लेकिन असल में इससे कांग्रेस ही कमजोर होती है। इसका एक नमूना कांग्रेस द्वारा जारी पंच न्याय का सिद्धांत भी है जिसे राहुल गांधी की यात्रा के बाद जारी किया गया है।
कांग्रेस से पंच न्याय सिद्धांत को देखें तो ऐसा लगता है इसे कांग्रेस के नेताओं ने नहीं बल्कि कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों ने तैयार किया है। इसमें हसिया हथौड़ा यानी किसान मजदूर के साथ ओबीसी एससी एसटी को भी न्याय दिलाने की बात कही गयी है। एक ओर अगर आप समाज को किसान, मजदूर और आदिवासी में बांट देते हैं तो फिर एससी/एसटी/ओबीसी के लिए अलग से जगह कहां बचती है? लेकिन यह विरोधाभाष कांग्रेस द्वारा जारी पंच न्याय सिद्धांत में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
सांप्रदायिकता की राजनीति और जातिवादी विभाजन हमेशा से कम्युनिस्ट बुद्धिजीवियों के प्रिय सब्जेक्ट रहे हैं। एक ओर वो वर्गविहीन समाज की बात करते हैं तो दूसरी ओर वर्ग संघर्ष को बढानेवाले उपाय भी करते हैं। राहुल गांधी को कम्युनिस्ट विचारधारा की यह महीन कमी नहीं समझ में आ रही है तो उनके लिए यह विचारधारा उसी तरह से संकट बन जाएगी जैसे खुद कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बन गयी।
बहुसंख्यक का विरोध करके या उन्हें विभाजित करने की कोशिश करके कोई भी राजनीतिक दल अब वर्चस्व स्थापित नहीं कर सकता। चीन जैसे साम्यवादी देश में भी हान समुदाय को विशिष्ट महत्व इसलिए मिलता है कि वो चीन में बहुसंख्यक हैं। कोई भी राजनीतिक विचारधारा वर्ग विभाजन की मानसिकता से लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रह सकती। फिर चाहे वह जातिवादी बंटवारा हो या फिर धार्मिक बंटवारा।
कांग्रेस आज अगर इतनी कमजोर स्थिति में है तो इसका कारण वही बंटवारा वाली मानसिकता ही है जिसने मुस्लिम तुष्टीकरण को मजबूत करने के लिए हिन्दुओं को जातियों, समूहों में बांटकर रखने का प्रयास किया। उनका वह प्रयोग असफल रहा जबकि उसके जवाब में आरएसएस ने जिस सामूहिकता को बढावा दिया आज वह देश में अजेय अवस्था पर पहुंच गया है।
अच्छा हो कि समय रहते राहुल गांधी किसी विचारधारा का मुखौटा बनने की बजाय कांग्रेस के उस परंपरागत विचार पर लौट जाएं जो समन्वयवादी थी। वास्तविक रूप से जो सबका साथ और सबका विश्वास पाने का प्रयास करती थी। अभी राहुल गांधी जिस विचारधारा वाले रास्ते पर चल रहे हैं उससे वो और उनकी पार्टी माइनारिटी पार्टी ही रह जाएगी, मेजोरिटी की पार्टी कभी नहीं बन पायेगी।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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