Lalu vs Modi Parivar: लालू का परिवार बनाम मोदी का परिवार
Lalu vs Modi Parivar: पटना की रैली में लालू प्रसाद यादव ने अपने पुराने तरीके से राजनीतिक वापसी की। अपने तीखे और चुटीले भाषण के लिए विख्यात लालू प्रसाद यादव ने मोदी के परिवार पर सवाल उठाया तो पूरी भाजपा बचाव में उतर आयी।
मोदी के बचाव में भाजपा ने मोदी का परिवार कैम्पेन ही शुरु कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि लालू प्रसाद यादव ने जो सवाल उठाया है क्या वह पूरी तरह से गैर जरूरी है? पटना की रैली में लालू यादव ने मां के स्वर्गवास पर मोदी द्वारा मुंडन न कराने का भी सवाल उठाया और कहा था कि मोदी तो हिन्दू भी नहीं है।

लालू के सवाल को बीजेपी ने कितनी गंभीरता से लिया है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि तत्काल बीजेपी की ओर से पूरा देश मोदी का परिवार का नारा चला दिया गया। हर प्रदेश से मोदी का जुड़ाव पैदा करने के लिए एआई की मदद लेकर इस बार उस प्रदेश की भाषा में ही मोदी का भाषण सोशल मीडिया पर उपलब्ध होगा। इसके साथ ही अलग अलग भाषाओं में नरेन्द्र मोदी का सोशल मीडिया अकाउण्ट बनाया गया है जहां उसी भाषा में सूचना दी जाएगी।
निश्चित रूप से चुनाव की घोषणा होने के ठीक पहले लालू प्रसाद यादव ने परिवार का सवाल उठाकर नरेन्द्र मोदी को एक बड़ा हथियार दे दिया है। अब वो इसी हथियार को पूरे विपक्ष की ओर चलायेंगे और पूरा कैम्पेन इस दिशा में ले जाएंगे कि पूरा देश ही मोदी का परिवार है। देश का हर नागरिक उनके परिवार का हिस्सा है। पटना में 5 मार्च को मौजूद निर्मला सीतारामन ने इसका इशारा भी कर दिया।
लेकिन लालू प्रसाद यादव ने जो सवाल उठाया है वह कहीं असर ही नहीं करेगा, ऐसा भी नहीं है। भारत में जो राजनेता शीर्ष पर बैठे होते हैं उनका निजी जीवन सार्वजनिक चर्चा का विषय बनता ही है। फिर वो प्रधानमंत्री हों, मुख्यमंत्री हों या ऐसे ही किसी अन्य महत्वपूर्ण पद पर बैठे कोई अन्य राजनेता। उनका निजी जीवन उनका निजी नहीं रह जाता। उनके निजी जीवन के आधार पर ही उनकी सार्वजनिक छवि का निर्माण होता है।
मोदी से सीधे तौर पर सवाल पूछने की हिम्मत तो किसी की नहीं है लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी से तो एक पत्रकार द्वारा सीधे पूछ ही लिया गया था कि क्या आप ब्रह्मचारी हैं? इस पर हाजिर जवाब अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वो अविवाहित हैं लेकिन ब्रह्मचारी नहीं। इसी तरह एक और टीवी प्रोग्राम में उस समय के एक चर्चित पत्रकार ने जब उनसे यह पूछा कि अटल जी अपने निजी जीवन के प्रेम प्रसंग के बारे में कुछ बताइये। तब एक बार फिर हाजिर जवाब अटल जी यह कहते हुए बच निकले थे कि निजी जीवन की चर्चा सार्वजनिक मंचों पर नहीं की जाती।
यह तो हाजिर जवाब अटल जी थे जो ऐसे मारक प्रश्नों का भी मुस्कुरानेवाला जवाब दे देते थे लेकिन मोदी के सामने अव्वल तो ऐसे प्रश्न आते नहीं और आते भी हैं तो वो उसका राजनीतिक प्रतिप्रश्न पैदा करते हैं। याद करिए 2014 का चुनाव। उस समय मोदी की पत्नी श्रीमती यशोदाबेन की बहुत चर्चा उछाली गयी थी। लेकिन न तो तब और न ही अब। मोदी ने इस प्रश्न को कभी अपने तक पहुंचने नहीं दिया। उन्होंने इस प्रश्न को लेकर मौन साध लिया और शायद यही मौन उनका आखिरी जवाब है।
यह बात सही है कि मोदी के अपने निजी प्रशंसकों की बड़ी फौज है जो उनको अपने परिवार का ही सदस्य मानते हैं। हमारे यहां शास्त्र भी कहते ही हैं कि 'उदारचरितानाम् तु वसुधैव कुटुम्बकम्।' अर्थात जो उदार चरित्र वाले लोग हैं उनके लिए संपूर्ण पृथ्वी उनका परिवार है। लेकिन इस परिवार का अर्थ यह नहीं कि आपके जैविक परिवार का कोई अर्थ नहीं रह जाता। भारतीय संविधान भले ही परिवार के अस्तित्व को स्वीकार न करे और उसकी जगह सिर्फ व्यक्ति को मान्यता देता हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भारत परिवार व्यवस्था के बाहर चला गया है।
परिवार व्यवस्था भारतीय समाज संरचना का आधार है। व्यक्तियों का परिवार, परिवारों का कुल, कुलों का समूह जाति और जातियों का समूह मिलकर भारतीय समाज की संरचना करते हैं। भारत की इस सामाजिक संरचना से अगर जैविक परिवार को ही निकाल दिया जाए तो पूरी भारतीय सामाजिक संरचना भरभराकर गिर जाती है। इसलिए लालू ने मोदी के जिस परिवार पर सवाल किया है उसको राजनीतिक बयानबाजी करके ही नहीं मिटाया जा सकता। जो मोदी के समर्थक हैं या नहीं हैं, उनके मन में यह सवाल जरूर हलचल पैदा करेगा कि मां के मरने पर भी मोदी ने मुंडन क्यों नहीं करवाया?
स्वयं नरेन्द्र मोदी भारतीय राजनीति के जिस परिवारवाद पर प्रहार करते हैं तो उनका आशय डाइनेस्टी पालिटिक्स से होता है। मतलब एक ही परिवार में सत्ता सिमटकर नहीं रहनी चाहिए जैसे लालू यादव के परिवार में सिमटी हुई है। मोदी की इस बात से कोई असहमत भी नहीं हो सकता कि लोकतंत्र में रजवाड़ा सिस्टम नहीं लगाया जा सकता। लेकिन उनकी अपनी पार्टी में ही जब नेताओं के पुत्र पुत्रियों को टिकट मिलता है तो वो उसका ठीक से बचाव नहीं कर पाते।
अभी संसद के आखिरी सत्र में भी वो इस परिवारवाद पर बोल रहे थे लेकिन वो इस सवाल का ठीक से बचाव नहीं कर पाये कि उनकी पार्टी में नेता पुत्रों को टिकट क्यों दिया जाता है। तब उन्होंने यह कहा कि वो प्रतिभावान नेताओं को सिर्फ इसलिए किनारे करने के पक्षधर नहीं हैं कि उसका संबंध किसी नेता के परिवार से है। यह तर्क कुछ ऐसा ही है जैसे स्वर्गीय बाल ठाकरे ने अपनी अंतिम दशहरा रैली में उद्धव के बेटे आदित्य ठाकरे को उत्तराधिकारी घोषित करते हुए दिया था। जीवनभर नेहरु गांधी वंश के परिवारवाद को कोसने वाले बाल ठाकरे हों या नरेन्द्र मोदी। उनके कहने का आशय सिर्फ इतना होता है कि मेरी पार्टी का परिवारवाद अच्छा, दूसरों का बुरा।
अब सवाल यह है कि क्या आखिरकार रजवाड़ों को खत्म करनेवाला लोकतंत्र पुन: परिवारवादी रजवाड़ों में परिवर्तित हो जाएगा या फिर नये लोगों को राजनीति में जगह मिलती रहेगी? क्या होगा यह तो समय बतायेगा लेकिन इतना तय है कि नेताओं को कभी न कभी उस परिवार का सामना करना ही होता है जिसमें वह पैदा होता है। अगर वह उसके लिए लालू की तरह सबकुछ करता है तो भी बदनाम होता है और अगर मोदी की तरह कुछ नहीं करता है तो भी सवाल खड़ा होता है। लालू के परिवारवाद और मोदी के परिवारवाद में यही बुनियादी अंतर है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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