अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की दुर्दशा
पहली लोकसभा के संसद सदस्य रहे डॉ रघुनाथ सिंह अपनी पुस्तक "आर्याना अफगानिस्तान" में लिखते है, "काबुल में हिन्दू और सिख बहुत दुकानदार मिलेंगे। टहलते हुए उनकी दुकानों पर गए। वे बड़े प्रेम से मिले। सिख लोग लगभग 200 वर्षों से यहां है। हिंदुस्तानियों का मुख्य बाजार अफजल बाजार है। यहां सभी दुकानदार हिंदुस्तानी है। काबुल में आठ गुरुद्वारे मुख्य है। गुरुद्वारा श्री हरिहर राय प्रमुख है। हिंदुओं के मंदिर गुरुद्वारों के समान मकानों में है। ठाकुरद्वारे कई है। एक स्थान पर तो छोटे बच्चों को हिंदी पढ़ाई जा रही थी।"

दरअसल, डॉ. रघुनाथ के यह संस्मरण उनकी अफगानिस्तान यात्रा के है। इन सभी यादों को उन्होंने वर्ष 1958 में एक पुस्तक में लिपिबद्ध कर दिया। इस पुस्तक की प्रस्तावना मोरारजी देसाई ने लिखी थी जो कि बाद में भारत के प्रधानमंत्री भी बने। तब के अफगानिस्तान में हिंदुओं और सिखों की स्थिति पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा है। वे आगे लिखते है, "काबुल में भारतीय श्री रामनाथ जी ने अपने निवास स्थान पर आने के दूसरे दिन ही चाय पिलाई। हम लोगों के अतिरिक्त चार-पांच व्यक्ति और उपस्थित थे। श्रीरामनाथ हींग के सबसे बड़े व्यापारी है। इनकी एक फर्म दिल्ली में भी है।"
डॉ रघुनाथ के साथ अकबरभाई चौढा, राधारमण, महावीर प्रसाद भार्गव, नवाबसिंह चौहान भी थे। उन्होंने जिस अफगानिस्तान के हिंदुओं और सिखों के सकारात्मक हालातों का बयान किया है वे कोई ज्यादा पुराने नही बल्कि 1957 के आसपास के किस्से है। मगर आज वहां ऐसा नही है। कल ही वहां एक गुरुद्वारे में आतंकवादी हमला हुआ और एक ग्रंथी की हत्या कर दी गयी। इससे पहले 2020 में एक और गुरुद्वारे में भयानक आतंकी हमला हुआ और 27 अल्पसंख्यक सिखों को निशाना बनाकर मार दिया गया। यह घटना उस समय की है जब लगभग 150 सिख गुरूद्वारे में प्रार्थना के लिए इक्कठा हुए थे। अचानक से एक फिदायीन ने अपने को बम से उड़ा दिया और बाकि आतंकियों ने गुरूद्वारे पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरू कर दी। वर्ष 2018 में में जलालाबाद में 10 सिखों का नरसंहार कर दिया गया। साल 2010 में तालिबानी आतंकियों ने दो सिखों के सिर काटकर उन्हें गुरूद्वारे में रखवा दिया था।
साल 2016 में रॉयटर्स ने काबुल के जगतार सिंह की कहानी को प्रकाशित किया था। सिंह ने इस अंतरराष्ट्रीय समाचार एजेंसी को बताया कि "अफगानिस्तान में अगर आप मुसलमान नहीं तो आप इंसान नहीं है। हम अपने दिन की शुरुआत डर और अलगाव से करते है। मेरे आठ साल के बेटे जसमीत सिंह ने स्कूल जाना बंद कर दिया क्योंकि वहां उसे 'हिन्दू काफिर' कहकर बुलाया जाता था।"
इन बीतें बर्षो में अफगानिस्तान के गैर-मुसलमानों के नरसंहार, और धार्मिक-आर्थिक-सामाजिक शोषण जैसे मामलों की संख्या दर्जनभर नही सैकड़ों में है। इससे बड़ी क्या विडंबना होगी कि संयुक्त राष्ट्र संघ का दफ्तर काबुल में है। अफगानिस्तान वर्ष 1969 से आर्गेनाईजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन का सदस्य देश है। फिर भी आज तक इन दोनों संस्थाओं ने हिन्दू और सिख अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए कोई कदम नही उठाये हैं।
अफगानिस्तान में कोई आधिकारिक जनगणना नही होती है। अमेरिका के स्टेट्स डिपार्टमेंट और मीडिया के अनुसार 1990 में वहां 1 लाख हिन्दू और सिख जनसंख्या थी, जोकि अब 3000 के आसपास है। अब यह समझना कोई कठिन काम नहीं है कि इन तीन दशकों में 97,000 हिन्दुओं और सिख कहाँ चले गए - संभव है कि उन्हें मार दिया गया होगा अथवा उनका जबरन धर्म परिवर्तन हुआ होगा और कुछ भागकर दूसरे देशों - विशेषकर भारत में शरण ले चुके होंगे। अब जब से तालिबान ने वहां की सत्ता को संभाला है तो इन बचे हुए हिन्दू और सिखों की सुरक्षा भी संदिग्ध ही रहेगी।
सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक तौर पर उनकी उम्मीदें भारत से ही है। भारत में भी पिछले कई दशकों से यह सवाल उठता रहा है कि अफगानिस्तान के अल्पसंखक समुदाय के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए ठोस संवैधानिक कदम उठाने चाहिए। पिछली सरकारों ने कुछ राहत दी लेकिन वह कोई स्थाई समाधान नहीं था। वर्ष 2019 में केंद्र सरकार ने 1955 के भारतीय नागरिकता कानून में एक संशोधन पारित कर पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के धार्मिक अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान लागू किया था।
इस कानून में पहले भी नौ बार संशोधनों हो चुके है लेकिन आजतक कभी कोई विरोध नहीं
हुआ। इस दसवें संशोधन को लेकर गलतफहमियां फैलाई गई जिसके चलते देशभर में विरोध-प्रदर्शन किये गए। जबकि इस संशोधन का भारतीय नागरिकों से कोई लेनादेना नहीं था।
अब वास्तव में हमें सोचना होगा कि अफगानिस्तान के गैर-मुसलमानों को किसके भरोसे छोड़ा जाए? वहां तो अब अल्पसंख्यकों का जीवन जीना दूभर हो ही गया है। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर के संगठनों से भी उन्हें कभी राहत नही मिली। रही बात भारत की तो अपना दायित्व निभाते हुए इस देश की संसद ने उन्हें भारतीय नागरिकता देने की पेशकश की है। अतः इसका स्वागत किया जाना चाहिए जिससे कम-से-कम जो भारत में है उन्हें जीवन जीने का हक मिल सके। एकबार जब यह व्यवस्था कायम हो जाएगी तो अफगानिस्तान में गुजर-बसर कर रहे गैर-मुसलमानों में भी हौसला बढेगा कि भारत एक देश है जहां उन्हें उनका पुराना मान-सम्मान वापस मिलता है।
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(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)












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