Shahrukh Khan on Social Media: निगेटिव नैरेटिव वाले किंग खान

सिनेमा में निगेटिव नैरेटिव का खेल खेलने वाले लोग अब सोशल मीडिया के सामने लाचार हैं। कोलकाता में शाहरुख खान ने जनता के सोशल मीडिया को ही निगेटिव नैरेटिव वाला बताया है।

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संसार की समस्या यह नहीं है कि सकारात्मक सोच वाले लोग नहीं है। संसार की समस्या यह है कि नकारात्मक सोच वाले लोग सबसे ज्यादा अपनी सोच को ही सकारात्मक बताते हैं। इससे ही भ्रम पैदा होता है कि आखिर सकारात्मक सोच की पहचान कैसे की जाए? बॉलीवुड के अभिनेता शाहरुख खान ने कोलकाता फिल्म फेस्टिवल में जिस तरह से "सोशल मीडिया की नकारात्मकता" पर प्रहार करते हुए अपने जैसे लोगों की सोच को 'सकारात्मक' घोषित किया है, उससे भी यही भ्रम पैदा हुआ है। क्या सचमुच शाहरुख खान या उनके जैसे बॉलीवुड के अभिनेता, लेखक, संवाद लेखक या फिर निर्माता निर्देशक सकारात्मक सोच वाले लोग हैं?

गुरुवार को शाहरुख खान ने यह बात कोलकाता के जिस फिल्म फेस्टिवल में बोली है, उसका उद्घाटन पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया है। इस फिल्म फेस्टिवल का आयोजन भी पश्चिम बंगाल सरकार के सहयोग से किया गया है। इसलिए उनका यह बोलना और मीडिया के एक वर्ग द्वारा इसको बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित करना, शाहरुख खान के मंतव्य पर सवाल खड़ा करता है। ममता बनर्जी की राजनीतिक विचारधारा क्या है, इसे हर कोई जानता है। सोशल मीडिया पर बीते कुछ समय से बहुसंख्यक समाज की सोच को किस तरह से नकारात्मक सोच घोषित किया जा रहा है, इसे भी हर कोई समझता है।

अगर इन दोनों बातों को मिलाकर उनके कहे की समीक्षा करें तो समझ में आ जाएगा कि शाहरुख खान जैसे अभिनेता सिर्फ स्क्रिप्ट पढ़ने वाले अभिनेता नहीं है। वो सिनेमा के जरिए नैरेटिव का खेल खेलते हैं। यही कारण है कि शाहरुख खान के बयान को कुछ राजनीतिक दलों ने भाजपा के खिलाफ सांकेतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल भी कर लिया।

शाहरुख खान उस बॉलीवुड के किंग खान कहे जाते हैं, जो बॉलीवुड सामान्य सिनेमा से बाहर निकलकर नैरेटिव वार का अखाड़ा बन गया है। यह किंग खान नाम भी उन्हें सिनेमा में निगेटिव नैरेटिव गढ़ने वाले पत्रकारों ने ही दिया वरना आज की डेट में अक्षय कुमार और कार्तिक आर्यन बॉलीवुड के ज्यादा सफल अभिनेता हैं। शाहरुख खान के मुकाबले में इन अभिनेताओं पर लगाया गया पैसा डूबने का रिस्क बहुत कम होता है।

सबसे पहले तो उनकी उस बात की समीक्षा करते हैं जिसमें उन्होंने सोशल मीडिया को निगेटिव नैरेटिव वाला बताया है। यह निगेटिव नैरेटिव क्या होता है? क्या गलत को गलत बताने वाला नैरेटिव निगेटिव हो जाता है? शाहरुख खान हों, सलमान खान हों या आमिर खान। बॉलीवुड में ये फिल्मों में सिर्फ अभिनय नहीं करते। बहुत महीन तरीके से भारत के बहुसंख्यक समाज के खिलाफ निगेटिव नैरेटिव चलाते हैं। सुशांत सिंह राजपूत के निधन के बाद बॉलीवुड में भाई भतीजावाद की जो बहस चली थी, उससे ये साफ हो गया था कि पूरा बॉलीवुड खान कपूर गैंग में परिवर्तित हो चुका है।

एक ओर खान उपनाम वाले लोग हैं जो फिल्मों को हिट फ्लॉप कराने का ठेका लेते हैं तो दूसरी ओर कपूर या पंजाबी लॉबी है जो बॉलीवुड में भीषण भाई भतीजावाद चलाता है। इंडिया टीवी के प्रोग्राम आपकी अदालत में एक बार अभिनेता गोविन्दा ने साफ तौर पर स्वीकार किया था कि कैसे वो लोग पंजाबी लोगों को पहली प्राथमिकता देते हैं। अभिनेता गोविन्दा खुद एक पंजाबी हैं और इंटरव्यू में जिस संजय दत्त को उन्होंने सिफारिश का जिक्र किया था वो भी एक पंजाबी हैं।

मतलब बॉलीवुड में पंजाबी लॉबी इतनी ताकतवर है कि वह गैर पंजाबियों को वहां टिकने नहीं देती है। करण जौहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। कुछ समय पहले उन्होंने कार्तिक आर्यन को अपनी फिल्म दोस्ताना 2 से इसलिए निकाल दिया क्योंकि वो गैर पंजाबी अभिनेता हैं, और तेजी से सुपरस्टार होने की सीढ़ी चढ रहे हैं। करन जौहर भला ऐसे गैर पंजाबी अभिनेता को अपनी फिल्म में क्यों कास्ट करेंगे?

यही चर्चाएं सोशल मीडिया पर होती हैं तो बॉलीवुड में निगेटिव नैरेटिव के मास्टर लोगों को सोशल मीडिया में निगेटिविटी दिखने लगती है। कभी कोई सोनम कपूर कुछ उटपटांग बोल देती है तो कभी कोई करीना कपूर खान कहती है कि मत देखो हमारी फिल्में। कभी दीपिका पादुकोण जेएनयू पहुंचकर बहुसंख्यक समाज के खिलाफ मोर्चा खोल देती है तो अब शाहरुख खान ने बहुत सोच विचार कर एक ऐसे राज्य की मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सोशल मीडिया को निगेटिव नैरेटिव वाला कहा है जिसकी कम्युनल सोच से पूरा देश परिचित है।

असल में बॉलीवुड एक बेलगाम घोड़ा है जिसका काम ही यह रह गया है कि वह भारत के बहुसंख्यक समाज के खिलाफ अघोषित सिनेमाई विद्रोह का बिगुल बजाकर रखे। इसकी शुरुआत आज नहीं हुई। कोई सात दशक पहले से इसकी शुरुआत हो गयी थी जब कम्युनिस्ट पार्टी से नियंत्रित होने वाले फिल्मकारों ने बॉलीवुड को अपना हथियार बनाना शुरु किया। एक दौर था जब प्रगतिशील सिनेमा के नाम पर साम्यवाद और मुस्लिम तुष्टीकरण को हिन्दी सिनेमा की मुख्यधारा बनाने का प्रयास किया गया। ठीक वैसे ही जैसे राजनीति में हुआ।

सिनेमा और राजनीति दोनों ही जगहों पर इस नैरेटिव बिल्डिंग में बंगाल के कॉमरेड लीड कर रहे थे। कम्युनिस्ट संगठन इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशन (इप्टा) के बैनर तले लगभग पूरे बॉलीवुड को समेट लिया गया था। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अस्तित्व में आये 'इप्टा' का एक घोषित उद्देश्य था-'सिनेमा के जरिए समाज में क्रांति।' इस क्रांति के लिए वर्ग संघर्ष जरुरी था और वर्ग संघर्ष के लिए सिनेमा के जरिए भारत में जाति और धर्म को एक समस्या के रूप में सामने रखा गया। ऐसा करते हुए ईसाइयत और इस्लाम को मॉइनॉरिटी के नाम पर विशेष दर्जा दिया गया और उन्हें ऐसे प्रोग्रेसिव रिलीजन या सोसाइटी के रूप में पेश किया गया जो भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं से बेहतर थे।

यह सब कोई एक दिन में नहीं हुआ। इसको होने में पांच सात दशक का समय लगा। इतने समय में बॉलीवुड का नैरेटिव वही मान लिया गया जिसे इप्टा ने सेट कर दिया था। एक दौर था जब बॉलीवुड में अंग्रेजी से ज्यादा शुद्ध अरबी फारसी युक्त उर्दू बोलने वाले को बहुत सम्मान से देखा जाता था। अभिनेता दिलीप कुमार (युसुफ खान) हों या अभिनेता तथा डॉयलॉग राइटर कादर खान। ऐसे लोगों ने बॉलीवुड को उर्दूवुड में तब्दील कर दिया जबकि संस्कृत निष्ठ हिन्दी को कठिन बताकर बॉलीवुड से न केवल विदा कर दिया गया, बल्कि फिल्मों में उसका उपहास उड़ाया गया। यही सोच फिल्मों के जरिए पूरे देश में फैलायी गयी, जिसके खिलाफ अब सोशल मीडिया मुखर है तो इनको सोशल मीडिया ही निगेटिव नजर आ रहा है।

आज से एक दशक पहले अपनी पीआर एजेंसियों के माध्यम से बॉलीवुड के नायक जैसा चाहते वैसा नैरेटिव गढ़ लेते थे। लेकिन सोशल मीडिया के आने के बाद अब जनता का अपना नैरेटिव पैदा हो गया है। वह धर्म, समाज और राष्ट्र के खिलाफ गढ़े गये सिनेमा की सोशल मीडिया पर आलोचना करता है। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर कम्युनल नैरेटिव चलाने वालों को चुनौती देता है। उनकी फिल्मों के बॉयकॉट का आव्हान करता है तो अब इन नैरेटिव मास्टर्स को तकलीफ हो रही है। खुद गलत होकर दूसरों को गलत साबित करने की उनकी मानसिकता इतनी प्रबल है कि आज भी वो अपने सिनेमा संस्कार पर पुनर्विचार करने को तैयार नहीं है। उल्टे जो उनकी आलोचना कर रहा है, उसे ही निगेटिव साबित करने का प्रोपेगंडा रच रहे हैं।

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