Pervez Musharraf: अपनी ही चालबाजियों का शिकार एक अविश्वसनीय जनरल
79 साल के परवेज मुशर्रफ का भारत से सिर्फ यही नाता नहीं था कि वो दिल्ली में पैदा हुए बल्कि उनकी चालबाजियों से जुड़े कई रोचक किस्से भी हैं।

Pervez Musharraf: ये 2001 की बात है, जुलाई के महीने में मुगलों की राजधानी रही आगरा को अटलजी ने मुशर्रफ के साथ बातचीत के लिए चुना था। जनरल मुशर्रफ ने एक शानदार चाल चली और भारत के दिग्गज पत्रकारों को अपने साथ ब्रेकफास्ट पर बुला लिया। जाहिर था, सभी ने सोचा होगा कि अनौपचारिक बातचीत होगी। इस ब्रेकफास्ट मीटिंग में थे शेखर गुप्ता, प्रणय रॉय, दिलीप पडगांवकर, रजत शर्मा, एमजे अकबर, वीर सांघवी, नलिनी सिंह, चंदन मित्रा, प्रभु चावला, मालिनी पार्थसारथी आदि। लेकिन तमाम दिग्गज आज मानते हैं कि उस नाश्ते की मेज पर मुशर्रफ ने वो चालाकी नहीं की होती तो शायद आगरा वार्ता कामयाब हो गई होती। ऐसी कई घटनाएं हैं जो बताती हैं कि मुशर्रफ काफी चालाक प्रशासक थे, जिसका उन्होंने खामियाजा भी कम नहीं भुगता।
मुशर्रफ की वो चालाकी उस दिन ये थी कि बिना भारतीय पत्रकारों या भारत सरकार को बताए वो नाश्ते की मीटिंग उन्होंने पाकिस्तान में लाइव करवा दी। जाहिर है, भारतीय पत्रकारों में ऐसे पत्रकारों की संख्या ज्यादा थी, जो पाकिस्तान को लेकर उतना तल्ख रवैया नहीं रखते थे। दूसरे वो भी भारत सरकार की तरह शायद खुद को मेजबान समझ रहे थे, इसलिए कोई भी बात ऐसी नहीं करना चाहते थे, जो मेहमान राष्ट्रपति को बुरी लगे या पाकिस्तान में गलत संदेश जाए। ये भी सच है कि जनरल मुशर्रफ की चाल को वो सब नहीं भांप पाए और जनरल को बखूबी पता था कि वो उस नाश्ते की मेज पर केवल भारतीय पत्रकारों को सम्बोधित नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूरे पाकिस्तान की जनता उनको देख सुन रही है।
उनका शुरूआती सम्बोधन का सार ही ये था कि भारत सरकार, खासतौर पर सूचना प्रसारण मंत्री सुषमा स्वराज मीडिया को उनकी और अटलजी की बातचीत के मुद्दों में केवल सरहद पार आतंकवाद, परमाणु क्षमता और पाक जेलों में बंद भारतीय सैनिकों की रिहाई ही बता रही हैं, जबकि कोर मुद्दा तो कश्मीर है। उसके बारे में वो बोल ही नहीं रहीं। जनरल ने ये तक कह डाला कि मैं कश्मीर पर बात नहीं करूंगा तो बेहतर होगा कि मैं नाहर वाली हवेली खरीदकर दिल्ली में ही बस जाऊं। उस पर आउटलुक के संपादक विनोद मेहता ने साफ कह डाला, "हम मानते हैं कि कश्मीर हमारे बीच मुख्य मुद्दा है। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता।" एनडीटीवी के प्रणय रॉय ने भी मान लिया कि आपने ठीक कहा कि कश्मीर ही भारत-पाक के बीच मुख्य मुद्दा है और इसको सुलझाए बिना दोनों देशों में दोस्ती नहीं हो सकती।
पूरी भारत सरकार के एजेंडे में कश्मीर मुख्य मुद्दे में था ही नहीं, लेकिन हमारे पत्रकारों ने जाने अनजाने मुशर्रफ के सुर में सुर मिला दिया। पाकिस्तान की जनता में यह सब लाइव देखकर संदेश गया कि मुशर्रफ ने बाजी मार ली। ये अलग बात है कि आडवाणी जी आदि को जब ये पता चला तो वो काफी नाराज हुए और वार्ता नाकामयाब हो गई। यहां तक कि मुशर्रफ को अजमेर की दरगाह की यात्रा भी रद्द कर वापस जाना पड़ा। क्रॉस बॉर्डर टैररिज्म का मुद्दा साझा बयान में शामिल ना करने को लेकर पाकिस्तान अड़ गया और इस तरह साझा बयान भी जारी नहीं हो पाया।
इस वार्ता में ऐसा लग रहा था कि भारतीय मीडिया भी मुशर्रफ की भाषा बोल रही है। प्रणय रॉय ने आतंकवादी या टैररिस्ट शब्द ही इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि उन्हें पाकिस्तान की ही तरह 'मिलिटेंट' कहा और सवाल पूछा कि मिलिटेंट सोल्जर्स से लड़ें तो ठीक हैं, आम आदमी को क्यों मार रहे हैं तो मुशर्रफ ने कहा कि दुनिया भर में आजादी की जंग देख लीजिए, निर्दोषों का खून तो बहता ही है। इस जवाब पर भी किसी ने ऐतराज नहीं जताया। कुल मिलाकर इस वार्ता से पाकिस्तान में ये संदेश गया कि जनरल मुशर्रफ के आगे भारतीय पत्रकारों की बोलती बंद है और उन्होंने दमदारी के साथ कश्मीर का मुद्दा ना केवल उठाया बल्कि भारतीय पत्रकारों को भी अपने तर्कों से सहमत कर लिया।
मुशर्रफ ने एक और चालाकी की। वार्ता विफल हो जाने को लेकर उन्होंने पाक मीडिया से एक नई कहानी बनवाई कि बिल क्लिंटन के हस्तक्षेप से अमेरिका में कई दौर की मीटिंग अटलजी के दामाद रंजन भट्टाचार्य और प्रमोद महाजन के साथ पाक अधिकारियों की हो चुकी थीं। इसमें तय हुआ था कि पाक भारत के खिलाफ आतंकियों को समर्थन बंद कर देगा, बदले में कुछ समय के बाद भारत कश्मीर को स्वायत्त क्षेत्र का दर्जा दे देगा। लेकिन आडवाणी को इस समझौते की खबर लगी तो उन्होंने टांग अड़ा दी। हालांकि कहीं से भी इस फर्जी कहानी को सच साबित करने के सुबूत नहीं मिल पाए। बौखलाए जनरल ने आतंक को फिर शह दी और उसी साल दिसम्बर में भारत की संसद पर हमला हो गया।
जब मुशर्रफ ने अपनी आत्मकथा 'इन द लाइन ऑफ फायर: ए मेमोयर' लिखी, तब जाकर उनके कई झूठ और चालाकियां लोगों के सामने उजागर हुईं। जाहिर है इनमें से ज्यादातर भारत को लेकर थीं, लेकिन ग्लोबल राजनीति से जुड़े लोगों या घटनाओं पर भी उनके ये झूठ चर्चा में रहे। डेनियल पर्ल को लेकर उनका दावा था कि उसे ब्रिटिश एमआई एजेंट ने मारा है, जबकि पेंटागन ने साफ कर दिया कि अल कायदा प्रशिक्षित खालिद शेख मोहम्मद का काम था।
सीआईए को लेकर उन्होंने एक लाइन अपनी आत्मकथा में लिखी थी कि अगर हम आतंक को समर्थन दे रहे हैं तो सीआईए से पूछो कि उसने कितना प्राइज मनी पाकिस्तान सरकार को दिया है? बाद में सीएनएन को दिए एक इंटरव्यू में इन लाइनों से मुकर गए। अपनी आत्मकथा में जनरल ने ये तक चालाकी की कि पाकिस्तान में छपी किताब में कारगिल जंग में मरने वाले पाकिस्तानी सैनिकों की संख्या ही नहीं लिखी। भारत के अंग्रेजी संस्करण में भी नहीं थी, लेकिन भारत में छपे हिंदी संस्करण में ये संख्या 357 लिख दी, जो कि जानबूझकर कम लिखी गई थी ताकि ये साबित कर सके कि भारतीय सैनिक ज्यादा शहीद हुए थे।
मुशर्रफ ने अजीब से तर्कों से इस किताब में ये साबित करने की कोशिश की थी कि कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को ना तो हार मिली है और ना ही कोई बड़ा नुकसान हुआ है। जबकि उनके ही सहयोगी लेफ्टिनेंट कर्नल अली कुली खान खट्टक ने एक इंटरव्यू में ये कहा था कि, कारगिल की हार पाकिस्तान के लिए 1971 की जंग से भी ज्यादा घातक साबित हुई।
इस तरह की चालाकियों और चालबाजियों के आदी थे जनरल मुशर्रफ। कारगिल से लेकर आगरा वार्ता तक, संसद हमले से लेकर कश्मीर पर अपने बयानों तक, उन्होंने जितनी चालबाजियां की, उसके चलते जनरल मुशर्रफ की साख ना केवल भारत में बल्कि अपने ही देश पाकिस्तान में भी गिरती चली गई।
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जनरल मुशर्रफ की इस आत्मकथा ने उस डूबती साख में आखिरी कील का काम किया। पाकिस्तान का युवा भी समझ गया कि जिन बातों को जनरल मुशर्रफ ने बड़ा बनाने की कोशिश की है, वो दरअसल लफ्फाजियां, चालाकियां और झूठ ज्यादा हैं। वरना सामने अटल बिहारी बाजपेयी जैसा सरल व ईमानदार व्यक्तित्व हो और ये व्यक्ति उनके साथ भी फरेब करे, चालबाजी करे और गलत तथ्यों के साथ पाक की जनता को भी झूठ परोसे, ऐसा नेतृत्व पाकिस्तान के लिए हितकर नहीं होगा। यही कारण है कि कुर्सी से हटने के बाद धीरे धीरे जनरल मुशर्रफ पाकिस्तान की राजनीति और जनता दोनों के लिए अप्रासंगिक होते चले गए।
यह भी पढ़ें: Pervez Musharraf: जब भारत के लजीज खाने पर टूट पड़े थे जनरल मुशर्रफ
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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