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Pervez Musharraf: जब भारत के लजीज खाने पर टूट पड़े थे जनरल मुशर्रफ

पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ अमाइलॉइडोसिस बीमारी से जूझ रहे थे। दुबई में उनका 5 फरवरी 2023 को निधन हो गया । मुशर्रफ मार्च 2016 में इलाज कराने के लिए दुबई गए थे।

Pervez Musharraf

पाकिस्तान के पूर्व सैन्य तानाशाह जनरल परवेज मुशर्रफ का दुबई में निधन हो गया है। मुशर्रफ को दिल और उम्र संबंधी दूसरी कई स्वास्थ्य समस्याएं थी। मुशर्रफ ने 1999 में उस वक्त सैन्य तख्तापलट किया जब नवाज शरीफ श्रीलंका में थे। मुशर्रफ 2001 से 2008 तक पाकिस्तान के राष्ट्रपति रहे। मुशर्रफ मार्च 2016 में इलाज कराने के लिए दुबई गए थे, तभी से वह वहीं अपना इलाज करा रहे थे। इसके पहले भी कई बार उनकी मौत की खबर आ चुकी थीं लेकिन तब उनके परिवार ने उन खबरों का खंडन किया था। लंबी बीमारी के दौरान वो कई बार वेंटिलेटर पर भी रहे थे, लेकिन इस बार वो जिंदगी की जंग हार गए। परवेज मुशर्रफ को करगिल की जंग के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाता है। मुशर्रफ के कारगिल के बारे में और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल विहारी वाजपेयी के साथ हुए कुछ किस्सों को आज हम आपको बताएंगे।

कारगिल युद्ध के पीछे मुशर्रफ का हाथ

कारगिल की लड़ाई का पूरा खाका मुशर्रफ ने ही तैयार किया था। खुद पाकिस्तान सरकार इसके बहुत से पहलुओं से अनभिज्ञ थी। शुरुआत में तत्कालीन पीएम नवाज शरीफ और उनकी कैबिनेट तक को लड़ाई के प्लान की भनक नहीं लगी थी। यहां तक की पाकिस्तानी वायु सेना और नौसेना को मुशर्रफ की 'जंग' के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी।

कारगिल की लड़ाई में भारतीय सेना के प्रमुख रहे वेद प्रकाश मलिक ने अपनी किताब 'फ्रॉम सरप्राइज टू विक्टरी' के चेप्टर 'द डार्क विंटर' में ऐसे कई खुलासे किए हैं। उन्होंने लिखा कि कारगिल की लड़ाई में पाकिस्तानी फौज के जनरल परवेज मुशर्रफ के धोखे को समझने वाला कोई नहीं था। भारतीय एजेंसी, रिसर्च एंड एनॉलिसिस विंग (रॉ) ने इस लड़ाई के दौरान पाकिस्तान में कई फोन कॉल इंटरसेप्ट की थी। परवेज मुशर्रफ और उनके विश्वासपात्र ले. जन. मोहम्मद अजीज खान के बीच जो कुछ बातचीत हुई, रॉ ने उसे भी इंटरसेप्ट किया।

पाक के कई नेताओं और सैन्य अधिकारियों ने मानी गलती

पाकिस्तान की भूतपूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टों ने 'द न्यूज़' को 22 जुलाई, 1999 को बताया था कि पाकिस्तान के इतिहास में कारगिल सबसे बड़ी गलती थी। पूरा अभियान पाकिस्तान को महंगा पड़ा। इससे भारतीयों में यह भावना घर कर गयी है कि पाकिस्तान ने उसके साथ विश्वासघात किया है और इस क्षेत्र में शांति प्रक्रिया के दौरान पाकिस्तान नेतृत्व ने धोखा दिया। पाकिस्तान के भूतपूर्व वायुसेना प्रमुख, एयर मार्शल नूरखान ने भी 'द न्यूज़' को बताया, "इस अभियान को उचित ठहराने का कोई तर्क नहीं है। पाकिस्तान 1947 से ऐसी गलतियां करता रहा है और अपनी गलतियों से हमने कोई सबक नहीं लिया, जिसे हमारे शासक करते आये है। वहीं कारगिल की लड़ाई खत्म होने के कई साल बाद नवाज शरीफ ने सार्वजनिक तौर पर यह बात स्वीकार की थी कि परवेज मुशर्रफ को सेना की कमांड सौंपना, उनकी सबसे बड़ी गलती थी।

सार्क सम्मेलन में अटल-मुशर्रफ की मुलाकात

4 से 6 जनवरी 2002 को नेपाल की राजधानी काठमांडू में 11वें सार्क सम्‍मेलन का आयोजन हुआ था। इस सम्‍मेलन का आयोजन भारत की संसद पर हमले, कारगिल की जंग और एतिहासिक आगरा सम्‍मेलन के बाद हो रहा था। मुशर्रफ इस सम्‍मेलन में हिस्‍सा लेने पहुंचे थे। मुशर्रफ ने अपने भाषण में कहा कि उनका देश भारत के साथ सभी मसलों को शांतिपूर्ण तरीके से हल करना चाहता है। इसके बाद उन्‍होंने ऐलान किया कि वह इस सम्‍मेलन के जरिए भारत के प्रधानमंत्री वाजपेयी के सामने दोस्‍ती का हाथ बढ़ाते हैं। इसके बाद उन्होंने हाथ भी मिलाया। पर जब अटल जी ने सम्मेलन में बोला तो मुशर्रफ ताकते ही रह गए। उस दौरान अटल जी ने कहा था कि 'मैंने मुशर्रफ को आगरा बुलाया था और उन्‍होंने हमें जम्‍मू कश्‍मीर में आतंकी हमले के साथ ही साथ संसद पर हमले का तोहफा दिया था।'

जब अडवाणी पर फोड़ा था आगरा समझौते का ठीकरा

मई 2001 में आडवाणी जी के कहने पर अटल बिहारी वाजपेयी ने जनरल परवेज मुशर्रफ को भारत आकर वार्ता करने के लिए आमंत्रित किया था। 5 साल बाद 2006 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपनी आत्‍मकथा 'इन द लाइन ऑफ फायर' में इस यात्रा का जिक्र किया था। किताब में लिखा था कि 'रात करीब 11 बजे भारतीय प्रधानमंत्री वाजपेयी से मुलाकात हुई। माहौल गंभीर था। मैंने उन्‍हें दो टूक शब्‍दों में कह दिया कि ऐसा लगता है कि कोई ऐसा शख्‍स है जो हम दोनों के भी ऊपर है और जिसके आगे हम दोनों की ही नहीं चली। इस पर आडवाणी ने माई कंट्री माई लाइफ में ल‍िखा है कि जनरल ने मेरा नाम तो नहीं लिया था लेकिन उनका इशारा मेरी ही तरफ था। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी ने भी 2006 में एक प्रेस नोट जारी करके मुशर्रफ के इस बयान को सरासर झूठा बताया और कहा कि उनका अड़‍ियल रवैया, कश्‍मीर में आतंकवाद को आजादी की लड़ाई साबित करने की कोशिश ही आगरा समझौते को विफल करने में अहम साबित हुई।

जब खाने पर टूट पड़े थे मुशर्रफ
ये किस्सा 2001 का है। तब आगरा की बैठक से पहले दिल्ली में अटल जी ने एक डिनर का आयोजन किया था। इसमें मुंबई के ताज होटल के निदेशक शेफ हेमंत ओबराय को खास तौर से बुलाया गया था। उनके मार्गदर्शन में ही सारे व्यंजन तैयार हुए। जैसे ही रात्रि भोज शुरू हुआ तो मुशर्रफ खास तौर से तैयार इन व्यंजनों को छोड़ शाकाहारी खाना ही खा रहे थे। तब अटल जी ने मुशर्रफ से पूछा कि वे निरामिष व्यंजन क्यों चख रहे हैं? मुशर्रफ ने जवाब दिया कि ये शायद मांस हलाल नहीं है। अटल जी ने तुरंत हेमंत ओबराय को अपने पास बुलाकर सारी स्थिति स्पष्ट कर ली। गोश्त हलाल था। उसके बाद मुशर्रफ लजीज मांसाहार व्यंजन पर टूट पड़े थे। ये जानकारी खुद हेमंत ओबराय ने एक इंटरव्यू में बताई थी।

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