Pakistan Elections: जम्हूरियत के नाम पर जमूरियत का प्रदर्शन

Pakistan Elections: अरबी के शब्द जम्हूरिया का अर्थ होता है भीड़। लेकिन इसी जम्हूरिया को इस्लामिक देशों ने डेमोक्रेसी या रिपब्लिक के रूप में परिभाषित कर लिया है। हालांकि इसका सटीक अर्थ होगा भीड़तंत्र।

इस्लाम में डेेमोक्रेसी या लोकतंत्र की कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी बीसवीं सदी में मजबूरन जिन इस्लामिक देशों ने अपने आपको रिपब्लिक या डेमोक्रेसी घोषित किया उन्होंने वहां लोकतंत्र लाने की कोशिश जरूर की लेकिन अंतत: वहां लोकतंत्र की बजाय जम्हूरियत या भीड़तंत्र ही आया है। पाकिस्तान इन्हीं में से एक है।

Pakistan Elections

पिछले महीने 8 फरवरी को पाकिस्तान की नेशनल एसेम्बली का एक और आम चुनाव हुआ। हर बार की तरह इस चुनाव को पर्दे के पीछे से पाक फौज ने संचालित किया। इस समय पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिफ मुनीर की इमरान खान से गहरी दुश्मनी है इसलिए चुनाव से पहले न केवल उनको 21 साल की सजा दिलवा दी गयी बल्कि उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक ए इन्साफ (पीटीआई) की मान्यता भी रद्द करवा दी गयी।

इमरान खान पर भ्रष्टाचार का आरोप भी है और फौज पर हमले का आरोप भी। सत्ता के लालच में जल्द चुनाव कराने को बेताब इमरान खान पिछले साल रैलियां निकालकर पाकिस्तान के एस्टेब्लिशमेंट (सत्ता पर नियंत्रण रखने वालों) पर दबाव बना रहे थे कि जल्द से जल्द चुनाव घोषित हो जाएं। लेकिन एस्टेब्लिशमेंट, जो मुख्यरूप से फौज ही है, वह इमरान खान को एक बार फिर पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनते हुए नहीं देखना चाहती थी। इसलिए नवाज शरीफ लंदन से बुलाये गये। उनको जमानत दिलवाई गयी ताकि वो चुनावी मैदान में उतरकर इमरान खान का पत्ता साफ कर सकें।

सारा मैदान साफ होने के बाद भी नवाज शरीफ ऐसा करने में सफल नहीं हो सके। जिस पीटीआई की मान्यता ही रद्द कर दी गयी थी उस पार्टी के कार्यकर्ता निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मैदान में उतर गये। मतदान के अगले दिन 9 फरवरी को मतगणना शुरु होनी थी। लेकिन शुरु हुई 10 फरवरी को।

इस बीच फौज ने अपने 'अधूरे' काम पूरे किये। फौज पर चुनाव में धांधली करने, खुद ठप्पा मारकर बैलट बॉक्स भरने का आरोप तो लगा ही था। इस देरी के बाद आरोप लगा कि नवाज शरीफ की पार्टी को विजेता बनाने के लिए फौज द्वारा 'मतपेटियां भी बदल गयीं।'

आखिरकार रिजल्ट आया तो वह चुनाव से भी ज्यादा पेचीदा था। 266 सीटों में 93 निर्दलीय जीत गये थे। ये निर्दलीय कोई और नहीं बल्कि उसी पीटीआई के वर्कर बताये गये थे जिन्होंने पार्टी सिंबल की बजाय निर्दलीय मैदान में उतरने का फैसला किया था। जिस नवाज शरीफ को फौज का 'संपूर्ण समर्थन' था, उनकी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज 75 सीटों पर अटक गयी और आसिफ अली जरदारी की पीपीपी 54 सीटों पर जीत के साथ तीसरी बड़ी पार्टी बन गयी।

अब संकट यह खड़ा हुआ कि सरकार कौन बनायेगा? निर्दलियों की कोई सरकार नहीं होती। प्रेसिडेन्ट के सामने आखिरकार किसी न किसी पार्टी को ही अपनी सरकार बनाने का दावा पेश करना होता है। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी पीटीआई अपना दावा पेश ही नहीं कर सकती थी क्योंकि पाकिस्तान चुनाव आयोग उसकी मान्यता ही खत्म कर चुका है। नवाज शरीफ और आसिफ अली जरदारी एक बार फिर साथ आना चाहें तो पहले साथ रहने के दोनों के अनुभव बहुत खट्टे थे।

लेकिन अभी नवाज शरीफ और जरदारी की पार्टियों की एक तकनीकी जीत होना बाकी था। पाकिस्तान में यह नियम है कि नेशनल एसेम्बली में राजनीतिक दल अपनी कुल सीटों का 33 प्रतिशत महिला और कुछ मॉइनारिटी मनोनीत करते हैं। इस लिहाज से शरीफ की पार्टी के हिस्से में 19 महिला और 4 मॉइनारिटी मेम्बर आये। इमरान खान के निर्दलीय समर्थक ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि उनके पास किसी पार्टी का सिम्बल नहीं था। अत: महिलाओं और माइनॉरिटी को मनोनीत करने के बाद अब नवाज शरीफ की पार्टी के 98 मेम्बर हो गये तथा जरदारी की पार्टी में 68 मेम्बर।

अब नवाज शरीफ की पार्टी पाकिस्तान इलेक्शन की सबसे पार्टी बन गयी थी और इस तरह 3 मार्च को पाकिस्तान की 336 सीटों वाली (चुने गये और मनोनीत मिलाकर) नेशनल असेम्बली में 201 वोटों के समर्थन के साथ शाहबाज शरीफ दूसरी बार प्रधानमंत्री घोषित हो गये। 2024 के नेशनल इलेक्शन में वो पाकिस्तान के 24वें प्रधानमंत्री हैं। मियां नवाज शरीफ जो प्रधानमंत्री बनने के लिए ही लंदन से वापस लौटे थे, अब फिर शायद छोटे भाई शाहबाज के कंधों पर इस्लामिक जम्हूरियत अर्थात इस्लामिक भीड़तंत्र का जिम्मा लादकर लंदन लौट जाएं।

पाकिस्तान में हुए आमचुनाव का यह संक्षिप्त विवरण यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किसी इस्लामिक देश में डेमोक्रेसी कितना कठिन रास्ता होता है। इस्लामिक देशों में एक तो लोकतंत्र होता नहीं और अगर होता है तो पाकिस्तान की तरह जम्हूरियत के नाम पर जमूरियत का ही प्रदर्शन किया जाता है।

याद करिए बांग्लादेश को जहां इसी साल 7 जनवरी को जनरल इलेक्शन हुए थे। वहां फौज का वैसा दखल तो नहीं होता जैसा पाकिस्तान में होता है लेकिन चुनाव एकतरफा ही होते हैं। शेख हसीना के सामने मुख्य विपक्षी पार्टी की नेता खालिदा जिया ने मैदान खाली छोड़ दिया है। उनकी पार्टी चुनाव मैदान में ही नहीं उतरती। इसलिए जब चुनाव होते हैं शेख हसीना की अवामी लीग एकतरफा विजेता हो जाती है।

भारत से अलग देश बनने के बाद बीते 75 साल में पाकिस्तान ने सिद्धांत रूप में लोकतंत्र से दूर जाने का प्रयास किया है लेकिन व्यवहार रूप में इसे पूरी तरह छोड़ नहीं पा रहा है। बीच बीच में फौजी जनरल का टेकओवर इसी बात का लक्षण है कि अवाम क्रमश: उस ओर जा रही है जहां अफगानिस्तान पहुंच चुका है।

इस्लामिक शरीयत के मुताबिक अमीर का शासन स्थापित करने का वैचारिक माहौल पाकिस्तान के मुल्ला मौलवी तैयार कर रहे हैं। बहुत हद तक वो इसमें कामयाब भी हैं। इसलिए वह दिन दूर नहीं जब कोई मुल्ला उमर या इस्लामिक शूरा पाकिस्तान पर भी हावी हो जाए और जम्हूरियत के नाम पर जारी जमूरियत को उखाड़कर हमेशा के लिए फेंक दे।

इसमें अगर कोई सबसे बड़ी बाधा है तो वह है वह वैश्विक आर्थिक संस्थाएं जो पाकिस्तान में 25 करोड़ लोगों के बाजार को खोना नहीं चाहती हैं। उन्हें उम्मीद है कि अगर सेकुलर वैल्यू रखनेवाला व्यक्ति पाकिस्तान चलायेगा तो मुल्ला मौलवी द्वारा बनाया गया इस्लामिक निजाम का माहौल थंडा पड़ जाएगा।

शाहबाज शरीफ हों या आसिफ अली जरदारी। इन पर दांव लगाकर फौज भी पाकिस्तान को पूरी तरह से इस्लामिक स्टेट में तब्दील हो जाने से ही बचाने का प्रयास कर रहा है। कम से कम ये दोनों इमरान खान की तरह हाथ में तस्बी (माला) लेकर किसी अमेरिकी राष्ट्रपति पर जादू टोना करने का प्रयास तो नहीं ही करेंगे।

पाकिस्तान के लिए फिलहाल वही सेकुलर वैल्यू वाला शासन है कि प्रधानमंत्री सूरा फातिहा पढ़कर अपने भाषण की शुरुआत न करे या फिर जिसके घर में बीवी के रूप में कोई जादूगरनी न बैठी हो। फिलहाल इन चुनावों में बड़ी मुश्किल से फौज इतना ही हासिल करने में सफल रही है। लेकिन कब तक? अगर अफगानिस्तान हो जाना ही पाकिस्तान की नियति हो तो कोई अमेरिका, यूरोप, आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक या फौज उसे कब तक रोककर रख पायेगें?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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