OPS vs NPS: कर्मचारियों को पेंशन, सरकारों को टेंशन

नई पेंशन स्कीम और ओल्ड पेंशन स्कीम को लेकर देश में फिर चर्चा है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ सरकारों द्वारा अपने राज्य में पुरानी पेंशन स्कीम लागू करने की घोषणा के बाद अन्य राज्यों में OPS फिर से बहाल करने की मांग उठने लगी है।

OPS vs NPS demand of old pension scheme create panic for state govts

OPS vs NPS: राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकारों द्वारा पुरानी पेंशन स्कीम बहाल किये जाने के बाद अवकाश प्राप्त कर्मचारियों की मांग पर हरियाणा सरकार ने भी पुरानी पेंशन स्कीम पर सलाह मशविरा शुरू करने का आश्वासन दिया है। इस बीच जिन राज्यों ने पुरानी पेंशन योजना फिर से बहाल की है, उन्होंने केंद्र से नई स्कीम में जमा राशि वापस करने की मांग करते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाने तक की बात कही है। जबकि केन्द्र सरकार राज्यों को एनपीएस के तहत जमा राशि वापस न करने का दो टूक जवाब दे चुकी है।

मालूम हो कि पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) के तहत सेवानिवृत्त कर्मचारियों को मासिक पेंशन के रूप में उनके अंतिम वेतन का 50% और महंगाई भत्ता दिया जाता है, जबकि नई पेंशन योजना (एनपीएस) के तहत कर्मचारियों को हर महीने अपने वेतन का 14% अंशदान करना होता है, जो सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारियों को पेंशन के रूप में दी जाती है। एनपीएस ट्रस्टी के अनुसार दिसंबर 2022 तक राज्य सरकारों के 59.78 लाख कर्मचारी एनपीएस अपना चुके थे, और उनकी कुल परिसंपत्ति 4.27 लाख करोड़ रूपए थी। तत्कालीन सरकार ने वित्त वर्ष 2003 के बजट में एनपीएस लागू करने की घोषणा की थी। बावजूद इसे अपनाना या नहीं अपनाना राज्यों की मर्जी पर छोड़ दिया गया था। केंद्र सरकार की तरफ से मामले में कोई जबरदस्ती नहीं की गई थी। 2005 तक 27 राज्यों ने एनपीएस की नीति को अपना लिया था। हालांकि तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने इस योजना को अभी तक अपने यहां लागू नहीं किया है।

वर्ष 1990 से पहले अधिकांश प्रदेशों में पुरानी पेंशन व्यवस्था प्रचलित थी लेकिन सरकारों की बढ़ती देनदारियों और आबादी की औसत आय में बढ़ोतरी के कारण सरकारों को ओपीएस को अपने यहां ज्यादा समय तक चलाने में मुश्किलें आने लगी और अर्थशास्त्री भी सलाह देने लगे थे कि इसे बंद करके कोई दूसरी योजना लागू की जाए ताकि सरकार वित्तीय रूप से अनुशासित रहे।

विश्व बैंक का भी मानना है कि ओपीएस के ज्यादा खर्चीला होने की वजह से इसे चलाना मुमकिन नहीं है क्योंकि इससे केंद्र और राज्य सरकारों की देनदारियों में वृद्धि हो जाएगी। इसके लिए उन्हें बाजार से बहुत ज्यादा उधारी लेनी पड़ेगी। भारत युवा देश है। जब यहां की आबादी की उम्र बढ़ेगी तो सरकार की देनदारियों में अकूत बढ़ोतरी होगी। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक भारत की आबादी 165 करोड़ होगी और इनमें से 60 साल वाले लोगों की तादाद 32 करोड़ से अधिक होगी। बुजुर्गों की बड़ी संख्या होने की वजह से ओपीएस पर सरकार को बहुत ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार वित्त वर्ष 2022-23 के बजट अनुमानों के अनुसार राज्यों का पेंशन वित्त वर्ष 2022-23 में 16% की वृद्धि के साथ 4,63,436 करोड रुपए हो जाएगा जबकि पिछले वर्ष यह 3,99,813 करोड रुपए था।

ब्याज भुगतान, वेतन और पेंशन भुगतान को प्रतिबद्ध व्यय माना जाता है क्योंकि इन मदों में हर महीने खर्च होना निश्चित है। इन मदों में वित्त वर्ष 2021 तक औसतन 56% व्यय राज्यों के राजस्व से किया जा रहा था। इस वित्त वर्ष में राज्यों की औसत राजस्व प्राप्ति 100% थी, लेकिन व्यय 125% थी। कुछ राज्यों जैसे पंजाब का खर्च कमाई से 80% अधिक था जबकि केरल का खर्च उसकी कमाई से लगभग 74% अधिक, पश्चिम बंगाल का खर्च उसकी कमाई से 74% और आंध्र प्रदेश का 73% से अधिक था। अगर खर्च की तुलना कुल प्राप्त राजस्व को प्रतिशत के रूप में करें तो इन चार राज्यों में उनकी कमाई से खर्च 149% से भी अधिक पहुंच गया था।

सेवानिवृत्त कर्मचारी को कार्यरत कर्मचारी की तरह लगातार महंगाई भत्ता में बढ़ोतरी की सुविधा भी मिलती है। नई स्कीम के तहत पेंशन की रकम सरकार की जिम्मेदारी ना होकर बाजार जोखिमों के अधीन कर दी गई है। पुरानी पेंशन योजना से पूरे परिवार के हितों की गारंटी मिलती थी, जैसे पति की मृत्यु के बाद उसकी विधवा को आजीवन इसका लाभ मिलना तय है। पेंशन के लिए वेतन से कोई कटौती नहीं होती। इसका भुगतान सरकार की ट्रेजरी के जरिए किया जाता है। रिटायरमेंट के बाद 20 लाख रुपए तक की ग्रेच्युटी मिलती है। यहां तक कि पेंशन को टैक्स के झंझट से भी मुक्त रखा गया है।

वही जिंदगी के साथ और जिंदगी के बाद की सुरक्षा के नाम पर जो नई पेंशन योजना लाई गई वह पूर्णतया शेयर बाजार पर आधारित है। बाजार की चाल के आधार पर ही इसका भुगतान होता है। बाजार से मिलने वाले रिटर्न की कोई गारंटी नहीं होती। इसका अर्थ बेहद स्पष्ट है कि जैसे बाजार जोखिम के अधीन होता है वैसे ही कार्मिकों की पूरी जिंदगी कमाई के जोखिम में डाल दी गई है। अब रिटायरमेंट पर शेयर बाजार के आधार पर जो पैसा मिलेगा उस पर टैक्स देना पड़ेगा। पुरानी पेंशन योजना में रिटायरमेंट के समय पेंशन की प्राप्ति के लिए जीपीएफ से कोई निवेश नहीं करना पड़ता, लेकिन अब रिटायरमेंट पर पेंशन प्राप्ति के लिए एनपीएस फंड में 40% पैसा इन्वेस्ट करना होता है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कींस का भी मानना था कि सुव्यवस्थित विकास के लिए बाजार का चलना जरूरी होता है, और बाजार तभी चलता है जब जनता की जेब में पैसे होते हैं। जनता की क्रय शक्ति बढ़ाने का काम सार्वजनिक यानी कि सरकार द्वारा किए जाने वाले निवेश के जरिए ही किया जा सकता है। आठवीं शताब्दी के शुक्र नीति में भी राजसत्ता के द्वारा नियुक्त कर्मचारियों के बारे में 26 निर्देश दिए गए हैं, जिनमें उनके काम के घंटे, साप्ताहिक अवकाश, हर वर्ष 15 दिन की छुट्टी आदि के साथ लिखा गया है कि जिस सेवक ने 40 वर्ष काम किया हो उसके बाद वह जब तक जीवित रहता है तब तक बिना काम किए उसे आधा वेतन दिया जाना चाहिए। चाणक्य के "अर्थशास्त्र" से लेकर मैक्यावली के "द प्रिंस" तक में इस तरह के इंतजामों की ओर संकेत हैं।

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    बहरहाल यह मुद्दा राजनीति से ज्यादा आर्थिक और सामाजिक है। सरकारी कर्मचारी 30-40 साल तक अपनी सेवाएं देने के बाद अवकाश प्राप्त करता है तो जीवन के संध्याकाल में सम्मानजनक जीवन जीने के लिए पेंशन बड़ा संबल होती है। ब्रिटिश काल से ही यह योजना चलन में है। लेकिन 2004 में तत्कालीन अटल सरकार ने सरकारी खजाने पर ज्यादा बोझ का कारण गिनाते हुए पेंशन की योजना में कुछ बदलाव कर दिया था। लिहाजा हितग्राही को बनिस्बत कम पेंशन मिलने लगी थी। ऐसे में सेवानिवृत्त कर्मचारियों में रोष व्याप्त होता गया और आज की तारीख में यह मुद्दा इस कदर गरमा गया है कि ओपीएस पर नए सिरे से विचार करने की नौबत आ गई है। आगामी चुनावी बेला में एनपीएस बनाम ओपीएस का मुद्दा क्या रूप लेता है, देखना दिलचस्प होगा।

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    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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