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Odisha Day: उत्कृष्ट कला के उत्कल प्रदेश को कितना जानते हैं हम?

अप्रैल की पहली तारीख को उत्कल दिवस मनाया जाता है। उत्कल प्रांत कहते हैं ओडिशा को। यह भगवान जगन्नाथ की भूमि है। क्षेत्रफल की दृष्टि से यह भारत का आठवां और जनसंख्या में ग्यारहवां सबसे बड़ा राज्य है।

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Odisha Day: ओडिशा की अरण्यक संस्कृति और कला अद्वितीय है। ओडिशा नाम संस्कृत के 'ओड्र' शब्द से उत्पन्न हुआ है। भागीरथ वंश के राजा थे 'ओड', उन्होंने अपने नाम के आधार पर नवीन ओड-वंश व ओड्र राज्य की स्थापना की थी। कालान्तर में तीसरी सदी ई०पू० से ओड्र राज्य पर महामेघवाहन वंश, माठर वंश, नल वंश, विग्रह एवं मुदगल वंश, शैलोदभव वंश, भौमकर वंश, नन्दोद्भव वंश, सोम वंश, गंग वंश व सूर्य वंश आदि का भी शासन रहा।

प्राचीन समय में ओडिशा राज्य का बड़ा भाग कलिंग कहा जाता था। जहां 232 ई०पू० सम्राट अशोक की मृत्यु के बाद कुछ समय तक मौर्य साम्राज्य रहा, जब वहां बौद्ध सम्प्रदाय को विस्तार मिला। उसके बाद 185 ई०पू० से कलिंग पर चेदि वंश का राज हो गया था। ईस्वी सन 49 में चेदि वंश के तृतीय शासक राजा खारवेल ने अपने शासनकाल में जैन धर्म को विस्तार दिया। ओडिशा की उदयगिरि व खण्डगिरि गुफाएं उसका उदाहरण हैं।

सम्राट अशोक ने अपने शासनकाल में कला के माध्यम से संस्कृतिक, धार्मिक चेतना का विस्तार करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर शिलालेख गुदवाये। ओडिशा की धौली व जगोदा गुफाओं में धार्मिक सिद्धान्त उकेरे गए। इसी काल में ललितगिरि, रत्नागिरि, उदयगिरि, लगुण्डी में अवलोकितेश्वर और बोधिसत्व की मूर्तियों का बड़ी संख्या में निर्माण किया गया।

सन् 647 ईस्वी में उत्कल में भूआम काल का आरम्भ होता है। भुआमाओं ने ही बौद्ध सम्प्रदाय को आश्रय दिया। इस वंश की कुछ प्रसिद्ध महिला शासक भी रहीं। उनमें त्रिभुवन महादेवी और दण्डी महादेवी का नाम उल्लेखनीय है। मध्यकाल के आरंभ से पूर्व ही यहां कुछ स्वतंत्र राज्य क्षेत्र भी उपजे, जिन्हें मण्डल कहा गया। कलिंग राज्य में छठी-सातवीं शताब्दी को 'स्थापत्य कला' के उत्कृष्टता का काल कहा जा सकता है। इस काल में विभिन्न राजाओं ने वहाँ अद्वितीय मन्दिरों का निर्माण कराया। छठी सदी में निर्मित स्वर्णाजलेश्वर, रामेश्वर, लक्ष्मणेश्वर, भरतेश्वर व शत्रुघनेश्वर मन्दिर और सातवीं सदी में बना परशुरामेश्वर इनमें विशेष उल्लेखनीय हैं।

इसके बाद मध्यकाल के शुरुआत में ओडिशा में भगवान जगन्नाथ के मुक्तेश्वर, सिद्धेश्वर, वरूणेश्वर, केदारेश्वर, वेताल, सिसरेश्वर, मारकण्डेश्वर, बराही व खिच्चाकेश्वरी आदि कुल 38 मन्दिरों का निर्माण हुआ। यह काल मन्दिर स्थापत्य निर्माण का वह काल था जब कलिंग के इतिहास को गौरवशाली बनाने के लिए कार्य किया गया। सन् 931 ई. में कलिंग के सोमवंशी राजा महाशिवगुप्त ययाति द्वितीय की महात्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत इन सभी मंदिरों का निर्माण हुआ। उत्कल कला के उत्कृष्ट उदाहरण वहां के सुन्दर मन्दिर निर्माण की परंपरा यहीं नहीं रुकी। 11वीं शती में गंगवंश की वापसी हुई।

राजा चोडगंग देव वैष्णव मत के परम भक्त थे, जिन्होंने पुरी का जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण कराना आरंभ किया। इस राजा के काल में ही वैष्णव संत रामानुजाचार्य ने ओडिशा भ्रमण किया। गंगवंश के राजा ने सुप्रसिद्ध लिंगराज मन्दिर, राजारानी मन्दिर, ब्रह्मेश्वर मन्दिर, लोकनाथ और गुन्डिचा मन्दिर सहित विभिन्न सुन्दर मन्दिरों का निर्माण कराया। गंग वंश ने तीन शताब्दियों तक कलिंग पर राज्य किया। सन् 1211 ईस्वी में 'अनंग भीमदेव तृतीय' राजा बने, जिन्होंने ही नए जगन्नाथ मंदिर, पुरी का निर्माण कार्य सम्पन्न कराया था। राजा अनंग ने अभिनव 'वाराणसी कटक' नामक एक नयी नगरी बसाई। जो कई वर्षों तक उत्कल की राजधानी रही। यह वर्तमान का कटक नगर है।

जगन्नाथ पुरी के इतिहास के सम्बंध में 'मदल पंजी' (Palm-leaf Chronicles) का विशेष महत्व है। इसमें भगवान जगन्नाथ और जगन्नाथ मंदिर से सम्बन्धित घटनाओं का वर्णन है। अनुमानित है कि यह पंजी 13वीं या 14वीं शती में आरम्भ हुई होगी। यह पुस्तक साहित्यिक दृष्टि से भी अनूठी है। सन् 1238 ईस्वी में अनंग भीम देव तृतीय की मृत्यु के बाद उसके पुत्र नृसिंह देव ने अपने शासनकाल में कोणार्क का प्रसिद्ध सूर्य मन्दिर बनवाया। गंगवंश के राजकाल में 12वीं-13वीं शती में भास्करेश्वर, मेघेश्वर, यमेश्वर, कोटी तीर्थेश्वर, सारी देउल, अनन्त वासुदेव, चित्रकर्णी, निआली माधव, सोभनेश्वर, दक्क्षा-प्रजापति, सोमनाथ, जगन्नाथ, सूर्य (काष्ठ मन्दिर) बिराजा आदि मन्दिरों को निर्मित करवाया। ये सभी कलिंग के स्थापत्य इतिहास में महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।

गंग वंश के शासन काल के बाद सन् 1361 ई० में फिरोजशाह तुगलक के शासन के साथ तुगलक वंश का आधिपत्य हो गया। तुगलक शासक कला विरोधी रहे। अतः इस शासन काल में उत्कल की कला के विकास और विस्तार पर विराम लग गया।
ओडिशा कला के साथ-साथ व्यापार का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र था। यहां के उत्कृष्ट उत्पादों के व्यापारियों ने सुदूर व्यापार को बढ़ाया था। यही कारण था कि ओडिशा ने यूरोपीय व्यापारियों को अपनी ओर आकर्षित किया था। ओडिशा के आर्थिक सामर्थ्य को पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों, डच और अंग्रेज़ों ने भी अन्तरराष्ट्रीय बाज़ारों में बख़ूबी समझा था। ईस्ट इंडिया कंपनी ने ओडिशा के बालेश्वर और हरिहरपुर में व्यापार केंद्र बनाये। हालांकि वे पुरी के समुद्रतट को अपना बड़ा बन्दरगाह बना पाने में असफल रहे। उसका बड़ा कारण उस क्षेत्र में उनके जहाजों का बार - बार मार्ग भटक जाना रहा। इसके पीछे पुरी के जगन्नाथ मंदिर के मजबूत मैग्नेटिक फील्ड को कारक माना जाता है। जिसके कारण जहाज के दिशा सूचक यंत्र में गडबड़ी हो जाती है।

पुरी क्षेत्र का स्थापत्य कला के साथ वास्तु रहस्य और मूर्ति रहस्य में भी विशेष महत्व है। उत्कल की समृद्ध कला - साहित्य विरासत पर ध्यान नहीं दिए जाने और लगातार होते रहे विदेशी अतिक्रमण के बाद कंपनी शासन की असफलता से, 1865 में ओडिशा में भयंकर दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा। जिसमें वहां के लगभग दस लाख लोग मारे गये। भारी लापरवाही, प्रशासन का दुर्व्यवहार, संचार की कमी और अपर्याप्त ध्यान से ओडिशा के हरेक तीन में से एक वासी मृत्यु को प्राप्त हुआ।

इसके साथ ही ओडिशा प्रांत के लोगों में नई जागृति आई। स्थानीय लोगों ने पहल करके कटक प्रिंटिंग प्रेस की स्थापना की। यहां से प्रथम समाचार पत्र उत्कल दीपिका प्रकाशित हुआ। इस शताब्दी के अंतिम दौर में, लोगों में नयी जागरुकता दिखाई देने लगी थी। यह समय आधुनिक शिक्षा, मध्यम-वर्गीय समाज की बुद्धिमता के उत्थान का दौर था। जहां अनेक साहित्य, राजनीतिक, प्रबुद्ध वर्ग के संगठन सशक्त हो रहे थे। साथ ही उत्कल के लोग प्रशासन में प्रभावी भागीदारी निभाने की शुरुआत कर चुके थे। तब तक ओडिशा, ब्रिटिश कंपनी शासन के समय बंगाल प्रेसीडेंसी का ही एक भाग था।

लंबे संघर्ष के बाद 1 अप्रैल 1936 को ओडिशा राज्य का स्वतंत्र उद्भव हुआ। यह संघर्ष भाषा, संस्कृति व परंपराओं पर आधारित रहा। अंततः 1 अप्रैल 1936 को बंगाल और बिहार प्रांत से अलग राज्य के रूप में ओडिशा का अस्तित्व बन गया।

वर्ष 2023 की ओडिशा दिवस की थीम है- "उड़िया संस्कृति और विरासत का उत्सव"। उत्कल का अर्थ ही होता है 'उत्कृष्ट कला'। इस वर्ष ओडिशा दिवस की थीम ओडिया भाषा, संस्कृति, कला, नृत्य और साहित्य के बारे में जागरूकता फ़ैलाने और प्रोत्साहित करने के लिए है। वास्तुकला, मूर्तिकला, विज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में ओडिशा के योगदान को रेखांकित करना इस थीम का उद्देश्य है। जहाँ विभिन्न समारोहों के माध्यम से ओडिशा राज्य की विलक्षण संस्कृति और विरासत को प्रदर्शित किया जाएगा। यह दिवस ऐसा कार्यक्रम है जिसके माध्यम से हम उत्कल की कला साहित्य की महान विरासत को जानने, देखने और अनुभव करने का लाभ ले सकते हैं।

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(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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