Nitish Kumar: क्या विपक्षी एकता के केंद्र में टिके रह पाएंगे नीतीश कुमार?
एनडीए में वापसी का रास्ता बंद होने के संकेतों के बीच नीतीश कुमार करो या मरो की स्थिति में आ गये हैं। लेकिन क्या 2024 तक वो विपक्षी एकता के केन्द्र में बने रह पायेंगे?

Nitish Kumar: कर्नाटक के मैसुरू के एक रेस्तरां में डोसा बनाती कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा का बयान है कि अभी हमारे परिवार के लिए संघर्ष का समय है। ऐसे में संभलकर चलने की जरूरत है। वह कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवारों के प्रचार में चिकमंगलुरु व अन्य इलाकों के दौरे पर हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या संघर्ष में फंसी सबसे पुरानी पार्टी का सबसे कद्दावर परिवार किसी बड़े राजनीतिक त्याग की तैयारी में है? क्या 2024 में बीजेपी के विरुद्ध मोर्चाबंदी की कमान कांग्रेस से बाहर किसी अन्य नेता के हाथों सौंपने पर गंभीरता से बात चल रही है?
ऐसे में एक सवाल और उठता है, वह यह कि क्या कांग्रेस की ओर से नेतृत्व की कमान समाजवादी नेता नीतीश कुमार को सौंप दी गई है। इसे लेकर विपक्ष की राजनीति में काफी गहमागहमी का माहौल है। खासकर केंद्र सरकार से किसी न किसी मामले को लेकर नाराज विपक्ष के नेता नीतीश कुमार के विपक्षी एकता के अभियान को तवज्जो देने लगे हैं।
जनता दल यू से जुड़े नेताओं के मुताबिक कांग्रेस से सिग्नल मिलने के बाद नीतीश कुमार ने अपने उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को साथ लेकर यत्रतत्र बिखरे पड़े विपक्षी नेताओं को एकमंच पर लाने का अभियान तेज किया है। बीते साल अगस्त में एनडीए से पाला बदलकर विपक्ष के साथ हो लेने वाले नीतीश कुमार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मिलने में ही काफी समय लग गया। जब राहुल चारों तरफ मुसीबतों से घिर गए तब जाकर बीते 12 अप्रैल को उनकी राहुल गांधी से मुलाकात संभव हो पाई। इस मुलाकात के बाद नीतीश कुमार नए तेवर में हैं। राहुल से मिलने के बाद दिल्ली में ही उनकी अरविंद केजरीवाल से मुलाकात और सीताराम येचुरी के साथ गहन मंत्रणा हुई है।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश विपक्षी एकता की उम्मीद को धार देने तेजस्वी के साथ कोलकाता जाकर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और लखनऊ पहुंच अखिलेश यादव से मिल आए हैं। लखनऊ में सपा नेता अखिलेश से मिलने के बाद उनका प्रधानमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं होने का बयान फिर चर्चा में है। इस बयान से सबसे ज्यादा परेशान प्रेस कांफ्रेंस में साथ रहे बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हुए। क्योंकि अगर नीतीश कुमार प्रधानमंत्री बनने की राह पर नहीं चलेंगे तो उनका बिहार में मुख्यमंत्री होने का सपना फिलहाल टूट जायेगा।
बिहार में अचानक से एनडीए छोड़ महागठबंधन की सरकार इस शर्त पर बनी बताई जा रही है कि लालू प्रसाद का राष्ट्रीय जनता दल विपक्षी एकता के आसरे नीतीश कुमार को देश का अगला प्रधानमंत्री बनाने के लिए काम करेगी। बदले में नीतीश कुमार शुरुआती सियासी सफर के बड़े भाई लालू यादव के लाडले तेजस्वी यादव के उज्ज्वल राजनीतिक भविष्य को सुनिश्चित करेंगे। इस सुनिश्चिता की कोशिश में लगने पर नीतीश कुमार को अपनी पार्टी जेडीयू के अंदर बड़ा विरोध झेलना पड़ रहा है।
जेडीयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष व केंद्रीय मंत्री रहे आरसीपी सिंह तथा संसदीय दल के नेता उपेंद्र कुशवाहा जैसे कद्दावर नेता बगावत कर अलग हो चुके हैं। इसके अलावा लालू प्रसाद के खिलाफ जमीन तैयार कर चुनाव जीतकर आने वाले जेडीयू के कई विधायक, सांसद व नेता आरजेडी जेडीयू गठबंधन में अपना भविष्य असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। इधर बीजेपी ने भी नई पीढ़ी के नेता सम्राट चौधरी के हाथ प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपकर साफ कर रखा है कि अब आगे उसका नीतीश कुमार के साथ होने का कोई इरादा नहीं बचा। सम्राट चौधरी बिहार की जातीय राजनीति में कद्दावर नेता रहे स्व. शकुनी चौधरी के वारिस हैं।
लखनऊ में नीतीश की ओर से प्रधानमंत्री का उम्मीदवार नहीं होने के बयान की ऐतिहासिक वजह है। समाजवादी पार्टी को मजबूती से विपक्षी एकता के मंच पर रखना बेहद जरूरी है, क्योंकि दूध का जला छाछ फूंक फूंककर पीता है। 2019 में बीजेपी के खिलाफ विपक्ष के एक होने की मुहिम सिर्फ इस बात से पंक्चर हो गई कि अखिलेश यादव ने पिता मुलायम सिंह यादव के प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने का आग्रह जोर शोर से रख दिया था। तब इस मुहिम की बागडोर सम्हाल रहे आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू गच्चा खा गए। अंदरूनी तौर पर मुलायम के साथ ममता बनर्जी और शरद पवार ने एक साथ विपक्ष से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार होने की ताल ठोक दी। कांग्रेस की ओर से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का आग्रह विपक्ष में छिन्न भिन्न बिखराव की वजह बन गया। उसका सीधा लाभ उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पहले से अधिक मजबूती से सरकार में लौट आई।
अखिलेश को खुश करने के बाद नीतीश कुमार का अगला कार्यक्रम मुंबई जाकर शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे नेताओं को साधने का है। यह काम उनको कर्नाटक चुनाव में फंसी कांग्रेस की व्यस्तताओं के बीच कर लेना है। फिर अगर कर्नाटक में विपक्ष के बिखराव की वजह से बीजेपी अपनी हारी बाज़ी जीतने में सफल होती है, तो विपक्ष को एकीकृत करने की आवश्यकता शिद्दत से बढ़ जाएगी। अगर कांग्रेस कर्नाटक अपने दम पर जीत लेती है, तब लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्ष में नया जोश जागेगा। वैसे पिछली बार भी जब नीतीश कुमार विपक्ष के पाले में आए थे तो कहा जाता है कि राहुल गांधी के फेवरेट थे। राहुल अपनी इस भावना का इजहार कई मंचों से बार बार करते रहे थे। अब जब वह स्वयं अपनी संसदीय सदस्यता गंवाकर राजनीति के सबसे बुरे दौर का सामना कर रहे हैं तो संभव है कि नीतीश के प्रति उनका लगाव काम कर जाए।
वैसे भी बीजेपी की ओर से वापसी का रास्ता बंद होने के साफ संकेत के बाद नीतीश कुमार के लिए करो या मरो का ही विकल्प बचा है। इसके लिए वह बीजेपी से लोहा लेने के लिए बड़े से बड़ा फैसला करने की मूड में हैं। वह अपनी पार्टी जेडीयू और आरजेडी समेत समाजवादी विचार वाले कुछ अन्य दलों तक का समाजवादी पार्टी में विलय करवाने की रणनीति पर विचार कर रहे हैं। मतलब विपक्षी एकता की मुहिम का पासा सही बैठा तो जेडीयू का तीर, आरजेडी की लालटेन और अन्य दलों के चुनाव चिन्ह समाजवादी पार्टी के साइकिल अथवा पहिए में समाहित हो जायेंगे। तब 2024 लोकसभा चुनाव में विपक्ष से एक उम्मीदवार के लिए कांग्रेस और कांग्रेस नामधारी राजनीतिक दलों के साथ समाजवादी दल के तालमेल को परवान चढ़ाना आसान होगा।
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विपक्षी एकता की अपनी इसी सोच और रणनीति के तहत नीतीश कुमार बार-बार अगले लोकसभा चुनाव में बीजेपी को सौ सीटों के अंदर समेट देने का दंभ भर रहे हैं। मगर इस दांव पर तब तक शंका बनी हुई है जब तक कर्नाटक चुनाव के नतीजे नहीं आ जाते।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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