ईशनिंदा की परिभाषा तय करने की जरूरत

वर्ष 1926 में असगरी बेगम नाम की एक मुस्लिम महिला कराची से अपने दो बच्चों और भतीजे के साथ दिल्ली आ गयी. यहाँ आकर उसने हिन्दू धर्म अपनाने की इच्छा प्रकट की. अतः उसकी इच्छा के अनुसार उसका धर्म-संस्कार किया गया और उसका नाम शांतिदेवी रखा गया. इसके बाद उस महिला ने दिल्ली के एक आश्रम में रहकर स्वेच्छा से हिंदी और संस्कृत पढ़ना एवं सीखना शुरू कर दिया. लगभग तीन महीने बाद, महिला के पिता मौलवी ताज मुहम्मद खान उसे ढूंढते हुए दिल्ली आ गए. कुछ दिनों बाद उसका पति अब्दुल हलीम भी दिल्ली पहुँच गया. दोनों ने मिलकर शांतिदेवी को फिर से इस्लाम में वापस आने का आग्रह किया, जिसे उसने नकार दिया.

Blasphemy

इस पर महिला के पति और पिता ने मिलकर स्वामी श्रद्धानंद, डॉ सुखदेव, देशबंधु गुप्ता और लाला लाजपत राय के खिलाफ एक मुकदमा दायर कर दिया. न्यायालय ने 4 दिसंबर 1926 को दिए अपने फैसले में सभी अभियुक्तों को मुकदमे से बरी कर दिया. मगर इस घटना के बाद से अस्वस्थ स्वामी श्रद्धानंद को लगातार धमकी भरे पत्र मिलने शुरू हो गए. आखिरकार, 23 दिसंबर 1926 को जब वे दिल्ली स्थित अपने निवास स्थान पर आराम कर रहे थे तो अब्दुल राशिद ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. जब उन्हें बचाने के लिए उनके सहयोगी धर्म सिंह ने कोशिश की तो अब्दुल ने उन्हें भी एक गोली मार दी. बाद में, अब्दुल राशिद पर मुक़दमा चला और उसे फांसी की सजा मिली.

यह अविभाजित भारत की एक प्रमुख घटना थी जिसने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था. इसी दौरान कट्टरपंथी मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए अनेक पुस्तकों जैसे 'कृष्णा तेरी गीता जलानी पड़ेगी' और 'उन्नीसवीं सदी का लंपट महर्षि' का प्रकाशन किया गया. जिसके जवाब में 'रंगीला रसूल' नाम की एक पुस्तक सामने आई. जिसके प्रकाशक महाशय राजपाल पर भारतीय दंड सहिंता की धारा 153A के तहत मुक़दमा चला लेकिन लाहौर उच्च न्यायालय ने इस तरह के मामलों से निपटने के लिए व्यवस्थित कानून न होने के कारण उन्हें बरी कर दिया. मगर इमामुद्दीन ने 1929 में उनकी हत्या कर दी. न्यायालय द्वारा इमामुद्दीन को फांसी की सजा दी गयी लेकिन मोहम्मद अली जिन्ना ने यह कहते हुए उसका बचाव किया कि इमामुद्दीन 19 साल का है इसलिए उसे फांसी न देकर आजीवन कारावास देना चाहिए. हालाँकि, न्यायालय ने उसकी फांसी की सजा में कोई बदलाव नहीं किया.

उपरोक्त दोनों मामलों में प्रथम दृष्टया हिन्दुओं की कोई गलती नहीं थी. फिर भी देशभर के मुसलमानों ने इस्लाम को किसी कानून के माध्यम से संरक्षित करने की मांग करनी शुरू कर दी. जिसके परिणामस्वरूप ब्रिटिश सरकार ने एक कानून बनाने पर विचार किया, जोकि सभी धर्मों की भावनाओं का कथित संरक्षण कर सके. अतः 5 सितम्बर 1927 को भारत की लेजिस्लेटिव असेम्बली में भारतीय दंड सहिंता कानून में 295A नाम की नयी धारा जोड़ने का प्रस्ताव लाया गया. इसके अंतर्गत किसी भी धर्म पर छींटाकशी एवं अपशब्द बोलने वालों के खिलाफ का सजा का प्रावधान था. इस विधेयक की प्रस्तावना ब्रिटिश भारत में गृह मामलों का काम संभल रहे ब्रिटिश अधिकारी जे. क्रेरार ने रखी. आज भी भारत में ईशनिंदा सम्बन्धी मामलों से निपटने के लिए इसी धारा का प्रयोग किया जाता है.

इस विधेयक में शुरूआती सुझावों के अनुसार बदलाव के लिए इसे एक सेलेक्ट कमेटी को भेजा गया था जिसमें मदनमोहन मालवीय, एस श्रीनिवास आयंगर, एनसी चुंदर, मोहम्मद अली जिन्ना, इस्माइल खान, अब्दुल हाय, आर्थर मूर, एएच गजनवी, एनसी केलकर, एमआर जयकर, जे कोटमैंन, केसी रॉय, अब्दुल कय्यूम, डेनीस ब्रे, जुल्फिकार अली खान, और हरी सिंह गौर के नाम शामिल थे.

कुल मिलाकर सभी धर्मों के सदस्य इस धारा के समर्थन में थे, मगर असेम्बली में चर्चा के दौरान कुछ ऐसे सुझाव भी थे, जिनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. इसमें सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह था कि ईशनिंदा की परिभाषा क्या होगी? इस पर लाला लाजपत राय ने कहा कि धर्म और उससे जुड़े अति सम्मानीय महानुभावों का जानबूझकर अपमान करने वालों के खिलाफ अगर कोई कानून बनता हो तो हिन्दू धर्म के लोगों कोई आपत्ति नहीं होगी. मगर उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कानून बनाते समय इस बात का ध्यान रखना होगा कि जो लोग विशुद्ध समालोचना करते है और धर्म से जुड़े मामलों पर ऐतिहासिक शोध कार्य कर रहे है, उन्हें कोई हानि न पहुंचे. लाल लाजपत राय के इन सुझावों का सबसे पहले समर्थन मोहमद अली जिन्ना ने किया. उसके बाद, हृदयनाथ कुंजरू ने भी इस बात पर अपना संबल दिया.

ठाकुर दास भार्गव ने 16 सितम्बर 1927 को इस धारा के सन्दर्भ में एक उप-धारा भी जोड़ने का प्रस्ताव रखा, "यह तय किया जाये कि हिज मेजेस्टी के किसी भी नागरिक के धर्म और धार्मिक मान्यताओं में सुधार या पुनरुद्धार के लिए लेखन, भाषण, दृश्यात्मक वर्णन अथवा प्रमाणिक शोध के लिए चर्चा, तुलनात्मक अध्ययन को धर्म और धर्म की मान्यताओं के खिलाफ अपमान या अपमान करने का प्रयास नहीं माना जायेगा." हालाँकि, इस उपधारा को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार नहीं किया.

इसके बाद टी. प्रकाशन ने भी ठाकुर दास भार्गव के समान एक संशोधन पेश किया कि अगर किसी धर्म में ऐसी कोई झूठी अथवा अंधविश्वास पर आधारित मान्यता प्रचलित है, जोकि वास्तविकता में उस धर्म से कोई लेनादेना नहीं है, और अगर उसकी कोई आलोचना होती है तो उसे इस कानून के दायरे से बाहर रखा जायेगा. जब इस संशोधन पर सदन का मत लिया गया तो इसके पक्ष में 40 और विपक्ष में 57 मत थे. खास बात यह है कि जिन सदस्यों ने इस संशोधन का समर्थन किया वह सभी हिन्दू थे और जिन्होंने विरोध किया उनमें 57 में से 47 सदस्य मुसलमान और ब्रिटिश यानि ईसाई थे.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि लेजिस्लेटिव असेम्बली में हिन्दुओं ने इस कानून का भरपूर समर्थन किया लेकिन वे सभी इसमें कुछ समयानुसार बदलाव चाहते थे जोकि किसी भी समाज की प्रगति के लिए आवश्यक थे. मगर मुसलमानों और ईसाईयों के बहुमत के चलते ब्रिटिश भारत में ऐसा संभव नहीं हो सका. वैसे भी ब्रिटिश सरकार की कुटिल मंशा पर किसी को संदेह भी नहीं होना चाहिए.

अब जब ईशनिंदा पर देशभर में चर्चा हो रही है तो स्वाधीन एवं लोकतांत्रिक भारत में इस विषय पर भी खुलकर चर्चा करने की जरुरत है कि अगर किसी धर्म से जुड़ा कोई प्रमाणिक तथ्य पहले से ही उसकी धार्मिक पुस्तकों में उपलब्ध है और दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति उस तथ्य को बोलता अथवा पढ़ता है तो वह ईशनिंदा कैसे हो गयी? इसके अलावा, किसी भी धर्म पर प्रमाणिक शोध कार्य, लेखन, इत्यादि के सन्दर्भ में जो सुझाव कानूनविदों ने 1927 में पेश किये थे, क्या उन पर फिर से गौर करने की जरुरत नहीं है?

(इस लेख में व्यक्त विचार, लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में दी गई किसी भी सूचना की तथ्यात्मकता, सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है. इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं।)

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