NDA vs PDA: वोटों के गणित में पीडीए से कहीं आगे एनडीए
NDA vs PDA: विपक्षी दलों का जुटान हो गया, पटना में 15 दलों की बैठक हुई| इनमें कांग्रेस, डीएमके, झारखंड मुक्ति मोर्चा, एनसीपी, नेशनल कांफ्रेंस पहले से सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले यूपीए का हिस्सा थीं| आरजेडी और शिवसेना भी लगभग यूपीए में ही थीं| विपक्षी जुटान में शामिल हुई नई पार्टियां है जेडीयू, तृणमूल कांग्रेस, सीपीएम, सीपीआई, सीपीआईएमएल, समाजवादी पार्टी, पीडीपी और आम आदमी पार्टी| इसमें आरएसपी और मुस्लिम लीग को भी जोड़ लीजिए, ये दोनों पार्टियां भी पहले से यूपीए में हैं| कुल मिला कर 17 दल बनते हैं| इन सत्रह दलों की लोकसभा में 154 सीटें हैं और 2019 में इन्हें कुल मिला कर 38 प्रतिशत वोट मिला था|
वहीं, भाजपा को अकेले 437 पर 37.36 प्रतिशत वोट और 303 सीटें मिलीं थी, भाजपा ने 105 सीटें अपने सहयोगियों के लिए छोड़ दी थीं, जिन्हें 7.7 प्रतिशत वोट और 50 सीटें मिलीं थी| यानि कुल 45 प्रतिशत वोट और 353 सीटें| इनमें जनता दल यू को 1.46 प्रतिशत वोट और 16 सीटें मिलीं थी और शिवसेना को 2.10 प्रतिशत वोट और 18 सीटें मिलीं थीं| यानि 2019 के चुनाव नतीजों के वाद जेडीयू और शिवसेना 34 लोकसभा सीटों और 3.56 प्रतिशत वोटों के साथ एनडीए से बाहर हो गए| लेकिन यह जमीनी सच्चाई नहीं है, शिवसेना और जेडीयू दोनों ही टूट चुके हैं, शिवसेना का लोकसभा में एक भी सांसद नहीं है, सभी शिंदे गुट में जा चुके है, जो एनडीए का हिस्सा है|

जनता दल यू के आधे से ज्यादा सांसद चुनाव आते आते पार्टी छोड़ कर अलग होने की तैयारी में हैं। इस समय बिहार में जो जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन बना है, वह गठबंधन 2014 के चुनाव में भी था, तब आरजेडी को 4, जेडीयू को 2, कांग्रेस को 2 और एनसीपी को एक सीट मिली थी| जबकि एनडीए को 31 सीटें मिली थी, जिनमें से भाजपा को 22, उसकी सहयोगी लोजपा को 6 और अन्य सहयोगी रालोसपा भी तीन सीटें जीत गई थी| 2019 में जेडीयू की ताकत भाजपा के साथ गठबंधन के कारण ही बढ़ी थी|
जो दल पटना में एक साथ बैठे थे, उनमें से आम आदमी पार्टी शिमला में होने वाली दूसरी बैठक में शामिल नहीं होगी| आम आदमी पार्टी ने घोषणा की है कि कांग्रेस इस बैठक से पहले अध्यादेश पर अपना रूख साफ़ करे| अन्य विपक्षी दलों के दबाव के बावजूद कांग्रेस ऐसा नहीं करने वाली, क्योंकि अध्यादेश के मुद्दे पर केजरीवाल को समर्थन नहीं देने का पार्टी के भीतर से भारी दबाव है| राहुल गांधी ने पटना बैठक के दौरान चाय के समय भी केजरीवाल से बात करने से इंकार करके उन्हें अपमानित किया|

मल्लिकार्जुन खड़गे ने केजरीवाल को उनके और आम आदमी पार्टी के अन्य नेताओं के वे बयान दिखाए, जो राहुल गांधी और कांग्रेस के खिलाफ दिए गए थे| केजरीवाल ने उस समय कहा था कि बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुध ले। लेकिन अगले ही दिन 24 जून को आम आदमी पार्टी की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने राहुल गांधी के खिलाफ अब तक का सबसे हमलावर ट्विट किया| जिसमें उन्होंने लिखा कि अगर विपक्षी दल देश को बचाना चाहते हैं, तो उन्हें सबसे पहले कांग्रेस को बोल देना चाहिए कि वे तीसरी बार भी राहुल गांधी पर दाव नहीं लगाएंगे, कांग्रेस विपक्ष पर इस तरह का दबाव भी नहीं डाले| उन्होंने लिखा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री की रेस से बाहर करना देशहित में और संविधान बचाने से भी ऊपर है|
आम आदमी के दूसरे प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने कहा कि अगर खुदा न खास्ता राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन गए तो वह सबसे ज्यादा घमंडी होंगे| केजरीवाल पटना में हुए अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाए, उन्हें उम्मीद नहीं थी कि राहुल गांधी उन्हें एक मिनट का समय देने से भी इंकार कर देंगे| राहुल गांधी ने ऐसा इसलिए किया, क्योंकि केजरीवाल की तोड़ मोड़ कर बोलने की छवि बन चुकी है, इसलिए उन्हें डर था कि मुलाक़ात के बाद वह बाहर जा कर न जाने क्या क्या कह दें| इस नए घटनाक्रम के बाद कांग्रेस भी राहुल गांधी के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकेगी, इसलिए अरविन्द केजरीवाल को गठबंधन से बाहर ही समझिए| इतना ही नहीं, जहां जहां कांग्रेस के उम्मीदवार खड़े होंगे, वहां वहां देश भर में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार भी खड़े होंगे|
2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 31 प्रतिशत वोटों के साथ 282 सीटें मिलीं थी। 2019 में वोट शेयर 37.36 प्रतिशत हो गया और सीटें बढ़ कर 303 हो गई थीं| वोट प्रतिशत तो 6.36 प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सीटें सिर्फ 21 बढ़ा| भाजपा का वोट प्रतिशत बढ़ने का मुख्य कारण यह था कि जहां 2014 में भाजपा ने 116 सीटें दो लाख वोटों से ज्यादा अंतर से जीती थी, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 164 हो गई| इसी तरह तीन लाख, चार लाख, पांच लाख वोटों से जीतने वाली सीटों में भी बढ़ोतरी हुई थी| इससे वोट प्रतिशत तो बढ़ गया, लेकिन उस मुकाबले में सीटें उतनी नहीं बढीं|
देश में मोदी सरकार के खिलाफ ऐसी कोई हवा भी नहीं चल रही कि इन 164 सीटों पर बड़ा उलटफेर हो जाएगा| विपक्षी गठबंधन से मीडिया में नेरेटिव जरुर बनता है, जमीन पर कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता| भाजपा ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बसपा का महागठबंधन होने के बावजूद 80 में से 64 लोकसभा सीटें जीतीं थीं| जबकि बसपा से गठबंधन के बावजूद सपा सिर्फ पांच सीटें जीत पाईं, इनमें से दो सीटें उपचुनाव में हार गई, क्योंकि बसपा से गठबंधन टूट गया था|
समाजवादी पार्टी ने 2017 में कांग्रेस के साथ गठबंधन करके भी चुनाव लड़ कर देख लिया है| इसलिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को कांग्रेस से गठबंधन करके तभी फायदा हो सकता है, अगर यूपी का सारा मुस्लिम वोट मायावती का साथ छोड़कर उनके साथ आ जाए| ऐसी संभावना बन भी रही है। इसी संभावना को देखते हुए ही अखिलेश यादव ने गठबंधन का रूख किया है, लेकिन ऐसी सूरत में भी पिछली बार मुस्लिम-दलित गठबंधन के चलते 10 सीटें जीतने वाली मायावती को नुकसान होगा, भाजपा को नहीं|
गठबंधन का नाम देशभक्त लोकतांत्रिक गठबंधन (पैट्रियोटिक डेमोक्रेटिक एलायंस) रखा जा रहा है| इस नाम का खुलासा बहुत छोटे से दल सीपीआई (एमएल) ने किया है, आधिकारिक तौर पर इसका एलान अभी नहीं किया गया है| इन तीनों शब्दों पर गौर करिए। पहला शब्द खुद का बचाव करने वाला है, क्योंकि विपक्षी नेताओं, खासकर राहुल गांधी की देशभक्ति पर भाजपा के नेता सवाल उठाते रहते हैं| दूसरा शब्द लोकतांत्रिक इसलिए है, क्योंकि विपक्ष का सारा नेरेटिव ही यह है कि मोदी के रहते लोकतंत्र खतरे में है और वे ही लोकतंत्र को बचा सकते हैं| लेकिन जब तक उस नेरेटिव से जनता न जुड़े, तब तक नेरेटिव बना देने से न तो कोई चुनाव हार सकता है, न जीत सकता है|
हम जमीनी हकीकत को देखें, तो 2019 में नौ राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की 199 लोकसभा सीटों में से 180 सीटें एनडीए जीती थी, जिनमें से 177 उम्मीदवार भाजपा के जीते थे और तीन सहयोगी| विपक्ष के 19 सांसदों में से दस बसपा के, पांच सपा के, चार कांग्रेस के (यूपी-1, मध्यप्रदेश-1, छतीसगढ़-2) जीते थे| उतर प्रदेश और दिल्ली को छोड़कर बाकी सभी सात राज्यों में कांग्रेस और भाजपा आमने सामने हैं, यानि किसी अन्य पार्टी की कोई भूमिका नहीं है|
उत्तर प्रदेश में भाजपा गठबंधन ने 80 में से 64 और दिल्ली की सभी सात सीटें जीती थीं। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटों का विभाजन नहीं हुआ था क्योंकि दोनों बड़ी पार्टियां सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़ी थीं| मायावती और अखिलेश यादव के गठबंधन के बावजूद अगर विपक्ष 16 पर अटक गया था तो अब क्या उम्मीद की जा सकती है, जब मायावती भी गठबंधन के साथ नहीं है। दूसरी तरफ असुदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भी मुस्लिम वोटों में विभाजन करने पहुंच रही है, और आम आदमी पार्टी भी भाजपा विरोधी वोटों को थोड़ा बहुत विभाजित करेगी ही| दिल्ली में पिछली बार भाजपा ने सभी सातों सीटें जीतीं थीं, कांग्रेस दूसरे नंबर पर और आम आदमी पार्टी तीसरे नंबर पर रही थी| इस बार भी यही स्थिति रहने की संभावना है|
राजस्थान में भाजपा ने सभी 25 सीटें (नागौर की एक सीट भाजपा ने अपने सहयोगी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी को दी थी), मध्य प्रदेश में 29 में से 28 सीटें, छत्तीसगढ़ की 11 में से 9 सीटें, गुजरात की सभी 28 सीटें जीतीं। हरियाणा की सभी दस, हिमाचल प्रदेश की सभी चार (जिनमें से एक उपचुनाव में हार गई थी) और उत्तराखंड की भी सभी पांच सीटें जीती थीं| इन सभी राज्यों में कांग्रेस के अलावा किसी अन्य विपक्षी दल का कोई प्रभाव नहीं है| इसलिए इन राज्यों में कांग्रेस को किसी विपक्षी दल के सहयोग से कोई लाभ नहीं मिलने वाला। अलबत्ता आम आदमी पार्टी अकेले चुनाव लड़ कर कांग्रेस को नुकसान पहुँचाने का काम जरुर करेगी, जैसे गुजरात विधानसभा चुनाव में किया|
2019 के लोकसभा चुनाव से छह महीने पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के विधानसभा चुनाव हुए थे| तीनों ही राज्यों में भाजपा हारी थी, लेकिन लोकसभा चुनावों में इन तीनों राज्यों की 65 लोकसभा सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 3 सीटें जीत सकी थी| इन तीनों ही राज्यों में इसी दिसंबर में विधानसभा चुनाव हैं| राहुल गांधी ने पटना में दावा किया है कि कांग्रेस तीनों राज्य जीतेगी, वह जीत भी जाए, तो भी उसका लोकसभा चुनावों पर कोई असर नहीं होगा| क्योंकि विपक्षी दलों का जुटान भले ही हो जाए, विपक्षी दलों की जनता में अपील नहीं है। विपक्ष में जनता का भरोसा तभी होगा, जब जनता का मोदी से मोह भंग होगा|
विपक्ष जनता को डराने की कोशिश कर रहा है कि अगर मोदी 2024 में भी जीत गए, तो फिर कभी चुनाव नहीं होंगे| लेकिन जनता में यह डर तब तक पैदा नहीं होगा, जब तक उसका मोदी से मोह भंग न हो| अलबत्ता कश्मीर से 370 हटाना और रामजन्मभूमि मन्दिर निर्माण जैसे कई कारण हैं, जिनसे मोदी के प्रति आस्था में बढ़ोतरी की संभावना है| विपक्ष को भी इस बात का एहसास है, इसलिए उसकी पटना में साझा रैली करने की हिम्मत नहीं हुई|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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