NCERT Books: बच्चों की पुस्तकों पर वैचारिक पूर्वाग्रहों का बोझ

NCERT Books: एनसीईआरटी की किताबों पर शुरू हुआ विवाद का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है। यह विवाद तब शुरू हुआ था जब प्रोफेसर सुहास पल्शिकर और योगेंद्र यादव ने 6 किताबों से खुद को अलग किया था। इसके बाद एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तक विकास समिति (टीडीसी) का हिस्सा रहे 33 शिक्षाविदों ने एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी को पत्र लिखकर सामूहिक रचनात्मक प्रयास को खतरे में बताते हुए पुस्तकों से अपना नाम हटाने की मांग की है।

जवाब में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के चेयरमैन सहित 106 शिक्षाविदों ने नाम वापसी को तमाशा बताते हुए किताबों को अपडेट करने की प्रक्रिया को बाधित करने का आरोप लगाया है। इस बीच जेएनयू की कुलपति समेत 71 शिक्षाविदों के एक समूह ने संयुक्त रूप से बयान जारी कर कहा है कि पाठ्यक्रम समिति में वर्षों से कुंडली मारकर बैठे लोगों द्वारा प्रक्रिया में बाधा उत्पन्न कर बच्चों के भविष्य को खतरे में डालने की कोशिश की जा रही है।

NCERT Books: The burden of ideological biases on childrens books

शिक्षा में बुनियादी बदलाव की शुरुआत पाठ्यक्रमों से ही होती है। आजादी के बाद से यह सवाल हमारे सामने आया कि हम अपनी शिक्षा व्यवस्था का ढांचा कैसा बनाएं? पाठ्यक्रम ऐसा हो कि उसमें हमारे देश की तमाम खूबियां अपने वैविध्य के साथ झलके। संबंधित पुस्तकें ज्ञान-विज्ञान के तमाम विषयों के साथ संतुलन बनाते हुए संस्कृति और प्रकृति से भी नाता जोड़ें। यह सब करते हुए उनमें इतिहास की तारीखों और तथ्यों का पालन होना अनिवार्य शर्त है।

इसको ध्यान में रखकर आजादी के बाद जो शिक्षा नीति बनी तो उसका उद्देश्य उदारवादी ढंग से ज्ञान परंपराओं को समाहित करके बच्चों में तार्किक, वैज्ञानिक और नवोन्मेषी दृष्टि विकसित करना था। पुस्तकों को बनाने के लिए विभिन्न अनुशासन और चिंतन पद्धतियों के लोगों को शामिल किया गया। मगर इसी उदारता का कुछ वैचारिक पूर्वाग्रहियों ने फायदा उठाया। स्कूली पाठ्यक्रमों में जानबूझकर ऐसे कथ्य शामिल किये गये जो भारत की खूबियों की बजाय उसकी खामियों को उभारते थे।

जब भाजपा सरकार में आई तो सबसे पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में इन पूर्वाग्रहों को दूर करने का प्रयास किया गया। अब मोदी सरकार में भी बच्चों पर किताब का बोझ कम करने के उद्देश्य से पाठ्यक्रम से कुछ बातें हटाई गयीं तो कुछ पाठ्यक्रमों को नये सिरे से संयोजित किया गया है। इसी को एक खास विचारधारा के लोग पाठ्यक्रम में बदलाव बताकर इसका विरोध कर रहे हैं।

लेकिन जो लोग दिल्ली में एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में परिवर्तन का विरोध कर रहे हैं वही लोग दूसरी तरफ कर्नाटक में पाठ्यक्रमों की नयी पाठ रचना का समर्थन कर रहे हैं। कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने राज्य परिषद की पुस्तकों में से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक हेडगेवार और सावरकर आदि से संबंधित पाठ पुस्तकों से निकालने और उसकी जगह पंडित जवाहरलाल नेहरू, सावित्रीबाई फुले, बाबा साहब अंबेडकर आदि की रचनाओं को शामिल करने की मंजूरी दी है। ऐसी कई एक घटनाएं दूसरे राज्यों में भी हो चुकी है। यह बिल्कुल हाल की प्रवृत्ति नहीं है। पिछले 20 सालों से इस प्रवृति ने एक तरह से जड़ जमा ली है।

अफसोस की बात यह है कि हमारे देश में अभी यह प्रक्रिया लगभग केंद्रीकृत है और इसमें अकादमिक बुद्धिजीवियों व शिक्षा प्रशासकों की ही प्रधान भूमिका है। यह एक ऐसी बौद्धिक, प्रशासनिक दर्जाबंदी बनी हुई है जहां सचेत या अचेत तौर पर मान लिया गया है कि दिल्ली जैसी जगह और एनसीईआरटी जैसे संस्थान के मार्गदर्शन में ही अकादमिक विद्वान व नौकरशाह ज्ञान का उत्पादन करते हैं। इस वजह से अभी तक राज्यों के स्तर पर पाठ्यचर्या निर्माण की प्रक्रिया सुव्यवस्थित नहीं हो सकी है, और जहां कहीं यह प्रक्रिया शुरू भी की गई है तो उसमें राज्य के भीतर के बौद्धिक तत्वों, अध्यापकों, अभिभावकों और समुदाय के प्रेरक तत्वों की भागीदारी निहायत कमजोर है। एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या अध्यापकों को ज्ञान का उत्पादक मानने के बजाय ज्ञान का विनिमयकर्ता मानने की है।

जहां तक पाठ्य पुस्तकों की गुणवत्ता की बात है तो इसकी सबसे प्रमुख कसौटी यह है कि उनकी रचना के केंद्र में बच्चे हैं या नहीं? उनमें बच्चों के वर्तमान और भविष्य की चिंता है या नहीं? पाठ्य पुस्तकों के अध्ययन अध्यापन की प्रक्रिया में बच्चों के अनुभवजन्य ज्ञान के लिए जगह है या नहीं? विभिन्न विषयों की सरहदें एक दूसरे से मिलती-जुलती हैं या नहीं? वहां सामाजिक सांस्कृतिक वास्तविकताओं और जटिलताओं के प्रति आलोचनात्मक नजरिया विकसित करने के कितने अवसर हैं? किस हद तक पुस्तकों पर अतिव्यस्क नैतिकतावादी आग्रहों और वैचारिक राजनीतिक एजेंडे का बोझ है? अगर इन कसौटियों के ऊपर गहराई से अध्ययन करें तो हमें निराश होना पड़ता है। निराशा के इसी कुहासे को छांटने की कोशिश नई शिक्षा नीति 2020 में की गई है।

पाठ्य पुस्तकों की विषय वस्तु में बदलाव के साथ-साथ शिक्षा शैली में भी बदलाव की जरूरत है ताकि बच्चे अर्थ पूर्ण ज्ञान की रचना करने और मौजूदा दौर के सामाजिक और राजनीतिक सवालों से परिचित होने में समर्थ बन सके। सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों के जरिए बच्चों को एक ऐसी दूरबीन मिलनी चाहिए जिसकी मदद से वे अपने आसपास की दुनिया का विश्लेषण कर पाए। विषय वस्तु का विन्यास ऐसा होना चाहिए कि वह वास्तविक असमानताओं के साथ साथ असमानताओं को पाटने के संघर्षों से भी परिचित कराए। यह पढ़ाते रहना गलत होगा कि भारत एक आदर्श लोकतंत्र है, क्योंकि बच्चों का दैनिक यथार्थ उन्हें बार-बार एक अलग कहानी सुनाता है।

पाठ्य पुस्तकों को बताना चाहिए कि हमारा संविधान एक कल्पनाशील दस्तावेज है, मगर इसकी उपस्थिति मात्र से ही न्याय, समानता और सम्मान की गारंटी नहीं हो जाती। बच्चों को यह भी समझ में आना चाहिए कि इतिहास अंतिम सच नहीं बताता, इसलिए उस पर सवाल उठाना बेहद जरूरी है। पुस्तकों में ऐसी सामग्री होनी चाहिए जो बच्चों को प्रोसीजरल डेमोक्रेसी और सब्सटेंसिव डेमोक्रेसी के बीच के तनावों से परिचित कराने की शुरुआत करें। बच्चों को यह समझने के लिए अवसर देना चाहिए कि लोकतंत्र कोई स्थिर व गतिहीन चीज नहीं है, वह बेहतरी के लिए चलती रहने वाली परियोजना है जिसके लिए लगातार संघर्ष करना पड़ता है।

बच्चों को क्या पढ़ाना है, यह इस बात से तय होता है कि भविष्य में देश को कैसा बनाना है। पुस्तकों का मतलब सिर्फ शिक्षित व्यक्ति नहीं जिम्मेदार नागरिक तैयार करना होता है। इसलिए पाठों का चुनाव करते वक्त इस बात का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए कि उससे बच्चों को व्यवहारिक और कार्य जीवन के लिए क्या सीखने को मिल सकता है। कोई शिक्षा व्यवस्था अगर अपने समाज के बारे में घृणा पैदा करनेवाला प्रशिक्षण दे रहा है तो उसमें हो रहे बदलाव को घृणा फैलानेवाला बदलाव नहीं कह सकते।

लेकिन भारत में शिक्षा की समस्या ये रही है कि इसमें उस भेड़िया धर्म का पालन किया गया जिसमें अंडे चुराना पुण्य का कार्य समझाया गया। अब जब उसको गलत बताया जा रहा है तो भेड़िया मानसिकता के अनुयायियों को लगता है कि उनके विचार का अनादर हो रहा है। उन्होंने अगर पाठ्य पुस्तकों को राजनीति का मैदान न बनाया होता तो उस मैदान पर दूसरे लोग भी खेलने के लिए नहीं उतरते। ऐसी किताबों को ज्ञान की पोथी कैसे कहा जा सकता है जो दिमाग पर वैचारिक पूर्वाग्रहों का बोझ लाद देती हों?

(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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