Regional Leaders: क्षत्रपों को दरकिनार नहीं कर पाएंगी राष्ट्रीय पार्टियां
1984 के बाद कांग्रेस को कभी लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। कारण था कि इंदिरा गांधी के जमाने में कांग्रेस के क्षत्रपों को किनारे किया जाने लगा और राजीव गांधी के समय में उनकी अनदेखी और तेज हुई। यही स्थिति भाजपा की बन रही है।

कोई भी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टी अपने क्षत्रपों के बिना ज़िंदा नहीं रह सकती। क्षत्रप यानी क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले बड़े नेता। आज जैसे नरेंद्र मोदी के कारण भारतीय जनता पार्टी अपराजेय लगती है, वैसे ही सत्तर के दशक में कांग्रेस इंदिरा गांधी के कारण अपराजेय थी। 1977 में आपातकाल और संजय गांधी की ज्यादतियों की बदनामी के कारण इंदिरा गांधी खुद भी हार गई थी, लेकिन 1980 में पार्टी को फिर जीता कर ले आई थीं। अगर वह कुछ साल और ज़िंदा रहती, तो कांग्रेस अपराजेय बनी रहती। लेकिन यह इंदिरा गांधी और नरेंद्र मोदी जैसों के साथ होता है, सभी के साथ नहीं होता।
इंदिरा गांधी की मौत के बाद राजीव गांधी को मिले रिकार्ड तोड़ समर्थन के बावजूद वह उस समर्थन को अपने साथ बनाए नहीं रख सके। इसकी बड़ी वजह यह थी कि कांग्रेस क्षत्रप विहीन हो गई थी, राज्यों में करिश्माई नेता नहीं रहे, तो कांग्रेस जमीन पर टिक नहीं पाई। 1984 के बाद कांग्रेस को कभी भी लोकसभा में बहुमत नहीं मिला। कारण यह था कि इंदिरा गांधी के जमाने में ही कांग्रेस के क्षत्रप इधर उधर बिखरने लगे थे और राजीव गांधी के समय में उनकी अनदेखी और तेजी से हुई।

जिस पोजीशन में सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस थी, आज नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में उसी पोजीशन में भारतीय जनता पार्टी है। जब तक मोदी हैं, राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा अपराजेय बनी रहेगी। लेकिन इंदिरा गांधी के रहते ही जैसे प्रदेशों में कांग्रेस हारने लगी थी, वही सिलसिला अब भारतीय जनता पार्टी के साथ शुरू हो गया है।
चार साल पहले भारतीय जनता पार्टी मध्यप्रदेश, राजस्थान और छतीसगढ़ हारी थी, पिछले साल हिमाचल प्रदेश हारी। कर्नाटक, महाराष्ट्र और बिहार की अलग बात है, इन तीनों राज्यों में भाजपा कभी भी अपने बूते बहुमत में नहीं आई थी। मोदी जब राष्ट्रीय पटल पर आए तब इन तीनों राज्यों में भाजपा सहयोगियों के साथ सत्ता में थी, मोदी के राष्ट्रीय पटल पर आने के बाद भाजपा इन तीनों राज्यों में एक एक बार सत्ता से बाहर भी हुई है। मोदी की चतुराई से भाजपा कर्नाटक, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में दुबारा सत्ता में लौटी भी है, लेकिन उधार के समर्थन के साथ। बिहार में सत्ता में लौट कर दुबारा सत्ता से बाहर है।
अब हम उन छह राज्यों का विश्लेषण करते हैं, जहां भाजपा सत्ता से बाहर हुई थी, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और राजस्थान को हम एक श्रेणी में रखते हैं क्योंकि इन तीनों राज्यों में भाजपा बिना किसी के समर्थन से अपने बूते पर ही सत्ता में थी। महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक को हम दूसरी श्रेणी में रखते हैं, इन तीनों राज्यों में भाजपा को कभी बहुमत नहीं मिला था और वह अपने सहयोगियों के कारण सत्ता में थी।
मोदी के राष्ट्रीय पटल पर आने के पहले ही मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान में वसुंधरा राजे क्षत्रप के तौर पर उभर चुके थे। लेकिन छत्तीसगढ़ में डाक्टर रमन सिंह 15 साल तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद क्षत्रप के तौर पर नहीं उभरे थे, क्योंकि छत्तीसगढ़ में एसटी एससी और ओबीसी वर्ग की जनसंख्या ज्यादा है, जबकि रमन सिंह सामान्य वर्ग से हैं।
वैसे छतीसगढ़ में भाजपा के सभी बड़े नेता सामान्य वर्ग से आते हैं, इसलिए छतीसगढ़ में भाजपा के लिए क्षत्रप के तौर पर किसी के उभरने का संकट पहले भी था, आज भी है। रमन सिंह अपनी कोई पुख्ता जमीन नहीं होने के कारण केन्द्रीय नेतृत्व की कृपा पर ही निर्भर रहे, हालांकि रमेश बैंस बेहतर विकल्प हो सकते थे। एससी,एसटी, ओबीसी नेतृत्व के अभाव में भाजपा सामूहिक नेतृत्व के सिद्धांत पर चलती तो छतीसगढ़ बच सकता था, लेकिन भाजपा ने ऐसा सोचा नहीं और 2018 में हार गई।
दूसरी तरफ 2014 से 2018 के दौरान मध्य प्रदेश के क्षत्रप शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की क्षत्रप वसुंधरा राजे को अस्थिर करने की खबरें आती रहीं थीं। मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह को हटा कैलाश विजयवर्गीय को मुख्यमंत्री बनाने और राजस्थान में वसुंधरा को हटा कर ओम माथुर को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिशों की खबरें आने लगी थीं। इन दोनों ही राज्यों में गुटबाजी इतनी बढ़ चुकी थी कि भाजपा हार गई और दोनों ही राज्यों में बाहरी समर्थन के साथ कांग्रेस की सरकार बन गई। हालांकि कांग्रेस की गुटबाजी के कारण ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी और 2020 में मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार गिर गई।
भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व ने 2014 से 2018 के बीच क्षत्रपों को अस्थिर करने की गलती को सुधार कर शिवराज सिंह को दुबारा मुख्यमंत्री बनाया तो भाजपा मध्य प्रदेश में स्थिर सरकार दे सकी। 2020 में राजस्थान कांग्रेस में भी बगावत हो रही थी, लेकिन वसुंधरा राजे को मुख्यमंत्री बनाने का सिग्नल नहीं गया तो कांग्रेस की सरकार बच गई।
अब हम दूसरी श्रेणी के महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार की बात कर लेते हैं। महाराष्ट्र में भाजपा 2014 में बिना गठबंधन के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभर आई थी, जिसे उसने 2019 में भी बनाए रखा। बिहार में 2020 में गठबंधन के बावजूद बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है, लेकिन इन दोनों ही राज्यों में वह सहयोगी पार्टी की वजह से बहुमत में थी, दोनों ही राज्यों की सहयोगी पार्टियों ने धोखा दिया, तो सत्ता से बाहर हो गई। महाराष्ट्र में पूर्व सहयोगी शिवसेना को तोड़ कर भाजपा दुबारा सत्ता में है और बिहार में पूर्व सहयोगी जदयू टूटने की तैयारी में है। लोकसभा चुनाव से पहले इस साल के आखिर तक जदयू टूट जाएगा। गृहमंत्री अमित शाह ने अभी 2 अप्रेल को ही नवादा में रैली को संबोधित करते हुए कहा है कि जदयू के आधे सांसद भाजपा में आने को तैयार बैठे हैं।
कर्नाटक में 2008 से वही हो रहा था, जो 2014 से 2018 के बीच राजस्थान और मध्य प्रदेश में हो रहा था। येदियुरप्पा वहां के क्षत्रप थे, 2008 से वह मुख्यमंत्री थे। 2011 में मुख्यमंत्री रहते हुए उन पर जमीन आवंटन में गड़बड़ी के आरोप लगाए गए तो उन्हें पद से हटना पड़ा। भाजपा ने पहले डीवी सदानंद गौड़ा और फिर जगदीश शेट्टार को मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन क्षत्रप येदियुरप्पा ही थे, इस बीच वह आरोपों से बरी भी हो चुके थे। इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने 2018 के चुनाव में वह गलती नहीं की, जो वह राजस्थान और मध्य प्रदेश में कर रही थी।
भाजपा येदियुरप्पा को सामने रख कर ही चुनाव मैदान में उतरी और 104 सीटें जीत कर पहले नंबर की पार्टी के तौर पर उभरी, हालांकि बहुमत से सिर्फ 8 सीटें दूर रह गई। कांग्रेस और जेडीएस ने मिल कर सरकार बनाई, लेकिन दोनों दलों में दलबदल के कारण 13 महीनों में ही सरकार गिर गई। जुलाई 2019 में जब भाजपा के साथ बहुमत बन चुका था, उस समय अगर भाजपा का केन्द्रीय नेतृत्व येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री नहीं बनाता तो सरकार न बनती, न चलती। जैसे 2017 में भाजपा गोवा में अपने क्षत्रप मनोहर पर्रिकर के कारण सरकार बना सकी थी, ठीक उसी तरह 2019 में कर्नाटक के क्षत्रप येदियुरप्पा के कारण भाजपा दुबारा सत्ता में आ सकी।
लेकिन भाजपा ने वही गलती की, जिस का एहसास उसे अब विधानसभा चुनावों में हो रहा है, जुलाई 2021 में येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटा कर बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बना दिया। हालांकि यह बदलाव उन्हें विश्वास में लेकर किया गया, लेकिन भाजपा के क्षत्रप तो येदियुरप्पा ही है, बसवराज बोम्मई नहीं। नरेंद्र मोदी ने यह जो 75 साल वाला फार्मूला बना रखा है, वह क्षत्रपों के साथ नहीं चलता। इसलिए मजबूरी में 2022 में येदियुरप्पा को भाजपा के संसदीय बोर्ड का सदस्य बनाना पड़ा और अब नरेंद्र मोदी और अमित शाह को येदियुरप्पा के घर जाकर उनकी मान मनोव्वल करनी पड़ रही है। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई हैं, लेकिन चुनाव की कमान 80 साल के येदियुरप्पा के हाथ में है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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