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Minority Politics: ऋषि सुनक के बहाने कांग्रेस ने फिर छेड़ा अल्पसंख्यक राग

कमला हैरिस की तरह ऋषि सुनक का भी भारत से कुछ लेना देना नहीं है, वह भी ब्रिटेन में पैदा हुए और हमेशा वहीं रहे। बस फर्क सिर्फ इतना है कि ऋषि सुनक हिन्दू हैं।

ajay setia

कमला हैरिस अमेरिका की उप राष्ट्रपति चुनी गई थी तो भारतीयों ने खुशी का इजहार किया था। हालांकि न तो वह भारत में पैदा हुई, न भारत में रही थी। न कभी उसके पास भारतीय पासपोर्ट रहा। कुछ भारतीयों को लगा कि वह हिन्दू है। हालांकि वह भी भारतीयों की गलतफहमी थी, क्योंकि कमला एक ईसाई पिता की बेटी और एक यहूदी डगलस एमोफ़ की पत्नी है।

अब भारतीय खुश हैं कि ऋषि सुनक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बन गए हैं। कमला हैरिस की तरह ऋषि सुनक का भी भारत से कुछ लेना देना नहीं है, वह भी ब्रिटेन में पैदा हुए और हमेशा वहीं रहे। बस फर्क सिर्फ इतना है कि ऋषि सुनक हिन्दू हैं। इसलिए भारतीय खुश हैं कि जिस ब्रिटेन ने भारत पर 200 साल राज किया, आज वहां एक हिन्दू राज कर रहा है।

rishi sunak

यह जरुर गर्व की बात है कि एक हिन्दू ब्रिटेन पर राज करेगा, लेकिन यह भारतीयों के लिए खुश होने की बात नहीं है। वह भारतीय नहीं है, वह हिन्दू है। इसलिए यह सिर्फ हिन्दुओं के लिए खुश होने की बात है। क्योंकि डूबते ब्रिटेन को ऋषि दर्शन में ही भविष्य दिखाई देने लगा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत सुप्रीमकोर्ट की जजमेंट के बाद से कह रहे हैं कि हर भारतीय हिन्दू है। क्योंकि हिन्दू कोई धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति है, लेकिन भारत के मुस्लिम और ईसाई खुद को हिन्दू मानने को तैयार नहीं।

अगर वे खुद को हिन्दू माने, भारत को अपनी मातृभूमि पुण्य भूमि मानें, भारत माता की वन्दना करें, तो हर भारतीय के लिए यह गर्व की बात हो सकती है कि ब्रिटेन में आज वह ऋषि सुनक प्रधानमंत्री हैं, जिन के पूर्वज भारत की पवित्र भूमि पर पैदा हुए थे। लेकिन भारत में बहुसंख्यक अल्पसंख्यक की अवधारणा काम करती है। जिस में हिन्दू बहुसंख्यक हैं और धर्म परिवर्तन कर के विदेशी धर्म अपना चुके मुसलमान और ईसाई अल्पसंख्यक हैं।

भारत के ज्यादातर मुसलमान भी धार्मिक वजह से खुद को इस्लामिक देशों के निकट पाते हैं, इसलिए वे सच्चे मन से कभी भारतीय हो ही नहीं पाए। मैं ज्यादातर की बात कर रहा हूँ, सभी मुसलमानों की नहीं। इस देश की पवित्र भूमि के लिए मर मिटने वाले वीर अब्दुल हमीद जैसे अनेक सच्चे भारतीय हुए है। कांग्रेस की बहुमत वाली संविधान सभा ने धर्म आधारित बहुसंख्यक-अल्प संख्यक वाला अजीब खाका खींच दिया है। जिससे भारत इसी में उलझ कर रह गया है।

55 साल तक भारत पर राज करने वाली कांग्रेस ने इस खाई को इतना चौड़ा कर दिया है कि अब उसे सत्ता पाने का यही हथियार लगने लगा है। अमेरिका में कमला हैरिस के बाद ब्रिटेन में ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम की टिप्पणी गौर करने लायक है, उन्होंने ट्विट कर के लिखा-" पहले कमला हैरिस, अब ऋषि सुनक , अमेरिका और ब्रिटेन के लोगों ने अपने देश के अल्पमत लोगों को गले लगाया और उन्हें सरकार के उच्च पदों पर चुना। मुझे लगता है कि इससे भारत और भारत में बहुसंख्यकों की राजनीति करने वाली पार्टियों को सबक सीखना चाहिए।"

कांग्रेस नेता क्या कहना चाहते हैं, यह बताने की जरूरत नहीं है। वह यह कहना चाहते हैं कि भारत में भी अल्पसंख्यक मुस्लिम प्रधानमंत्री बनना चाहिए। अगर यही बात जवाहर लाल नेहरू 1947 में मान जाते और जिन्ना को प्रधानमंत्री बना दिया जाता, तो भारत का बंटवारा ही नहीं होता। बंटवारे में दस लाख हिन्दू मारे भी नहीं जाते और करोड़ों हिन्दू दशकों तक शरणार्थी का जीवन जीने को मजबूर नहीं होते।

पी. चिदंबरम की तरह शशि थरूर ने भी ट्विट किया, जिसमें उन्होंने कहा कि हमें सभी को यह स्वीकार करना चाहिए कि एक अल्पसंख्यक को प्रधानमंत्री बना कर अंग्रेजों ने दुनिया में अनोखा काम किया है, हम सब इसे सेलिब्रेट कर रहे हैं, लेकिन हमें ईमानदारी से सोचना चाहिए कि क्या भारत में यह संभव है।

शशि थरूर हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष पद का चुनाव हारे हैं, क्योंकि उन्हें सोनिया परिवार का आशीर्वाद नहीं मिला था। कांग्रेस जब कमला हैरिस और ऋषि सुनक को लेकर इतना उत्साहित है कि मुस्लिम प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रही है, तो उसे मुस्लिम कांग्रेस अध्यक्ष बना कर इसकी शुरुआत करनी चाहिए थी।

आज़ादी के बाद भी कांग्रेस के पास पचपन साल मौक़ा था कि वह किसी मुस्लिम को प्रधानमंत्री बनाते, या कम से कम कांग्रेस अध्यक्ष ही बनाते। अगर कांग्रेस को लगता है कि भारत में मुस्लिम प्रधानमंत्री बनना चाहिए तो अभी भी वक्त है, जैसे सोनिया परिवार कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस से बाहर हुआ था, वैसे ही प्रधानमंत्री पद की रेस से भी बाहर होने का एलान करे और किसी मुस्लिम को प्रधानमंत्री प्रोजेक्ट करने की घोषणा करे।

कांग्रेस का असली चेहरा यह है कि 2005 में जब राम विलास पासवान ने राजद-कांग्रेस गठबंधन के सामने मुस्लिम मुख्यमंत्री बनाने की शर्त रखी थी, तब कांग्रेस ने लालू यादव पर दबाव बनाने की बजाए, राज्यपाल बूटा सिंह से कह कर बिहार विधानसभा ही भंग करवा दी थी। कांग्रेस को इतिहास के पन्ने जरुर खोलने चाहिए कि उन्होंने देश के साथ क्या किया। न उन्होंने बहुसंख्यको का दिल जीता, न अल्पसंख्यकों का। आज देश में अगर बहुसंख्यक की राजनीति हो रही है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है। कांग्रेस ने ही तो बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक की राजनीति शुरू की।

अभी कांग्रेस के अंतिम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यहाँ तक कह दिया था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है। बंटवारे का दर्द झेलने वालों का इससे बड़ा अपमान क्या कर सकती है कांग्रेस। कांग्रेस को ईमानदारी से सोचना चाहिए कि उसने देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज के साथ क्या किया। उनसे उनका इतिहास, संस्कृति, लोकाचार और सभ्यता सब कुछ लूट लिया। यहाँ तक कि हिन्दुओं को आतंकवादी कहा गया, रामायण को फर्जी बता दिया गया, कहा गया कि भगवान राम पैदा ही नहीं हुए थे। पहले राम जन्मभूमि छीनी, फिर रामसेतु छीनने की कोशिश की। कांग्रेस को यह भी आत्म मंथन करना चाहिए कि वे देश को कहाँ ले आए हैं।

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