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Millets: समृद्धि और स्वास्थ्य का राज, भारत का मोटा अनाज

कल तक जो इसे मोटा अनाज कहकर खारिज करते थे, आज वे इसके अंग्रेजी नाम मिलेट्स के गुण गा रहे हैं। अब शायद मोटे अनाज से उनके मन की दूरी मिट जाए और वो उसे इस्तेमाल करना शुरु कर देंगे। लेकिन मोटा अनाज कहने से या फिर अंग्रेजी में नाम मिलेट्स नाम ले लेने से बाजरे का गुण धर्म नहीं बदल जाएगा। मोटा अनाज भारत की अपनी समृद्ध कृषि परंपरा का हिस्सा रहे हैं जिन्होंने शताब्दियों से हमारा पेट भी भरा और हमें स्वस्थ तथा समृद्ध भी रखा।

Millets

अब फिर से मोदी सरकार ने श्रीअन्न के रूप में उसे प्रतिष्ठित करने का प्रयास शुरु किया तो मिलेट्स या मोटे अनाज चर्चा में आ गये हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने जब श्रीअन्न मुहिम की शुरुआत की तब उन्होंने बताया था कि वो मोटे अनाज को श्रीअन्न क्यों कह रहे हैं। इसके पीछे उनका तर्क था कि कर्नाटक में मोटे अनाज को श्रीधान्यलु कहा जाता है। अर्थात अन्न में सबसे अच्छा। इसलिए उन्होंने मोटे अनाज या मिलेट्स के लिए श्रीअन्न का नामकरण किया था।

सिर्फ नामकरण ही नहीं किया बल्कि इसको बढावा देने की सरकारी मुहिम भी शुरु की। इस साल के बजट में मोटे अनाज की पैदावार के लिए केन्द्र सरकार ने अपने बजट में विशेष प्रावधान किया है। हैदराबाद के इंडियन मिलेट्स रिसर्च इंस्टीट्यूट को विशेष मदद देने का ऐलान किया ताकि मोटे अनाज की खेती को उन्नत बनाया जा सके। इसी के साथ इस साल फरवरी में दिल्ली के पूसा इंस्टीट्यूट में मोटे अनाज पर एक दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेस का आयोजन भी किया गया जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी ने किया था। इस मौके पर मोदी ने कहा था "हम अपनी विरासत से प्रेरणा लेते हैं, समाज में बदलाव की शुरुआत करते हैं और उसे वैश्विक कल्याण की भावना तक लेकर जाते हैं। यही आज भारत के मिलेट मूवमेन्ट में भी दिख रहा है।"

जब मोटे अनाज को लेकर मोदी सरकार ने पहल शुरु की तब संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2023 को मिलेट इयर भी घोषित कर दिया गया। असल में यह मिलेट मुहिम वास्तव में न सिर्फ मनुष्य जाति के लिए बल्कि पशु पक्षी, धरती, वातावरण सबके लिए कल्याणकारी है। मोटे अनाज की खेती से न केवल क्लाइमेट चेन्ज की चुनौती का सामना करने में मदद मिलेगी बल्कि इससे जैव विविधता को भी बचाकर रखने में भी मदद मिलेगी। एक ओर महामारी बनते जा रहे ब्लड प्रेशर और डाइबिटीज को रोकने में मदद मिलेगी बल्कि धरती का स्वास्थ्य भी बेहतर होगा। अगर मोदी ने मोटे अनाज को विश्व कल्याण से जोड़ा है तो कुछ गलत नहीं जोड़ा है।

खादर वल्ली जिन्हें भारत में वर्तमान मिलेट मूवमेन्ट का अग्रदूत कहा जाता है, उन्होंने लंबे समय तक मोटे अनाजों पर शोध किया है। अपने शोध के बाद खादर वल्ली ने भारत में अनाज को तीन वर्गों में विभाजित किया है। पहला, नकारात्मक अन्न जो हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं। दूसरा सामान्य अनाज और तीसरा सकारात्मक अनाज जो हमें स्वस्थ रखते हैं।

स्वास्थ्य के लिए उन्होंने मोटे अनाज को सबसे अधिक सकारात्मक पाया है। इसमें फाइबर की मात्रा 8 से 12 प्रतिशत होती है। शोध के दौरान उन्होंने पाया कि बाजरे की अलग अलग किस्में, रागी, सांवा, कोदौं पाचन तंत्र को ठीक रखते हैं जिसके कारण मनोदैहिक विकार को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। इसमें कब्ज, गैस्ट्राइटिस, अनिद्रा, रक्त की अशुद्धि, रक्त की कमी, खराब कोलेस्ट्रोल, उच्च रक्तचाप, गठिया, डाइबिटीज तथा दिल और गुर्दे की बीमारी को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

असल में मोटे अनाज हमारे लिए स्वास्थ गारंटी योजना की तरह हैं। आधुनिक वैज्ञानिक अध्ययन बताते हैं कि मोटे अनाज सिर्फ पर्याप्त फाइबर युक्त ही नहीं होते बल्कि इनमें प्रोटीन, फॉस्फोरस, कैल्शियम और अन्य मिनरल प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं जो हमें स्वस्थ रखने में मदद करते हैं। इसलिए खादर वल्ली ने अलग अलग रोगों के लिए अनाज का अलग अलग पैकेज बनाया है। इसमें सबसे प्रमुख अलग अलग बाजरें की ही किस्में हैं। अगर कोई बाजरे को अपने खान पान का हिस्सा बनाता है तो उससे न केवल पेट के रोगों में बल्कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से लड़ने में भी मदद मिलती है।

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र कुछ नये तरह के सिद्धांतों पर काम करता है जिसमें रोगों पर केमिकल के इस्तेमाल से नियंत्रण पाया जाता है। जबकि भारत की परंपरागत आयुर्वेदिक चिकित्सा व्यवस्था व्यक्ति को अपनी दिनचर्या और खान पर ध्यान देने के लिए प्रेरित करता है ताकि शरीर में रोगों का जन्म ही न हो। आयुर्वेद समस्त मानव जाति को तीन प्रकार में वर्गीकृत करता है। वात प्रधान व्यक्ति, पित्त प्रधान व्यक्ति और कफ प्रधान व्यक्ति। आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त, कफ की यही त्रयी हमारे स्वास्थ्य को बनाती और बिगाड़ती है। अगर हमें अपने शरीर की प्रकृति पता हो और उस प्रकृति के अनुसार अपना खान पान और दिनचर्या रखें तो बिना दवाइयों के भी हम स्वस्थ रह सकते हैं।

स्वास्थ्य के इस भारतीय शास्त्र में रसोईं को ही चिकित्सालय कहा जाता है जिसमें अनाज, सब्जियां, दालें और मसाले मिलकर हमारे स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। भारत के हर क्षेत्र में खान पान की ऐसी विशिष्ट शैली विकसित हुई है जो आज भी हमारी समृद्धि की परिचायक है और हमारे स्वास्थ्य की रक्षक भी। लेकिन गेहूं की अत्यधिक पैदावार, केमिकल, कीटनाशकों के बेतहासा इस्तेमाल और मोटे अनाजों के प्रति आयी उदासीनता के कारण भारतीय लोगों की स्वास्थ्य समस्याएं बढी हैं और जटिल हुई हैं। डाइबिटीज, ब्लड प्रेशर और डिप्रेशन किसी महामारी की तरह फैल चुके हैं।

इनसे उबरना है तो भारत के लोगों को परंपरागत खाद्यान्न की ओर वापस लौटना ही होगा जिसमें न सिर्फ मोटे अनाज बल्कि जौ, चना जैसे खाद्यान्न प्रमुखता से शामिल हैं। इनके उत्पादन में भारत अगुवाई करता है तो सिर्फ लोगों का स्वास्थ्य ही सुरक्षित नहीं होगा बल्कि पूरी दुनिया में इन खाद्यान्न का बाजार भी मिलेगा जिससे भारत में समृद्धि आयेगी। पंजाब जैसे राज्यों में पर्यावरण की वो चुनौतियां जो गेहूं और धान की इकतरफा पैदावार के कारण पैदा हो रही है, उनसे भी निपटने में मदद मिलेगी।

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