Mental Health: आर्थिक विकास के बावजूद बिगड़ रहा मानसिक स्वास्थ्य
Mental Health: संयुक्त राष्ट्र मानव विकास की ताजा रिपोर्ट के अनुसार भारत की रैंकिंग गत वर्ष की तुलना में एक स्थान सुधर कर 134वें स्थान पर पहुंच गई है, वहीं प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है।
इसके बावजूद यहां नगरों महानगरों में रह रहे हर उम्र वर्ग के लोगों में अवसाद, बेचैनी, अनिद्रा, अलगाव, हीनता बोध, आक्रामकता जैसी मानसिक समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। कमोबेस सबके पास खाने-पीने का इंतजाम है, रहने को छोटा-बड़ा, खुद का या किराए का मकान है। सरकार की ओर से 12वीं तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था है। पांच लाख रुपए तक के इलाज के लिए आयुष्मान कार्ड है।

इन सबके उपरांत भी यहां लोग अवसाद या इससे मिलती-जुलती कई तरह की मानसिक, शारीरिक समस्याओं को लेकर अस्पताल पहुंच रहे हैं। आंकड़ों के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में अवसाद रोधी दवाओं की बिक्री में 110% की वृद्धि हुई है। अवसाद से ग्रस्त अनेक किशोर-किशोरियां अपने शरीर को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
एक ताजा समाजशास्त्रीय विश्लेषण में यह कहा गया है कि सफलता की अंधी दौड़ में भाग रहे लोग निराशा, कुंठा, तनाव, झुंझलाहट और हिंसक वृत्ति का शिकार होकर स्वयं को मार रहे हैं। इस प्रवृत्ति को अगर नहीं रोका गया तो आने वाला समय कितना भयावह होगा, कहना कठिन है।
हाल ही में जारी मानव विकास रिपोर्ट 2023-24 में कहा गया है कि पिछली बार भारत 191 देशों की सूची में 135वें स्थान पर था। इस बार एक अंक ऊपर चढ़कर 193 देशों की रैंकिंग में 134 वें स्थान पर पहुंच गया है। लैंगिक असमानता सूचकांक में भी भारत की उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की गई है। गत वर्ष की तुलना में 122वें स्थान से ऊपर चढ़कर 108वें स्थान पर पहुंच गया है।
हालांकि देश की श्रम बल भागीदारी में लैंगिक अंतर बना हुआ है, लेकिन भारत की प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय सकल आय लगभग 287 प्रतिशत बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की रपट 'ब्रेकिंग दि ग्रिडलॉक-रेइमेजिंनिग कोआपरेशन इन ए पोलराइज्ड वर्ल्ड' पर प्रतिक्रिया देते हुए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने कहा है कि पिछले 10 वर्षों में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय सकल आय में भारत ने बेहतरीन प्रगति की है जो देश में लैंगिक समानता हासिल करने में प्रगतिशील सुधार का संकेत देती है। वर्ष 2014 में यह रैंक 127 थी जो अब 108 हो गई है।
यह हैरान करने वाली बात है कि जो शहर शिक्षा, प्रौद्योगिकी और अन्य सुविधाओं की दृष्टि से अधिक विकसित हैं, वहां इस तरह की बीमारियां अधिक हैं। दुनिया के अन्य विकसित देशों की भी स्थिति मिलती-जुलती ही है।समृद्ध देशों में गिने जाने वाले स्वीडन, ब्रिटेन और अमेरिका के आंकड़े भी डरावने हैं। ब्रिटेन सहित पश्चिम के कई देशों में कम उम्र के बच्चों के आत्महत्या कर लेने की दर में बेतहाशा वृद्धि हुई है। ऐसे में यह सवाल खड़ा होता है कि क्या विकास प्रक्रियाओं और ऐसी अनहोनी के बीच कोई परस्पर संबंध है?
राजस्थान के कोटा में इंजीनियरिंग की तैयारी कर रहे छात्रों में बढ़ रही आत्महत्या की प्रवृत्ति पर हुए एक अध्ययन में यह निष्कर्ष निकल कर आया है कि सफलता की अंधी दौड़ के युग में असफलता के अंदेशा मात्र से भी छात्र इस तरह का खतरनाक कदम उठा रहे हैं।
एक अध्ययन दल ने जनसंख्या को तीन समूह में वर्गीकृत किया। एक जो उच्च श्रेणी के पेशों और व्यवसायों से जुड़ा है, उच्च शिक्षा प्राप्त और विशेषज्ञता रखता है। मसलन चिकित्सक, प्रबंधक और इंजीनियर आदि। दूसरे वर्ग में ऐसे लोग जो उच्च शिक्षा प्राप्त हैं पर मध्यम श्रेणी के व्यवसाय अथवा पैसे से संबंद्ध है, जैसे शिक्षक, दुकानदार, व्यवसायी आदि। तीसरा, उन लोगों का समूह है जो कम शिक्षित और निम्न श्रेणी की विशेषज्ञता वाले लोगों का प्रतिनिधित्व करता है, जैसे किसान, मजदूर और छात्र आदि।
पहले समूह में तनाव, अकेलापन, कार्य के अधिक घंटे, विचारों और भावनाओं की साझेदारी का अभाव, असीमित आकांक्षाएं और विफलता के कारण घातक बीमारी असर डालती है। वहीं दूसरे समूह के लोगों में आत्मविश्वास की कमी होती है क्योंकि उनके ज्ञान और सूचना का संसार पर्याप्त नहीं होता। उपभोक्तावादी समाज न केवल बहुत कुछ पाने को प्रेरित करता है, बल्कि महंगी का, ब्रांडेड कपड़े, पांच सितारा जीवन शैली अपनाने का दबाव बनाता है। यह वर्ग सब कुछ पाना चाहता है लेकिन न मिलने की स्थिति में उसे खुद का जीवन अर्थहीन लगने लगता है।
तीसरा समूह आर्थिक रूप से लगभग विपन्न समूह है जो अस्थिर व्यवस्थाओं में जीने को बाध्य होता है। तीसरी श्रेणी के पास कोई विकल्प ही नहीं बचता है, वह सफलता की आस में अपना सब कुछ दांव पर लगा देता है और विफल होने पर नुकसान पहुंचाने वाला कदम उठा लेता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दक्षिणी और पूर्वी एशिया के 10 देशों की रिपोर्ट प्रस्तुत की। रिपोर्ट में भारत से संबंधित आंकड़े चौंकाने वाले हैं। भारत में 32 प्रतिशत छात्र अवसाद ग्रस्त 12% को अकेलापन सता रहा था। अध्ययन दल से छात्रों ने कहा कि उनका कोई नजदीकी मित्र नहीं है। इस अध्ययन में 15 से 30 आयु वर्ग के लिए आत्महत्या के जो आंकड़े प्रस्तुत किए गए हैं, उनके अनुसार भी भारत की स्थिति 10 देशों में सबसे विकट है। इंडोनेशिया में यह दर जहां एक लाख पर मात्र 3.6, नेपाल में एक लाख पर 25.8 है, वहीं भारत में 35.7 पाई गई है। हाल के बरसों में भारत के युवाओं में शराब की लत भी तेजी के साथ बढ़ रही है।
प्रश्न है कि इस तरह की मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं पूरी दुनिया में तेजी से क्यों बढ़ रही है? जवाब में अध्ययन दल ने यह माना है कि सोशल मीडिया व मोबाइल फोन पर अति सक्रियता, किशोरों को बुलिंग तथा मोबिंग करने यानी तरह-तरह की धमकी देने व अपमानित करने की प्रवृति, पढ़ाई का बोझ तथा सोशल मीडिया पर हमेशा मौजूद रहने का बोझ, भविष्य के प्रति अनिश्चय, शरीर को और अधिक आकर्षक बनाए रखने व दूसरों से निरंतर तुलना करने की प्रवृत्ति, हिंसा व यौन हिंसा, शराब व नशीले पदार्थों का सेवन, मोबाइल पर तेजी से बनते बिगड़ते रिश्ते, पारिवारिक संबंधों में कमजोरी, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव। यह सभी कारण अपने आप में महत्वपूर्ण है।
और इससे भी जरूरी मुद्दा है बुनियादी जीवन मूल्यों का अभाव, उनकी उपेक्षा और उनके बारे में अनिश्चिय। यदि जीवन में बुनियादी जीवन मूल्य जुड़े रहते हैं तो इससे जीवन में सार्थकता और स्थिरता आती है। दादा-दादी, नाना-नानी अब केवल कहने को रह गए हैं। वयस्क पीढ़ी के लक्ष्य बदल गए हैं जिससे स्कूल कॉलेज में परिवार में युवा खुद को दिशाहीन पा रहे हैं।
मूल्यों को लेकर एक खालीपन आया है जिसने आधुनिकता और तकनीक से जुड़े दबावों के साथ मिलकर युवाओं को बहुत उद्वेलित कर दिया है। अगर शिक्षा आलोचनात्मक चेतना और तार्किक विश्लेषण की क्षमता उत्पन्न नहीं कर पा रही तो वह अर्थहीन और उद्देश्यहीन हो जाती है। कौशल विकास के नाम पर केवल तकनीकी और प्रबंधकीय विषय का ज्ञान देना उसके मानवीय गुणों को समाप्त कर मनुष्य को मशीन में बदल रहा है।
प्रसिद्ध समाज शास्त्री दुरखाइम ने अपनी किताब सुसाइड में यह तर्क दिया कि 'जैसे-जैसे समाज सरल से जटिल समाज की ओर अग्रसर हुआ सामूहिकता का स्थान व्यक्तिवादिता ने ले लिया। नतीजतन, व्यक्ति आत्म केंद्रित बनकर रह गया है और सामाजिक संबंधों से कट गया है, जिसका नतीजा है कि मनुष्य अब किसी प्रकार के साझेपन से दूर और जीवन में उत्पन्न अनेक तनाव को अकेले ही झेलने के लिए बाध्य है, जो उसे कभी-कभी अनहोनी के लिए उकसाता रहता है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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