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Man ki Baat 100: जन जन की बात बन गयी 'मन की बात'

मन की बात के 100 एपिसोड पूरे हो गये। इन सौ संस्करणों में प्रधानमंत्री मोदी ने इस रेडियो कार्यक्रम के जरिए जन मन को छुआ है वह भी बिना कोई राजनीतिक बात किये हुए। यह इसकी बड़ी उपलब्धि है।

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Man ki Baat 100: एक ऐसे दौर में जबकि लोग अपनों को सुनने को तैयार न हों, घर-परिवार, आस-पड़ोस, गली-मोहल्लों के बीच दूरी बढ़ी हो, निजता व अकेलापन एक प्रकार का शौक बनता जा रहा हो, गैजेट्स एवं अन्य सुविधाभोगी उपकरणों पर निर्भरता बढ़ती जा रही हो तथा तमाम मनोरंजक कार्यक्रमों की बहुतायत हो, 'मन की बात' जैसे सामाजिक सरोकारों को समर्पित कार्यक्रम की लोकप्रियता विस्मित एवं चमत्कृत करती है।

चिट्ठियाँ लिखना, पढ़ना और उसका इंतज़ार करना अब गुजरे ज़माने की बात हो गई है। नई पीढ़ी तो शायद पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय जैसे शब्दों से परिचित भी न हो। हमारी पीढ़ी यानी बीसवीं सदी के अंतिम दशक के दर्शकों ने दूरदर्शन के लोकप्रिय कार्यक्रम 'सुरभि', 'चित्रहार', 'रंगोली' आदि के लिए खूब पोस्टकर्ड्स लिखे और उसमें नाम सम्मिलित किए जाने या पुकारे जाने के लिए दिन-रात प्रार्थनाएँ भी कीं और यदि कहीं जो उसमें अपना लिखा पोस्टकार्ड चयनित कर लिया गया या पढ़ा गया तो उसका बढ़-चढ़कर उत्सव भी मनाया। पर आज न तो घर के सदस्यों का साथ बैठकर टेलीविजन देखने का चलन रहा और न ही टेलीविजन पर आने वाले किसी कार्यक्रम या सीरियल की वैसी लोकप्रियता ही बची।

ऐसे दौर में 'मन की बात' कार्यक्रम में करोड़ों लोगों की रुचि विस्मित करती है। इस कार्यक्रम की लोकप्रियता ने चिट्ठी लिखने की संस्कृति को पुनर्जीवित कर दिया है। आकाशवाणी के केंद्रों में 'मन की बात' कार्यक्रम में सम्मिलित किए जाने के लिए देश के विभिन्न शहरों, गांव-कस्बे, गली-मोहल्ले, खेत-खलिहान से लाखों पत्र आते हैं। व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, ट्विटर, टेलीग्राम, मेल आदि के त्वरित एवं क्षणजीवी संदेशों के आदान-प्रदान के आधुनिक एवं तकनीकी दौर में चिट्ठियों के माध्यम से विस्तारपूर्वक एवं ठहरकर अपनी बात कहना- शायद पुनः अपनी परंपरा की ओर लौटना है।

सामूहिकता भारतीय संस्कृति एवं लोक-जीवन की आत्मा रही है। जैसे-जैसे साधन बढ़ते गए, मनुष्य एकाकी, सुविधाभोगी और स्वकेंद्रित होता चला गया। मोबाईल ने मनुष्य को पहले से कहीं अधिक एकाकी बनाया है। यह उसे सामूहिकता से निजता (प्राइवेसी) की ओर ले जाता है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का एक-दूसरे के साथ मिलकर रहना, बोलना-बतियाना, दुःख-सुख को संग-साथ झेलना भारतीय जीवनशैली की अद्भुत विशेषताएँ रही हैं। इस परिवार-भाव को आज की मोबाईल-संस्कृति ने बुरी तरह बाधित एवं प्रभावित किया है। बल्कि छिन्न-भिन्न कर दिया है। सुविधा बढ़ी तो घर के भीतरी कक्षों तक पहले टेलीविजन और अन्य साधन पहुँचे। फिर रही-सही कसर मोबाईल ने पूरी कर दी। परिवार के साथ मिल-बैठकर टेलीविजन पर आने वाले पसंदीदा कार्यक्रमों को देखने की प्रवृत्ति व संस्कृति आज शहर तो क्या गाँव-देहात में भी प्रायः कम ही देखने को मिलती है। हर कोई मोबाईल में व्यस्त और मस्त है। असली दुनिया से अलग-थलग एक कृत्रिम एवं आभासी दुनिया में गोते लगा रहा है।

ऐस में 'मन की बात' कार्यक्रम के बहाने एक बार पुनः सामूहिक रूप से रेडियो सुनने के चलन का बढ़ना उल्लेखनीय एवं महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। चौक-चौराहों, चाय-पान की दुकानों से लेकर गांव की चौपालों और खेत-खलिहानों से लेकर पंचायत-भवनों तक लोग समूह में रेडियो पर 'मन की बात' कार्यक्रम को सुनते और सराहते देखे व पाए जाते हैं। यह सामूहिक श्रवण की संस्कृति को विकसित एवं पुनर्स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक क़दम है। मन की बात आज जन-मन की बात बन चुकी है।

हाल ही में आईआईएम, रोहतक द्वारा कराए गए शोध से पता चला है कि देश के लगभग सौ करोड़ लोग रेडियो पर इस कार्यक्रम को सुन चुके हैं और 96 प्रतिशत लोग इस कार्यक्रम एवं इसमें उठाए जाने वाले मुद्दों से परिचित हैं। इसे सुनने वाले श्रोताओं में से 63 प्रतिशत ने यह माना कि इस कार्यक्रम को सुनकर सरकार के कामकाज के प्रति उनके मन में सकारात्मक धारणा विकसित हुई और 60 प्रतिशत लोगों ने यह दावा किया कि इसे सुनने के बाद उनके मन में राष्ट्र-निर्माण के कार्य में योगदान देने की भावना व प्रेरणा जगी।

भारत में लगभग 23 करोड़ लोग मन की बात के हर एपिसोड को जरूर सुनते हैं। यह भी कम महत्त्वपूर्ण उपलब्धि नहीं है कि इस कार्यक्रम के साथ हर आयु वर्ग के लोग समान रूप से जुड़े हैं। यह कार्यक्रम संपूर्ण देश में सुना और सराहा जाता है तथा अनेक भाषाओं में प्रसारित किया जाता है। दूर-दराज के क्षेत्रों जैसे लेह-लद्दाख, उत्तर-पूर्व, जम्मू-कश्मीर से लेकर संपूर्ण भारतवर्ष में इसकी व्याप्ति एवं लोकप्रियता देखने को मिलती है। इस रूप में यह कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता की भावना के संचार में अत्यधिक सहायक है।

हमारे घर-परिवार में बड़े-बुजुर्ग, दादी-नानी आदि किस्से-कहानियों के माध्यम से अगली पीढ़ी को संस्कारों एवं जीवन-मूल्यों की थाती सौंपतीं थीं। 'मन की बात' कार्यक्रम के माध्यम से प्रधानमंत्री भी परिवार के मुखिया या सम्मानित बुजुर्ग की भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। वे एक ओर जहाँ भावी पीढ़ी को संस्कारों एवं भारतीय जीवन-मूल्यों की थाती सौंप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्हें स्वच्छता, स्वास्थ्य, जल-संकट, जलवायु-परिवर्तन, नदियों की देखभाल, वोकल फ़ॉर लोकल, श्री अन्न (मोटे अनाज) की उपयोगिता, सड़क-दुर्घटनाओं से बचाव, परीक्षा का दबाव, उद्यम एवं स्व-रोजगार के उपाय, बेटियों की शिक्षा, देश के गौरवशाली इतिहास, स्थापत्य, पर्यटन, कला आदि के प्रति जागरूक भी कर रहे हैं।

'मन की बात' में जिस सामाजिक कार्यक्रम या स्टार्टअप्स आदि की चर्चा प्रधानमंत्री मोदी करते हैं, उसके प्रति लोगों की सोच में व्यापक बदलाव देखने को मिलता है तथा उस पहल की शुरुआत करने वाले लोगों की सामाजिक प्रतिष्ठा एवं स्वीकार्यता भी बढ़ती है। इससे जहां उस व्यक्ति के भीतर देश व समाज के लिए और बेहतर करने की चाह व प्रेरणा जगती है, वहीं समाज के भीतर भी अपने असली-नकली नायकों को पहचानने की समझ एवं प्रवृत्ति विकसित होती है।

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    यहां यह भी स्मरणीय है कि 'मन की बात' के सौ एपिसोड में से किसी एक में भी प्रधानमंत्री ने राजनीतिक विषयों का उल्लेख नहीं किया। यह इस बात का द्योतक है कि देश के मन और मिजाज़ की प्रधानमंत्री को गहरी समझ है। भारत का जन राजनीति से परे भी जीवन की महत्ता को खूब गुनता, समझता है। वस्तुतः भारत अपने स्वभाव से सांस्कृतिक देश है और बिना इसे पहचाने भारत के जन मन से नहीं जुड़ा जा सकता। सपर्क व संवाद की कला में सिद्धहस्त प्रधानमंत्री मोदी भारत व भारतीयों की इस ख़ूबी को जानते, समझते व मानते भी हैं। इसीलिए उनके मन की बात जन जन की बात बन जाती है।

    (इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)

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