Man Ki Baat 100: रेडियो के जरिए लोक संवाद का सबसे सफल कार्यक्रम
इस महीने के आखिरी रविवार 30 अप्रैल को जब मन की बात का प्रसारण होगा तब एक इतिहास भी बनेगा। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा रेडियो पर शुरु किया गया यह मासिक संवाद कार्यक्रम अपने सौ एपिसोड पूरा कर लेगा।

Man Ki Baat 100: रेडियो के इतिहास में 'मन की बात' संभवत: पहला कार्यक्रम है, जो इतना नियमित है और इसने सौ एपिसोड का सफर पूरा कर लिया है। सबसे अहम बात यह है कि यह कार्यक्रम उस दौर में रेडियो पर आया, जब संचार माध्यमों में क्रांति अपने उरूज पर रही। सोशल मीडिया और इंटरनेट के विस्तार के दौर में जब इंटरनेट के जरिए हर माध्यम सहज और व्यापक संचार की ओर बढ़ रहा था, तब भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो को लोक संचार के लिए अपने माध्यम के रूप में चुना और उसके जरिए एक तरह से संवाद क्रांति कर दी।
रेडियो के जरिए लोक संवाद का पहला उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी रूजवेल्ट का मिलता है। 1930 के दशक में जब दुनिया पर दूसरे विश्व युद्ध की छाया मंडरा रही थी, जब अमेरिकी बैंकिंग व्यवस्था ध्वस्त होने के कगार पर पहुंच गई थी, जब जर्मन शासक हिटलर के संचार मंत्री गोएबल्स की विश्व विख्यात अफवाहबाजी की अवधारणा अपने चरम पर थी, तब रूजवेल्ट को लगा कि अपनी बात अपने लोगों के सामने रखनी चाहिए। यह बात त्वरित तरीके से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कैसे पहुंच सके, इसके लिए उन्होंने तब तक उपलब्ध संचार माध्यमों में से सबसे तेज रेडियो को पाया।
हालांकि इसके पहले न्यूयॉर्क का गवर्नर रहते हुए उन्होंने असेंबली की बैठकों के दौरान विधायकों के दबाव से मुक्त रहने के लिए जनसहयोग लेने के लिए रेडियो का इस्तेमाल किया था। तब वे बीच-बीच में रेडियो के जरिए अपने वोटरों को संबोधित करते और इस तरह लोकमत को अपनी दिशा में मोड़ने के लिए इस्तेमाल करते थे। जब वे अमेरिकी राष्ट्रपति चुन लिए गए तो अपने लोगों को संबोधित करने के लिए उन्हें रेडियो की ही याद आई। तब रूजवेल्ट को लगा कि अगर वे अपनी बात कहने के लिए समाचार पत्रों का सहारा लेते हैं तो समाचार पत्र अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों के मुताबिक, उनकी बातों के महत्वपूर्ण अंशों को वे या तो काट सकते हैं या उनकी गलत व्याख्या कर सकते हैं।
बहरहाल फायरसाइड चैट के जरिए उन्होंने अमेरिका और प्रकारांतर से दुनिया को अमेरिकी रूख से परिचित कराया, ध्वस्त होने के कगार पर पहुंची बैंकिंग व्यवस्था के लिए अमेरिकी सरकार द्वारा की जा रही कोशिशों की जानकारी दी। उस दौरान अमेरिकी सरकार बैंकिंग कानून लेकर आई, उसकी भी फायरसाइड चैट के जरिए अमेरिका को जानकारी दी। 1933 में शुरू उनका यह रेडियो संवाद अमेरिकी मंदी के साथ ही दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान 1944 तक जारी रहा। हालांकि वह कभी साप्ताहिक प्रसारित होता तो कभी उसमें व्यवधान आता। इन अर्थों में देखें तो 'मन की बात' कहीं ज्यादा नियमित है।
बुराई पर अच्छाई के विजयपर्व विजयादशमी के दिन तीन अक्टूबर 2014 को मन की बात का प्रसारण शुरू हुआ। वह दिन शुक्रवार था। तब से लेकर मार्च 2015 तक इसका प्रसारण हर महीने शुक्रवार को ही होता रहा। लेकिन अप्रैल 2015 से इसके प्रसारण का दिन बदला..देश की अधिसंख्य आबादी के फुर्सत के दिन यानी रविवार को इसका प्रसारण शुरू हुआ..तब से लेकर हर महीने इसका प्रसारण रविवार को ही हो रहा है।
इसके पहले एपिसोड की अवधि करीब 14 मिनट थी, जबकि दूसरा एपिसोड करीब 19 मिनट का था। तीसरे एपिसोड की अवधि 26 मिनट रही, लेकिन चौथे एपिसोड से इसकी अवधि तीस मिनट की तय हुई। तब से इसकी अवधि यही है...कुछ एक मौकों पर इसकी अवधि बढ़ी भी। तीस अप्रैल 2023 को जब इसका सौंवा एपिसोड प्रसारित होगा, तब तक इसकी अवधि में यदा-कदा छोड़कर बदलाव नहीं हुआ।
आज स्थिति यह है कि आकाशवाणी के पूरे नेटवर्क पर 22 भारतीय भाषाओं, 29 बोलियों और 11 विदेशी भाषाओं में इस कार्यक्रम का प्रसारण हो रहा है। भारतीय भाषाओं में हिंदी, संस्कृत, पंजाबी, तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मराठी, गुजराती, मलयालम, उड़िया, कोंकणी, नेपाली, कश्मीरी, डोगरी, मणिपुरी, मैथिली, बंगाली, असमिया, बोडो, संथाली, उर्दू और सिंधी शामिल हैं। इनके साथ ही कई बोलियों में प्रसारण के साथ इस कार्यक्रम की पहुंच बेहद ज्यादा हो गई है।
आज आकाशवाणी छत्तीसगढ़ी, गोंडी, हल्बी, सरगुजिया, पहाड़ी, शीना, गोजरी, बालती, लद्दाखी, कार्बी,खासी, जयंतिया, गारो, नगामेसे, हमर, पाइते, थडऊ,कबुई, माओ, तांगखुल, न्याशी, आदि, मोनपा, आओ के साथ ही अंगमी, कोकबोरोक, मिजो, लेप्चा और सिक्किमी (भूटिया) बोलियों में इसका अनुवाद करके प्रसारण कर रही है। इसके अलावा, मन की बात कार्यक्रम 11 विदेशी भाषाओं, अर्थात् फ्रेंच, मंदारिन, इंडोनेशियाई,तिब्बती, बर्मी, बलूच, अरबी, पश्तो, फारसी, दारी और स्वाहिली में भी प्रसारित किया जा रहा है।
दूरदर्शन भी सांकेतिक भाषा में भी मन की बात का प्रसारण करता है। मन की बात कार्यक्रम के अंग्रेजी संस्करण का प्रसारण 31 जनवरी 2016 से शुरू हुआ। बेशक यह कार्यक्रम आकाशवाणी के समूचे नेटवर्क पर सीधे प्रसारित होता है, दूरदर्शन का पूरा नेटवर्क भी इसे प्रसारित करता है। लेकिन इसके अलावा करीब सौ से ज्यादा निजी रेडियो और टीवी चैनलों के साथ ही सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म भी इसे प्रसारित करते हैं। इस तरह से कह सकते हैं कि संचार माध्यमों पर इसकी पहुंच सर्वव्यापक है।
रेडियो के जरिए जब मन की बात का प्रसारण शुरू हुआ तो प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता की वजह से रेडियो के श्रोताओं की संख्या में जबरदस्त उछाल आया। इस उछाल की वजह से रेडियो के राजस्व में बढ़ोत्तरी देखी गई। साल 2021 में राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में सूचना और प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर ने बताया था कि 'मन की बात' के शुरू होने के बाद से तब तक इस कार्यक्रम ने 30 करोड़ 80 लाख रूपए की कमाई की थी। जिसमें सबसे ज्यादा कमाई साल 2017-18 में हुई थी, जो करीब 10 करोड़ 64 लाख थी।
चंडीगढ़ की गुरजीत कौर ने मन की बात पर शोध किया है। इस शोध का शीर्षक है-'मन की बात प्रोग्राम ऑफ ऑल इंडिया रेडियो : द स्टडी ऑफ इट्स कंटेंट एंड इफेक्टिवनेस'। इस शोध के मुताबिक, रेडियो सुनने वाले श्रोताओं में से करीब 78 प्रतिशत ना सिर्फ मन की बात सुनते थे, बल्कि उसका इंतजार भी करते थे। साफ है कि रेडियो की दुनिया में इस प्रसारण ने एक तरह से क्रांति लाने में भूमिका निभाई है।
मन की बात की रिकॉर्डिंग की जिम्मेदारी आकाशवाणी के दिल्ली केंद्र की है। केंद्र की ओर से मनोहर सिंह रावत ऐसे अधिकारी हैं, जिन्होंने चार एपिसोड छोड़कर हमेशा रिकॉर्डिंग की है। प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व और विनम्रता के वे कायल हैं। प्रधानमंत्री मन की बात की रिकॉर्डिंग के दौरान कभी लिखित स्क्रिप्ट नहीं पढ़ते, बल्कि उनके सामने वे बोलने वाले विषयों की हल्की सी जानकारी रखते हैं। रिकॉर्डिंग के बाद हर बार वे रिकॉर्डिंग करने गए अधिकारियों और साउंड इंजीनियरों से फीडबैक लेते हैं और कभी कोई गड़बड़ी लगी तो बिना संकोच दोबारा रिकॉर्डिंग करने से नहीं हिचकते।
मन की बात में प्रधानमंत्री अब तक 700 से अधिक प्रतिष्ठित व्यक्तियों और लगभग 270 संगठनों का उल्लेख कर चुके हैं। इनमें 37 व्यक्ति और 10 संगठन विदेशी हैं। स्पष्ट है कि जिन लोगों का उल्लेख किया गया, इनमें से ज्यादातर लोगों और संगठनों ने समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की दिशा में बड़ा काम किया है। बेशक यह कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी का वैचारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप है, लेकिन इसमें देश का आम नागरिक भी समान रूप से भागीदार है।
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भारत में लोकतंत्र की जो पारंपरिक अवधारणा रही है, उसकी बुनियाद पर यह संवाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया का नया इतिहास रच रहा है, जो रूजवेल्ट के प्रसारण से किंचित अलग है। इन अर्थों में कि रूजवेल्ट ने अपने दौर की राजनीति को जवाब देने के लिए फायरसाइड चैट का इस्तेमाल किया था, जबकि मोदी इसे सामाजिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राष्ट्रीय गौरवबोध बढ़ाने के लिए इस रेडियो संवाद से सकारात्मक हस्तक्षेप की भूमिका निभा रहे हैं।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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