Mahua Moitra: अडानी पर हमला करने वाले एक और सांसद की बलि
दो साल की सजा होने पर जब जन प्रतिनिधित्व क़ानून की धारा 8 (3) के तहत राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द की गई थी, तो उन्होंने आरोप लगाया था कि संसद में अडानी और मोदी के रिश्तों पर बोलने के कारण उनकी सदस्यता ली गई। हालांकि जन प्रतिनिधित्व क़ानून अब तमाशा बन कर रह गया है, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट कन्विक्शन पर स्टे लगा कर सांसदों की सदस्यता बहाल करने लगा है।
लेकिन टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा का मामला दूसरा है, उन्हें किसी अदालत ने नहीं, बल्कि खुद संसद की ओर से सजा दी जा रही है। हालांकि आरोप उनका भी वही है कि उन्हें संसद में अडानी के खिलाफ बोलने की सजा दी जा रही है। उनके खिलाफ शिकायत पैसे लेकर सवाल पूछने की थी।

ऐसा ही एक मामला 2005 में सामने आया था, जब न्यूज चैनल आज तक ने एक स्टिंग आपरेशन दिखाया था। इस स्टिंग आपरेशन में विपक्षी दलों के 11 सांसदों को लिफाफा लेते दिखाया गया था। लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी ने स्वयं संज्ञान लेकर सांसद पवन कुमार बंसल की अध्यक्षता में जांच कमेटी बना दी थी। इस कमेटी ने आजतक को तलब किया था, जिसने कमेटी के सामने पेश होकर कहा कि उसने वीडियो कोबरापोस्ट डॉट कॉम के अनिरुद्ध बहल से 48 लाख रूपए में खरीदे थे। अनिरुद्ध बहल ने कमेटी के सामने पेश होकर कहा कि उन्होंने स्टिंग आपरेशन करने के लिए सांसदों को 11 हजार से लेकर एक लाख रूपए तक दिए गए थे। फिर भी उन सांसदों की सदस्यता समाप्त करने का निर्णय कर दिया गया।

उसी निर्णय के आधार पर लोकसभा की एथिक्स कमेटी ने बहुमत के आधार पर महुआ मोइत्रा को बर्खास्त करने की सिफारिश कर दी है। अब जैसे ही संसद का सत्र शुरू होगा, उनकी बर्खास्तगी का प्रस्ताव रखा जाएगा, जो आसानी से पास भी हो जाएगा, क्योंकि एथिक्स कमेटी की तरह लोकसभा में भी भाजपा का पूर्ण बहुमत हासिल है। विपक्ष के सांसदों ने जैसे संसदीय समिति से वाकआउट किया, वैसे ही लोकसभा से भी करेंगे।
वर्ष 2005 में भी जब लोकसभा के दस सांसदों को बर्खास्त किया जा रहा था, तब भी वाकआउट हुआ था। तब मसला यह था कि विपक्ष ने कहा था अपराध के मुकाबले सजा ज्यादा है। अब विपक्ष सजा के ही खिलाफ है, विपक्ष इस मसले को अडानी के साथ तो जोड़ ही रहा है, सवाल यह भी खड़ा होगा कि कैश लेना साबित हुआ है क्या। दर्शन हीरानन्दानी ने अपने हल्फिया बयान में कैश देने की बात नहीं कही है।
जहां तक उपहार लेने का सवाल है तो सीताराम येचुरी का यह कहना आधारहीन नहीं है कि कौन सांसद उपहार नहीं लेता। बड़े बड़े उद्योगपति सभी सांसदों को दीपावली, होली के वक्त बेशकीमती उपहार भेजते रहते हैं, कोई सांसद उन उपहारों को वापस नहीं करता। उद्योगपतियों का स्वार्थ सिर्फ इतना होता है कि कल को उनके खिलाफ कुछ हो, तो वे उनके साथ भले ही खड़े न हों, उनके खिलाफ न खड़े हों।
सवाल यह भी है कि क्या संसद ने ऐसा नियम बनाया है कि कोई भी सांसद किसी उद्योगपति या बड़े पूंजीपति से उपहार नहीं लेगा। अगर यह नियम नहीं बनाया, तो महुआ मोइत्रा के लिए यह नियम कैसे लागू होगा कि उन्होंने अपने मित्र दर्शन हीरानंदानी से लिपस्टिक या बैग या चश्मा उपहार लिया था। महुआ मोइत्रा और दर्शन हीरानंदानी दोनों ने यह दावा किया है कि उनकी घनिष्टता थी। अगर दोनों में मित्रवत घनिष्टता थी, तो उनके रिश्तों को उद्योगपति और सांसद के रिश्तों के नजरिए से कैसे देखा जा सकता है।
क्या महुआ मोइत्रा को खुद को सही साबित करने के लिए दर्शन हीरानन्दानी और जय अनंत देहाद्राई से उनका आमना सामना नहीं करवाना चाहिए था? क्योंकि यह नहीं हुआ, इसलिए विपक्ष इसे अडानी के साथ जोड़ेगा। कहेगा कि अडानी की आलोचना के कारण पहले राहुल गांधी को बर्खास्त किया गया, अब महुआ मोइत्रा को किया जा रहा है।
सवाल यह है कि देश क्या सोचेगा। जनता में धारणा क्या बनती है? जनता क्या सोचती है? क्या पब्लिक परसेप्शन बनेगा कि भाजपा अपने बहुमत का नाजायज फायदा उठा कर मोदी विरोधी सांसद को बर्खास्त कर रही है। या पब्लिक यह सोचेगी कि महुआ मोइत्रा ने उन वोटरों के साथ धोखा किया, जिन्होंने उन्हें चुना था। महुआ मोइत्रा को उन्होंने अपनी आवाज उठाने के लिए चुना था। लेकिन वह वोटरों की आवाज उठाने की बजाए एक औद्योगिक घराने के खिलाफ दूसरे औद्योगिक घराने का मोहरा बन गई।
महुआ मोइत्रा ने अपना अपराध कबूल किया है कि उन्होंने दर्शन हीरानन्दानी को अपनी लोकसभा वेबसाईट की आईडी और पासवर्ड दिया था। उन्हीं के दफ्तर से उनके सवाल अपलोड किए जाते थे। लेकिन जो कुछ उन्होंने किया, वह उसे अपराध ही नहीं मानती। इसलिए महुआ ने एथिक्स कमेटी को कंगारू कोर्ट कहा है, और दावा किया है कि वह छह महीने बाद ज्यादा वोटों से जीत कर आएगी।
2005 के केस में और इस केस में यह एक बड़ा अंतर है कि सिर्फ एक सांसद का सवाल मैच कर रहा था, उसने भी स्पीकर को लिखकर दिया था कि उस सवाल पर उनके दस्तखत नहीं है। बाकी दस सांसदों ने तो वे सवाल ही दाखिल नहीं किए थे, जिन पर उनको सजा दे दी गई थी। अब तो यह साबित हो गया है कि सवाल ही दर्शन हीरानन्दानी ने पोस्ट किए थे। दोनों ही मामलों में कैश फॉर क्वेश्चन का पुख्ता सबूत न तब मिला था, न अब मिला है। फैसला तब भी राजनीतिक आधार पर हुआ था, फैसला आज भी राजनीतिक आधार पर हो रहा है। इसलिए महुआ मोइत्रा इसे राजनीतिक लड़ाई के रूप में ले रही है, वह पब्लिक परसेप्शन बना रही हैं कि उनकी बर्खास्तगी शुद्ध राजनीतिक आधार पर हो रही है।
लेकिन यह मामला यहीं पर खत्म नहीं होता। लोकपाल ने सारे मामले की सीबीआई जांच की सिफारिश भी की हुई है। संभव है कि लोकसभा भी उनके खिलाफ एफआईआर दायर करने की सिफारिश भी करे। क्योंकि एथिक्स कमेटी ने आपराधिक जांच की भी सिफारिश की है। 2005 में राज्यसभा के एक सांसद को जब बर्खास्त किया गया था, तब राज्यसभा ने भी एफआईआर की सिफारिश की थी। बाद में सुप्रीमकोर्ट ने उसी एफआईआर में लोकसभा के सांसदों का नाम भी जुड़वा दिया था। उस केस में अभी भी कोर्ट में सुनवाई चल रही है।
संभव है महुआ मोइत्रा अपनी बर्खास्तगी को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती भी दे। 2005 में बर्खास्त 11 सांसदों ने सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन पांच सदस्यीय बेंच ने तीन/ दो के बहुमत से उनकी याचिका रिजेक्ट कर दी थी। महुआ मोइत्रा ने कुछ सवाल उठाए हैं, उनके कुछ सवाल जायज हैं।
पहला सवाल तो यह है कि एनडीटीवी ने 8 नवंबर को रिपोर्ट जारी कर दी, जबकि रिपोर्ट 9 नवंबर को स्वीकार की गई थी। एनडीटीवी को हाल ही में अडानी ने खरीद लिया था। तो यह रिपोर्ट किसने लीक की, क्योंकि नियमों के मुताबिक़ रिपोर्ट का ड्राफ्ट लीक नहीं होना चाहिए था। दूसरा सवाल, जो महुआ ने तो नहीं पूछा, लेकिन बड़ा सवाल है, और यह है कि लोकसभा के पटल पर रखने से पहले खुद एथिक्स कमेटी के चेयरमेन और सदस्यों ने कैमरे पर आकर रिपोर्ट के अंश बताए। यह सांसदों के विशेषाधिकार का हनन है। इसी रिपोर्ट में दानिश अली को इसलिए फटकार लगाई गई है, कि उन्होंने पिछली बैठक में पूछे गए सवाल मीडिया को लीक किए थे।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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