Mahatma Gandhi: क्या भारत में अप्रासंगिक हो रहे हैं महात्मा गांधी?
Mahatma Gandhi: क्या महात्मा गांधी और उनके विचार धीरे धीरे अप्रासंगिक होते जा रहे हैं? क्या आने वाले कुछ वर्षों या दशकों में इस देश में कोई भी महात्मा गांधी का नामलेवा नहीं रह जाएगा?
ये सवाल इसलिए, क्योंकि भाजपा और आरएसएस पर गांधी विरोध का आरोप लगाने वाले विपक्षी दलों ने भी महात्मा गांधी से किनारा करना शुरू कर दिया है।

जब आप भारतीय राजनीति और जनमानस में आ रहे इस महत्वपूर्ण बदलाव को दर्ज करते हैं, तो जनसांख्यिक दृष्टि से भी देख लेते हैं कि आज इस देश की कितनी बड़ी आबादी महात्मा गांधी के विचारों से दूर जा चुकी है। मोटे तौर पर आप यह मानकर चल सकते हैं कि हिंदुत्ववादी विचारधारा का अनुसरण करने वाली भाजपा और आरएसएस के लगभग ज़्यादातर समर्थक महात्मा गांधी और उनके विचारों से असहमति रखते हैं। इनमें से कुछ खुलकर महात्मा गांधी की आलोचना करते हैं और कुछ मर्यादा में रहते हुए उनकी खुली आलोचना से परहेज करते हैं।
भले ही सरकार के स्तर पर भाजपा ने अभी तक महात्मा गांधी की किसी प्रकार से अवहेलना नहीं की है और पिछली सरकारों द्वारा स्थापित परंपराओं को ही आगे बढ़ाया है। भले ही स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत व्यक्तिगत रूप से महात्मा गांधी के प्रति अपना सम्मान भी प्रकट करते रहते हैं, लेकिन यह सच है कि आज भाजपा और एनडीए के समर्थकों के बीच महात्मा गांधी की आलोचना या निंदा के विरुद्ध कोई मज़बूत प्रतिक्रिया नहीं है।
इसलिए 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणाम को यदि पैमाना बनाएं, तो भाजपा और इसके नेतृत्व वाले गठबंधन को इस देश के लगभग 45 प्रतिशत मतदाताओं ने अपना समर्थन दिया है। इनके अलावा राजद, जदयू, आम आदमी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, शिवसेना, कम्युनिस्ट पार्टियों, मुस्लिम समर्थन से चलने वाली पार्टियों और कुछ अन्य क्षेत्रीय पार्टियों, जिन्हें महात्मा गांधी से ज्यादा लेना-देना नहीं है, के समर्थकों की संख्या भी कम से कम 20 प्रतिशत तो है ही।
एनडीए समर्थकों के साथ इन्हें जोड़ने से लगभग 65% लोग ऐसे हो जाते हैं, जो महात्मा गांधी के विचारों से काफी दूर जा चुके हैं। बचे हुए 35% लोगों में भी केवल कांग्रेस के समर्थक ही ऐसे हैं, जो मोटे तौर पर आज भी महात्मा गांधी के विचारों का अनुसरण करने का दम भरते हैं, लेकिन ऐसे लोगों की संख्या 2019 में 20 प्रतिशत से भी कम थी। इस पर भी, आज हालात ऐसे हैं कि सत्ता, गठबंधन और नए पैदा होते राजनीतिक हालात व समीकरणों को साधने की मजबूरी में इन 20 प्रतिशत लोगों के भीतर भी महात्मा गांधी के नाम और विचारों को लेकर वैसा आग्रह नहीं दिखाई देता, जैसा कि ये दावा करते हैं।
यदि वैसा आग्रह होता तो ये राज्यों में साफ तौर पर अपने गठबंधन सहयोगियों से कह सकते थे कि महात्मा गांधी के नाम पर कोई समझौता नहीं होगा, जैसा कि शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट ने महाराष्ट्र में कांग्रेस को स्पष्ट रूप से बता दिया कि वीर सावरकर के नाम पर कोई समझौता नहीं होगा। जैसा कि बहुजन समाज पार्टी स्पष्ट करके चलती है कि अंबेडकर के नाम पर कोई समझौता नहीं होगा। जैसा कि भारतीय जनता पार्टी ने भी साफ कर रखा है कि भगवान राम के नाम पर कोई समझौता नहीं होगा।
इन सारी घटनाओं और परिस्थितियों से मिले संकेत यही कहते हैं कि अब इस देश में बमुश्किल 20 प्रतिशत लोग भी महात्मा गांधी और उनके विचारों के साथ अडिग नहीं हैं। यदि सचमुच ऐसा है तो इसके क्या कारण हो सकते हैं? तो इसका मुख्य कारण तो यही समझ में आता है कि महात्मा गांधी किसी खास वर्ग या समुदाय के नेता नहीं, पूरे देश के नेता थे, जबकि देश की हकीकत यह है कि यह अनेक धर्मों और जातियों में विभाजित है।
इसलिए इस देश के बहुसंख्य मुसलमानों ने तो आजादी से पहले ही गांधी को छोड़कर जिन्ना को अपना नेता मान लिया था। आप जानते होंगे कि भारत की आज़ादी की रूपरेखा तैयार करने के लिए ब्रिटिश सरकार ने जो कैबिनेट मिशन भारत भेजा था, उसके फैसले के मुताबिक 1945-46 में जो चुनाव कराए गए थे, उनमें ज़्यादातर मुस्लिम बहुल सीटों पर महात्मा गांधी के नेतृत्व और अबुल कलाम आज़ाद की अध्यक्षता वाली कांग्रेस पार्टी को नहीं, बल्कि मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को जीत मिली थी।
इन चुनावों में मुस्लिम लीग को 26.81% वोट मिले थे और उस वक़्त देश में लगभग इतनी ही मुस्लिम आबादी थी। इन चुनावों में गांधी जी की कांग्रेस को 74% हिंदुओं वाले देश में लगभग 58% वोट मिले थे। इससे दो बातें स्पष्ट हो गई थी कि एक तरफ़ जहां मुसलमानों ने लगभग एकजुट होकर महात्मा गांधी के नेतृत्व और विचारों को तभी खारिज कर दिया था, वहीं हिंदुओं के भी एक छोटे से तबके में ही सही, गांधी जी के विचारों के प्रति स्वीकृति और सहमति की कमी थी। इनमें केवल दक्षिणपंथी ही नहीं, वामपंथी भी शामिल थे।
फिर जब भारी हिंसा में लगभग दस या बीस लाख लोगों की मौत के बाद विभाजित होकर भारत आज़ाद हुआ, तब हिंदुओं के भीतर भी महात्मा गांधी की नीतियों के प्रति असंतोष और बढ़ा, जिसकी परिणति नाथूराम गोडसे द्वारा उनकी हत्या के रूप में हुई।
फिर पिछले 75 साल में कांग्रेस की नीतियों, पाकिस्तान के साथ हुए कई युद्धों, कश्मीर समस्या, सीमावर्ती राज्यों में अवैध घुसपैठ, हिंसा, आतंकवाद, दंगे, देश की तेज़ी से बिगड़ती जनसांख्यिकी इत्यादि अनेक कारणों से हिंदुओं का एक बड़ा तबका कांग्रेस से विमुख होकर जहां भाजपा के साथ आ गया, वहीं दूसरा बड़ा तबका जाति व्यवस्था के कारण पैदा हुई समस्याओं का समुचित समाधान न मिलने के कारण अम्बेडकरवादी और समाजवादी विचारधारा वाली पार्टियों के साथ चला गया।
इस प्रकार आप देखते हैं कि गांधीवाद उन दोनों प्रकार के हिंदुओं की समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने में विफल सिद्ध हुआ, जिनके लिए एक तरफ सांप्रदायिकता और दूसरी तरफ जातिवादी व्यवस्था बड़ा मुद्दा थी। चाहे गाहे बगाहे कुछ भाजपा नेताओं द्वारा महात्मा गांधी की निंदा और नाथूराम गोडसे की प्रशस्ति हो, या बिहार सरकार द्वारा गांधी जयंती की छुट्टी खत्म करना, या फिर आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा पृष्ठभूमि से महात्मा गांधी की तस्वीर हटाना - इन सारी घटनाओं को आप इसी परिप्रेक्ष्य में ठीक से समझ सकते हैं।
आप चाहें तो इस बात पर भी गौर कर सकते हैं कि आज स्वयं महात्मा गांधी के अपने गृह राज्य गुजरात में सबसे ऊंची प्रतिमा महात्मा गांधी की नहीं, बल्कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की है और गुजरात की जनता ने भी इसे लगभग निर्विरोध और निर्विवाद रूप से अपनी स्वीकृति दे रखी है।
इतना ही नहीं, महात्मा गांधी की अपनी बनिया जाति के लोग भी आज मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ नहीं, बल्कि भाजपा के साथ समझे जाते हैं, और खुद को बनिया कहने वाले एक दूसरे नेता अरविंद केजरीवाल ने ही सरकारी दफ्तरों से उनकी तस्वीरें उतरवाने की शुरुआत कर दी है। इस प्रकार आप देखते हैं कि चूंकि वोट बैंक वाली राजनीति में आज महात्मा गांधी किसी भी क्षेत्र, किसी भी जाति, किसी भी धर्म, किसी भी भाषा के सबसे बड़े वोट-दिलाऊ नेता नहीं रह गए हैं, इसलिए उनकी पूछ देश की राजनीति और प्रकारांतर से हमारे समाज में भी दिनों दिन कम होती जा रही है।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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