Sharad Pawar: शरद पवार के इस कदम को अंतिम मत समझिए
राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी शरद पवार ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पद से हटने का ऐलान करके अपनी पार्टी में संभावित टूट रोकने का प्रयास किया है।

Sharad Pawar: शरद पवार कुछ नया करने वाले हैं। इसके संकेत तब से मिलने शुरू हुए थे जब उन्होंने गौतम अडानी के मामले में कांग्रेस की जेपीसी की मांग के खिलाफ स्टैंड लिया था| फिर कुछ दिन पहले उन्होंने कहा कि तवे पर रखी रोटी को अगर पलटा न जाए तो वह जल जाती है, उन्होंने कहा रोटी पलटने का टाईम आ गया है| शरद पवार ने मंगलवार को अपनी आत्मकथा के दूसरे भाग के विमोचन के समय पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर सब को चौंका दिया|

संजय राउत ने कहा कि उन्होंने रोटी पलटने की बजाए तवा ही पलट दिया| लेकिन उनकी आत्मकथा में कांग्रेस के साथ साथ उद्धव ठाकरे की भी आलोचना है| इस आत्मकथा में उन्होंने यह भी साफ़ किया है कि अजीत पवार ने जब देवेन्द्र फडनवीस के साथ उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तो उन्हें इसकी जानकारी नहीं थी| कांग्रेस और उद्धव ठाकरे की आलोचना और अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा बहुत कुछ कहती है|
पिछले दिनों शरद पवार ने संजय राउत को बताया था कि पार्टी के भीतर टूट का दबाव बन रहा है| क्या शरद पवार ने अपने जीते जी पार्टी को दोफाड़ होने से बचाने के लिए यह कदम उठाया है| क्या इस नए घटनाक्रम का अजीत पवार के हाल ही के इस बयान से भी कुछ ताल्लुक है कि एनसीपी किसी भी समय मुख्यमंत्री पद का दावा ठोक सकती है? क्या उनके भाजपा में शामिल होने की अटकलों का भी इस घटनाक्रम से कुछ लेना देना है? क्या यह शरद पवार और अजीत पवार की मिलीजुली रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि जब मुम्बई के यशवंत राव चव्हान सेंटर में शरद पवार ने इस्तीफे का एलान किया, उस समय कार्यकर्ताओं ने सुप्रिया सुले पर दबाव बनाया कि वह अपने पिता पर इस्तीफा वापस लेने का दबाव बनाए। तब अजीत पवार ने उन्हें रोकते हुए कहा कि वह ऐसा न करें, शरद पवार इस्तीफा वापस नहीं लेंगे|
शरद पवार भले ही 82 साल के हो गए हैं, कैंसर के कारण बोलने में भी दिक्कत आ रही है, इसके बावजूद उनके राजनीतिक दिमाग को समझना बहुत मुश्किल है| 2013 में उन्होंने कह दिया था कि वह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे| उन्होंने अपनी सीट बारामती अपनी बेटी सुप्रिया सुले को दे दी थी| अब उन्होंने कह दिया है कि 2026 में मौजूदा राज्यसभा की टर्म खत्म होने के बाद राज्यसभा का चुनाव भी नहीं लड़ेंगे| पार्टी का नया अध्यक्ष तय करने के लिए उन्होंने 15 नेताओं और पार्टी के मोर्चों के अध्यक्षों की एक कमेटी बना दी है| कमेटी में प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे, पीसी चाको, नरहरि जिरवाल, अजीत पवार, सुप्रिया सुले, जयंत पाटिल, छगन भुजबल, दिलीप वलसे-पाटिल, अनिल देशमुख, राजेश टोपे, जितेंद्र आव्हाड, हसन मुश्रीफ, धनंजय मुंडे, जयदेव गायकवाड़ और पार्टी के विभिन्न मोर्चों के अध्यक्ष हैं|
कमेटी के सदस्यों में अजीत पवार समर्थकों का बहुमत नहीं है, इसलिए अगर शरद पवार नहीं चाहेंगे, तो अजीत पवार पार्टी के अध्यक्ष नहीं बन सकते| उनके पार्टी छोड़ने की अटकलें पहले से ही थीं| हालांकि उन्होंने कई दिन तक मीडिया में अटकलें लगने देने के बाद पार्टी छोड़ने का खंडन किया था| अजीत पवार की बढ़ती महत्वाकांक्षा शरद पवार का सिरदर्द बनी हुई थीं| इसलिए पिछले विधानसभा चुनाव में वह अपने दूसरे भाई के पोते रोहित पवार को मैदान में लेकर आए थे| लेकिन शरद पवार पार्टी टूटते नहीं देखना चाहते, उन्होंने लंबे समय तक मराठों की राजनीति के बूते राज्य में एनसीपी को ताकतवर बनाया है| महाराष्ट्र में मराठा राजनीति बाला साहेब ठाकरे और शरद पवार के ईर्दगिर्द घूमती रही थी| दोनों अच्छे मित्र होने के बावजूद राजनीतिक प्रतिद्वन्दी भी थे|
पिछले साल महाराष्ट्र की मराठा राजनीति का फोकस ठाकरे परिवार के इर्द-गिर्द घूम रहा , अब अचानक पवार परिवार पर चला गया है| शरद पवार और अजीत पवार ने पिछले कुछ दिनों से महाराष्ट्र विकास अघाडी पर भी सवाल उठाए थे| मराठा बाहुबली ने अडानी का बचाव करते हुए जेपीसी पर एक अलग रुख अपनाया और प्रधानमंत्री की डिग्री पर विवाद को गैर-मुद्दा बताया| यह पहली बार नहीं है कि जब पवार ने ऐसा स्टैंड लिया है जो सत्तारूढ़ भाजपा या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मदद करने वाला था| सितंबर 2018 में, जब राहुल गांधी ने राफेल सौदे को लेकर मोदी के खिलाफ कड़ा स्टैंड लिया था, तो शरद पवार ने कहा था कि प्रधानमंत्री की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया जा सकता|
अडानी पर दिए गए पवार के बयान और उसके बाद अडानी की शरद पवार से मुलाक़ात भी कहीं न कहीं नरेद्र मोदी के साथ रिश्तों के बदलते मौसम का एहसास करवाने वाला है| ठीक उसी समय अजीत पवार ने भी ईवीएम पर कांग्रेस के स्टैंड के खिलाफ स्टैंड लिया था| खबरें आ रहीं थीं कि अजीत पवार 2019 वाला खेल दोहराने की कोशिश कर रहे हैं, और 15 विधायकों के साथ भाजपा में शामिल होने की फिराक में हैं| फिर इन विधायकों की संख्या 40 तक बताई गई|
लेकिन जब अजीत पवार ने इन सब अटकलों को विराम दे दिया, तो सबसे बड़ा सवाल यह सामने आता है कि क्या शरद पवार खुद महा विकास आघाड़ी गठबंधन से बाहर निकलने का रास्ता खोजने और भाजपा के करीब आने का रास्ता बना रहे हैं| रामविलास पासवान की तरह शरद पवार भी राजनीतिक मौसम को भांपने के लिए जाने जाते हैं| उन्होंने यह भी कहा है कि अगर कर्नाटक में कांग्रेस जीत भी जाती है, तो उसका मतलब यह नहीं है 2024 में मोदी हार जाएंगे|
इसलिए नई रणनीति के तहत 2024 के आम चुनावों से पहले वह भाजपा और विपक्ष से समान दूरी बनाने की कोशिश कर सकते हैं और अपने सभी विकल्प खुले रखेंगे| यह नहीं भूलना चाहिए कि हाल ही में शरद पवार की सहमति से एनसीपी ने नगालैंड की एनडीए सरकार को समर्थन दिया था| पिछले हफ्ते प्रवर्तन निदेशालय ने महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले में चार्जशीट दायर की, इस केस में पहले ईडी ने अजीत और उनकी पत्नी सुनेत्रा से जुड़ी संपत्तियों को कुर्क किया था, लेकिन चार्जशीट से उन दोनों का नाम हटा दिया गया था|
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कुछ लोगों का मानना है कि शरद पवार ने एनसीपी की रोटी पलटने की रणनीति के तहत ही इस्तीफा देकर रास्ता साफ़ किया है| शरद पवार अपने पत्ते अपनी छाती से चिपकाए रखने के लिए जाने जाते हैं| देखते हैं कि उनका अगला कदम क्या होगा, जो उनकी तरफ से चलेगा कोई और| वह अजीत पवार या प्रफुल्ल पटेल भी हो सकते हैं, जो भाजपा से गठबंधन को उतावले हैं|
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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