Maharashtra Politics: महाराष्ट्र के राजनीतिक ‘सर्कस’ में सब लगा रहे दांव
Maharashtra Politics: लोकतंत्र की पिच पर आम चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जहां 'अबकी बार 400 पार' का नारा आम जनमानस के दिमाग में फिट करके मनोवैज्ञानिक बढ़त बना रहे हैं, वहीं कांग्रेस में चुनाव लड़ने योग्य उम्मीदवारों का टोटा पड़ रहा है। इन सबके बीच 48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में राजनीति चरम पर है।
2014 के आम चुनाव में महाराष्ट्र में भाजपा ने शिव सेना के साथ गठबंधन में 23 सीटें जीती थीं जबकि शिव सेना को 18 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस मात्र 2 सीटें जीत पाई थी जबकि शरद पवार की एनसीपी ने 4 सीटों पर परचम लहराया था। 2019 के आम चुनाव में एक बार पुनः भाजपा और शिव सेना गठबंधन ने क्रमशः 23 और 18 सीटें जीतीं।

एनसीपी भी 4 सीटों को बचाने में कामयाब रही जबकि कांग्रेस 2 सीटों में से 1 गवांकर और सिमट गई। उसे विदर्भ की एकमात्र चंद्रपुर सीट से संतोष करना पड़ा जबकि 2014 में कांग्रेस ने मराठवाड़ा में 2 सीटें, नांदेड और हिंगोली पाई थीं।
वर्तमान में मराठवाड़ा के दिग्गज कांग्रेसी नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण भगवा लहर पर सवार होकर राज्यसभा का टिकट कटा चुके हैं। यानी जिस मराठवाड़ा में अशोक चव्हाण कांग्रेस की लाज बचाते थे, उनका भी साथ अब कांग्रेस के पास नहीं है। हालांकि साथ तो अब उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे भी नहीं हैं और शरद पवार तथा अजित पवार की राहें भी जुदा हो चुकी हैं।
शिंदे और अजित अब एनडीए गठबंधन का हिस्सा हैं वहीं शरद पवार अब भी बची-खुची ताकत के साथ कांग्रेस के साथ खड़े हैं। वहीं अब राज ठाकरे भी बहती गंगा में हाथ धोने के इरादे से भाजपा गठबंधन का हिस्सा बनने की मंशा से दिल्ली दरबार के चक्कर काट रहे हैं। गोयाकि महाराष्ट्र का राजनीतिक 'सर्कस' अब अपने चरम पर है और सभी अपने लाभ और हानि का आकलन कर रहे हैं।
अब चुनाव परिणाम ही बताएगा कि 2014 के लोकसभा चुनाव में मात्र 1.5 प्रतिशत वोट लाने वाली राज ठाकरे की मनसे के साथ आने से भाजपा को कितना और क्या लाभ होगा? हां, भाजपा यदि हिंदुत्व के मुद्दे पर खुलकर खेलना चाहती है तो मनसे को आगे करके वह अपने मन की कर सकेगी। वहीं मनसे को भाजपा के माध्यम से अपने वोट प्रतिशत को बढ़ाने का अवसर मिलेगा किंतु इसका शिंदे गुट की शिव सेना पर क्या असर होगा, इसका अनुमान लगा पाना अभी कठिन है। हालांकि इन सभी कवायदों के बीच सीट शेयरिंग का मुद्दा अभी भी नहीं सुलझा है जिसके कारण महाराष्ट्र की जनता भी भ्रमित है।
एनसीपी में बगावत से किसको होगा लाभ?
06 फरवरी, 2024 को चुनाव आयोग ने जब अजित पवार गुट को 'असली एनसीपी' घोषित किया तो अपने राजनीतिक दांव-पेंच से इंदिरा गांधी तक को चौंकाने वाले शरद पवार निश्चित रूप से राजनीति में अपने ही भतीजे से हार गए। एक समय जिन परिस्थितियों में उन्होंने महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी तोड़कर एनसीपी बनाई थी, उन्हीं परिस्थितियों में उनके भतीजे ने उन्हें किनारे करके 'चाचा' को राजनीतिक वनवास पर भेज दिया है।
चूंकि इस समय देश में 'मोदी लहर' की चर्चाएं आम हैं तो अजित का भाजपा गठबंधन में होना उन्हें लाभ का सौदा दिख रहा है। लाभ की संभावना तो भाजपा भी जता रही है क्योंकि 'मराठा' नेतृत्व के न होने से जो हानि उसे महाराष्ट्र में उठानी पड़ती थी, इस बार उसकी भरपाई होने की बात की जा रही है। पश्चिम महाराष्ट्र के पुणे, बारामती, सतारा, मढ़ा, कोल्हापुर जैसे एनसीपी के गढ़ों में यदि अजित पवार का जादू चल जाता है तो भाजपा की मुंह मांगी मुराद पूरी हो जाएगी।
अजित पवार के सहयोग से ही भाजपा इन लोकसभा सीटों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा लेगी। हालांकि पुणे से अभी भाजपा सांसद है किंतु यह लोकसभा भी एनसीपी के प्रभाव क्षेत्र वाली मानी जाती है। वहीं शरद पवार के लिए यह आम चुनाव उनके राजनीतिक जीवन का अंतिम चुनाव हो सकता है और भतीजे द्वारा पार्टी पर कब्जे की सहानुभूति उन्हें कथित राजनीतिक वनवास से निकाल सकती है जिसका सीधा लाभ इंडिया एलायंस को होगा।
कांग्रेस के नीति-नियंता भी इसी सोच के साथ आगे बढ़ रहे हैं और अजित पवार के भ्रष्टाचार का मुद्दा उठा रहे हैं। साथ ही वे शरद पवार के माध्यम से सहानुभूति कार्ड भी खेल रहे हैं। इस कवायद में भाजपा-कांग्रेस भले ही अपना भला कर लें, सर्वाधिक नुकसान पवार परिवार का होगा क्योंकि उनकी जुदा राहें मतदाताओं को भी जुदा कर देंगी।
अब जबकि शरद पवार गुट को चुनाव आयोग से इलेक्शन सिंबल मिल गया है तो शरद गुट मजबूती से मैदान में उतर चुका है। वहीं शरद गुट को अजित पवार के भाई श्रीनिवास का भी साथ मिला है जिन्होंने शरद पवार को 'बूढ़ा है, कमजोर नहीं' कहते हुए अजित के समक्ष परेशानियां पैदा कर दी हैं। संभवतः अब यही नारा शरद गुट के लिए संजीवनी का काम करे।
बाल ठाकरे के 'असली' वारिस को चुनने का चुनाव
महाराष्ट्र में यह चुनाव बाल ठाकरे के 'असली' वारिस को चुनने का भी चुनाव है। बाला साहब के भतीजे राज ठाकरे की परिवार से जुदा हुई राहों से शिव सेना का उतना नुकसान नहीं हुआ था जितना एकनाथ शिंदे के साथ छोड़ने से हुआ है। वर्तमान में उद्धव ठाकरे के समक्ष परिवार की राजनीतिक विचारधारा को बचाने के साथ ही कांग्रेस से गठबंधन क्यों के प्रश्न का उत्तर देना कठिन होगा।
हालांकि 'मराठी मानुष' के नाम पर सहानुभूति उन्हें भी मिलेगी, किंतु यह वोटों में कितनी तब्दील होगी कहना कठिन है। शिंदे-ठाकरे के साथ भाजपा के ऊपर बाला साहब की विरासत के टुकड़े करने का जो दाग लगा है, आम चुनाव उसकी भी सफाई देगा। सत्ता के लिए विचारधारा को तिलांजलि देना या सत्ता के लिए परिवार को छोड़ देना; दोनों का फैसला जनता करेगी। यह भी तय होगा कि 'असली' कौन और 'नकली' कौन? जो शिव सेना पूर्व में भाजपा के साथ गठबंधन करके सभी सीटों पर अपना परचम फहराती थी, अब एक-एक सीट के लिए दोनों गुट भाजपा-कांग्रेस के ऊपर निर्भर हैं।
'सबका साथ-सबका विकास' का नरेंद्र मोदी का नारा वास्तविकता में शिव सेना के गुटों पर फिट बैठता है क्योंकि अकेले ये दोनों गुट इतने कमजोर हो चुके हैं कि चुनाव में उतरना इनके अस्तित्व को समाप्त कर देगा। फिर राज ठाकरे का भाजपा के साथ आना भी दोनों गुटों को परेशान करेगा।
राज ठाकरे की मनसे भले ही राजनीतिक रूप से अभी इतनी सक्षम न हो किंतु राज ठाकरे का अपना व्यक्तित्व है जिससे उनकी क्षमताओं को नकारा नहीं जा सकता। इन परिस्थितियों में सर्वाधिक लाभ भाजपा का हुआ है क्योंकि वह 'छोटे भाई' की भूमिका से निकलकर 'बड़े भाई' की भूमिका में आ गई है और बाला साहब ठाकरे की विरासत के निर्णायक दौर में उसके अपने हित छुपे हैं।
देखा जाए तो वर्तमान में महाराष्ट्र की राजनीतिक लड़ाई भाजपा के 400 पार के नारे को चरितार्थ करने के रास्ते में सबसे बड़ा सवाल बनकर खड़ी हुई है क्योंकि जिन दलों को भाजपा ने 'महायुति' का हिस्सा बनाया है, उनका वर्तमान भी हिला हुआ है और भविष्य क्या होगा, यह जनता तय करेगी। फिलहाल तो दोनों ही बड़े गठबंधन अभी सीटों के बंटवारे को लेकर असमंजस में हैं जिसके त्वरित समाधान का रास्ता ही उनकी राजनीतिक स्थिति को बयां करेगा।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)
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